'टिकट बुक ट्रेन की थी, लेकिन पहुंचे हम खजुराहो बस से.'
कोई 15 दिन पहले जब
हमने टिकट बुक किया था तो वेटिंग 40, 41 और 42 था. सो सोचा कि शायद कन्फर्म हो
जाएगा और यदि नहीं भी हुआ तो तत्काल से बुकिंग करके चले जाएँगे. लेकिन सब गड़बड़ हो
गया. ऐन वक्त पर वेटिंग 3, 2, और 1 पर आकर अटक गया. हमने सोचा था कि ट्रेन सोमनाथ
से 9:30 पर खुलती है, तो सुबह 5 बजे के आस-पास चार्ट तैयार होगा और हमें हमारे
टिकट का स्टेटस पता चल जाएगा. अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो 11 बजे अगले दिन यानि
11 अगस्त के लिए तत्काल से बुक कर लेंगे या फिर बस से चले जाएँगे.
रात को चार बजे मेरी नींद खुली गई, तभी से जगकर मैं चार्ट तैयार होने का
इंतजार करने लगा. जाने की उत्सुकता व उत्तेजना ने नींद उड़ा दी थी. उम्मीद था की 6
बजे तक रेलवे से मेसेज आ जागेगा. लेकिन 6 क्या 8 बजे तक भी कुछ नहीं हुआ. फिर 9
बजे के क़रीब इस आशंका से घबरा कर कि कहीं ट्रेन रद्द न हो गया हो 139 पर कॉल किया.
वहां से पता चला कि ट्रेन अपने समय से सोमनाथ से चलेगी. और हमारा चार्ट 2:30 के
आस-पास तैयार होगा. यानि हमारे बोर्डिंग समय, जो कि अहमादाबाद से 6:30 का था, से
क़रीब चार घंटा पहले. मतलब अब हम आज तत्काल बुक नहीं कर सकते थे. और अभी वेटिंग
केंसल करने का मतलब एक भी पैसा वापिस नहीं मिलेगा. अब हमारे लिए दूध और माछ दोनों
बांतर था.
खैर, अल्लाह-अल्लाह करते हुए हमने पैकिंग कर ली और सारा सामान बाँध कर ढाई
बजने का इंतज़ार करने लगे. और अंत में वही हुआ जो अपेक्षित नहीं था, टिकट कन्फर्म
नहीं हुआ. अब तीन बजे तो तत्काल बुक नहीं हो सकता था. मतलब अब हम 12 अगस्त से पहले
ट्रेन से नहीं जा सकते थे. और इतना लेट जाने का कोई मतलब भी नहीं था. 12 को जाना
यानि 13 पहुंचना, और 14 को वापिस आ जाना, तभी मेरे दो कामकाजू मित्र 16 को ऑफिस
ज्वाइन कर सकते थे. तो ऐसे कुछ घंटों के लिए खजुराहो को धप्पा मार का आने का कोई
मतलब नहीं था.
इधर पिछले एक घंटे से कुणाल का फोन स्विच ऑफ जा रहा था, सो अब हमें आगे क्या
करना है यह भी तय नहीं हो पा रहा था. बिना कुणाल से बात किए हम कोई भी स्टेप नहीं
ले सकते थे. हमें मेहसाणा से अहमदबाद पहुंचना था, कुणाल वहीँ रहते हैं, सो वो वहीँ
से सीधा स्टेशन आने वाले थे.
अब सामान बाँध कर हम इस सोच में डूबे हुए थे जो कहीं के नहीं रह जाते हैं वो
कहाँ जाते हैं? पिछले १० साल से मैं खजुराहो जाने का ख़्वाब पाले हुआ था. तीन-चार
बार पूरी शिद्दत से जाने की कोशिश कर चूका था, हर बार कोई न कोई अरंगा खड़ा हो जाता
था और जाना रद्द हो जाता था. इस बार भी यही लग रहा था. टिकट का ऐन एक-दो-तीन पर
आकर अटक जाना, अचानक कुणाल के फ़ोन का स्विच ऑफ हो जाना कुछ शुभ संकेत नहीं लग रहा
था. इन सब प्रतिकूल स्थिति में सुकून सिर्फ इस बात का था कि टिकट ख़ुद से केंसल न
करा कर हमने 180 रुपए बचा लिया था. लेकिन यह ख़ुशी भी फूस की आग की तरह ज्यादा देर
टिक नहीं पाई. 3 बजे के क़रीब IRCTC मेसेज आया कि आपका टिकट केंसल हो गया है और
आपका 180 रुपया कट गया है. दरयाफ्त करने पर पता चला कि अब ऑटो-ऑटोकेंसेलेशन पर भी
पैसा कटता है. मन खिन्न हो गया. यही 180 रुपया बचाने के लिए तो हमने टिकट केंसल
नहीं किया था. अगर यह 180 गवाना ही था तो हम कब का टिकट केंसल करके तत्काल से बुक
लिए होते.
खैर, कोई ३ बजे, कुणाल का फ़ोन आया, पता चला कि बेट्री डाउन हो जाने की वजह से भाई
साहब का दोनों फोन ऑफ हो गया था. ये भी खूब रहा, अगर ऐन मौके पर बेट्री डाउन ही हो
जाए तो लानत है नोकिया फ़ोन पर, दो-दो मोबाइल रखने का क्या मतलब है फिर? खैर कोई
नहीं यह कुणाल का जाति मामला है कि इस घटना के बाद उन्हें दो फ़ोन रहना चाहिए या
नहीं. चलिए आगे बढ़ते हैं... काफी देर तक घमर्थन करने के बाद हमने ये तय पाया कि
अहमदाबाद से आज रात की कोई बस लेकर हम भोपाल जाएँगे और फिर वहां पहुँच कर तय करेंगे
आगे क्या और कैसे करना हैं. यह भी कुछ तय करना हुआ? बस की टिकट बुक करने का जिम्मा
कुणाल ने अपने सिर लिया. हमें दिलासा दिया कि तुरंत टिकट बुक करके इत्लिया करता
हूँ. सुरंग के उस तरफ मुझे रौशनी दिखने लगा, उम्मीद का बुझता हुआ दिया फिर से
टिमटिमाने लगा. और खुली आँखों से मैं खाजुरोहों के देवी-देवताओं का दर्शन करने
लगा. एक घंटे बाद जब मैं ये पता करने के लिए कुणाल को कॉल किया कि टिकट बुक हुआ कि
नहीं, कुणाल का फ़ोन एक बार फिर से ऑफ जा रहा था. अब हमें अपने भाग्य के साथ-साथ
कुणाल के इरादे पर भी संदेह होने लगा था. हम सामान बाँध कर घर के बाहर बैठे हुए
थे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. पीछे घर अच्छा नहीं लग रहा था,
आगे कोई मंजिल नहीं दिख रही थी. घनघोर अवसाद के क्षण में हमने ये तय किया कि अब हम
माउंट आबू जाएँगे और वहीँ ग़म ग़लत करेंगे. लेकिन अगले ही क्षण इस विचार पर उलटी आने
लगा. कहाँ खजुराहो जाने का सुनहरा ख्वाब
और कहाँ आबू की घिसीपिटी गलियां. मन ओकिया-सा गया.

अगर सिर्फ पांच मिनट और देर हो गया होता कुणाल का कॉल आने में तो हम अपने घर
के पंखे से लटक कर जान दे दिए होते. और विदेह खजुराहो की ओर रवाना हो लिए होते.
लेकिन, जैसे अभी तक सभी कुछ ऐन वक्त पर होता आ रहा था, उसी तरह ठीक ऐन वक्त पर
कुणाल का कॉल आ गया, और शरीर छोड़ने के पाप और विदेह खजुराहो जाने के सुख से हम
वंचित रह गए. 1714/- रुपया में कुणाल ने अहमादाबाद से भोपाल की टिकट, रेड बस के
थ्रू, बुक कर लिया था. कुणाल ने जब टिकट वाला मेसेज फॉरवर्ड किया तो थोड़ी तसल्ली
मिली. और हम आनन-फानन में घर से बस स्टैंड की ओर अहमादाबाद के लिए बस लेने निकल
पड़े.
“खजुराहो जा रहे हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आप अहमादाबाद को
हलके में लेंगे”, कुणाल ने खिड़की
से बाहर एक पुरानी इमारत की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा. हम महासागर परिवहन की
शानदार एसी बस में बैठे..नहीं ...नहीं.. लेटे हुए थे. ट्रेन टिकट के रद्द हो जाने
और 180 रुपए कटने का अब हमें कोई मलाल नहीं था. हम तीनो अपनी-अपनी खिड़की के बाहर
का नज़ारा देखने मैं व्यस्त थे. तभी अचानक वो पॉइंट आगया जहाँ से कूद कर मेरे एक
दोस्त की भाभी अभी एक महीना पहले आत्महत्या की थी. पीछे छुट गए दो टुअर बच्चे की
मनोस्थिति को सोचकर मैं थोड़ी देर के लिए अवसाद में चला गया. और जीवन और मृत्यु के विषय
में गंभीरता से सोच-विचार करने लगा. लेकिन मेरी ये सधुकड़ी ज्यादा देर नहीं चल पाई.
कुणाल के लतीफ़ों ने विचारों की अनवरत धारा को तोड़ दिया. और फिर हम ख़ुशगप्पी की नशिस्त
लगाकर बैठ गए.
बात-चीत करते-करते कब हमें नींद आ गई और कब हम सो गए, कुछ पता था. हमारी बस भी
कुछ अलग टाइप की थी. रात कहीं रुकी ही नहीं. कुणाल ने सुबह से कुछ खाया नहीं था.
हमने, हालाँकि, दोपहर में खाना का लिया था, लेकिन फिर भी थोड़ी भूख थी, सो हमने
सोचा था कि अगर बस कहीं रुकेगी तो हलझप्पी करेंगे. लेकिन बस कहीं रुई ही नहीं.
शायद जैसे हम खजुराहो पहुँचने के लिए अधीर थे, वैसे बस भोपाल पहुँचने के लिए बेचैन
थी. भोपाल पहुँचते-पहुँचते 12 बज गया, अगर समय से पहुँचते तो शयद 9 बजे के आस-पास
हम भोपाल पहुँच गए होते. लेकिन भारतीय धावक की तरह बस अपनी अनवरत गतिशीलता के
वावजूद बस मंजिल पर समय से नहीं पहुँच सका.
ISBT में घुसते के साथ ही मेरी निगाहे सुलभ-शौचालय को ढूँढने लगी. मेरा एक….. (क्रमशः)