Monday, 11 December 2017

और प्यार का भूत उतर गया........

Day-3 Running in the Evening 
और प्यार का भूत उतर गया........

पता नहीं अब ऐसा होता है या नहीं. लेकिन उन दिनों हमने किसी का भी नंबर या पता हासिल करने का नयाब तरीका ढूंढ निकाला था. MTNL के कस्टमर केयर में कॉल करके पता बताने पर वे लोग उस पते पर लगा MTNL का फ़ोन नंबर बता देते थे. और यदि आपके पास फोन नंबर है तो वो आपको पता बता देते थे. इसी तरीके से मैंने मीनाक्षी के घर का नंबर निकाल लिया था. दो चार दिन तक उस नंबर को मोबाइल के सेव करके मैं इतराता रहा, लेकिन कॉल करने की हिम्मत नहीं हुई. उन दिनों प्यार के मामले में मेरी हालत उन कुत्तों की तरह थी जो कार के पीछे बिना यह जाने भागते हैं कि अगर कार उन्हें मिल गया तो करेंगे क्या? “शादी-मुझे करनी नहीं है, सेक्स-बाप रे! ऐसा मैं सोच भी कैसे सकता हूँ,.

एक महीना तक हमारा बस देखा-देखी चलता रहा. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे और क्या करना है. “हो तो गया वह मुझे देखती है, मैं उसे देखता हूँ, अब और इससे आगे क्या चाहिए...?” लेकिन मीनाक्षी को इससे आगे भी कुछ चाहिए था, एक दिन अपने छत के रेलिंग के एकदम पास आ कर, गर्दन उपर करके मुझसे बोली, “तुम कुछ बोलते क्यों नहीं हो...?”. भाई साहब यकीन मानिये मेरी तो एकदम से सिटीपिटी गुम हो गई. मैं नीचे उसकी ओर देखता है, गले से थूक सटका, लाख कोशिश के बावजूद भी मेरे अन्दर से एक शब्द भी नहीं निकला. थोड़ी देर तक मेरी ओर देखते रहने के बाद वह वहां से कुछ बुदबुदा कर चली गई, शायद मुझे गाली देकर चली गई.
रात मुझे तेज़ बुखार हो गया, पूरी रात नींद नहीं आई. अगले दिन फिर से हमेशा की तरह शाम का इंतजार करने लगा. लेकिन आज उसके सामने जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. पता नहीं किस चीज़ से डर गया था मैं, अपने कमरे में दुबका बैठा रहा. अगले दो दिन तक यही किस्सा चला. तीसरे दिन सुबह मेरे ऊपर किसी जादूई शक्ति का इल्हाम हुआ और मैंने तय किया कि आज मैं उससे बात करूँगा. और उसे दिखा दूंगा कि मैं कोई डरपोक और बुजदिल नहीं हूँ. मजीद इंतजार के बाद वह वक़्त आया जब वह क्लास लेने के लिए अपने घर से निकली. मैं उसके पीछे हो लिया. पांच मिनट बाद हम मेन रोड पर आ गए. उसने अभी तक एक बार भी मुझे पीछे मुड़ कर नहीं देखा था. शायद उसे इस बात का इल्म नहीं था कि मैं उसका पीछा कर रहा हूँ या उसके पीछे चल रहा हूँ.
चित्र साभार-गूगल 
“Excuse me!”, मैंने पीछे से आवाज़ लगाईं. उसने पलट कर देखा. “क्या है..” उसने हडबडी दिखाते हुए कहा. “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है..’’, तेज़ कदमो से पीछे चलते हुए मैंने कहा. वह अचानक तेज-तेज चलने लगी थी. “जो भी कहना है जल्दी कहो..” बिना मेरी तरफ देखे बोली और आगे बढ़ती रही. इससे पहले कि मैं उसे कह पता कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ, तुझसे दोस्ती करना चाहता हूँ. एक कार ठीक मेरे बगल में आ कर रुकी. शीशा खुला, ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के ने मुझसे पूछा, “क्या है भाई, क्यों परेशान कर रहा है उसे, कहाँ रहता है तूं....?” मुझे काटो तो खून नहीं. “यहीं लालबाग में रहता हूँ...” मैंने हकलाते हुए गलत पता बताया. और तेज़ी से वहां से भागा...बिलकुल वैसे ही जैसे आजकल सुबह खेत में भागता हूँ. बीस मिनट तक भगने के बाद एक घर के नीचे बैठ गया. आधा घंटा तक चिंतन-मनन करने के बाद सीधा नाई के पास गया और अपने अर्जुनरामपाल कट बाल को फौजी कट करवा कर घर लौट आया. बाल के साथ सिर से प्यार का भूत भी उतर गया. दो चार दिन बाद घर खाली कर के दूसरे मोहल्ले में चला गया.

Saturday, 9 December 2017

‘म’ की महिमा (डायरी)

Running Day-2 (10-12-2017)

2014 के सितम्बर में जब तीन दिन के लिए मुंबई से मेहसाणा आया था तो किसने सोचा था कि 3 दिन तीन साल में बदल जाएगा. मेहसाणा में तीन दिन बिताने के बाद वापिस जाते समय अहमदाबाद स्टेशन पर हमने यह तय किया था कि जॉब छोड़ कर तीन महीना मेहसाना में रहेंगे. 
अक्टूबर में 7 को दरमाहा मिलने के बाद जॉब छोड़ दिया और 9 को मुंबई से रवाना हो लिए मेहसाना के लिए. म-से मुंबई छोड़ा और म-से मेहसाना आया और म-से मनुजी के आश्रम म-से मनन में रहने लगा. शुरू में प्लान यह था कि तीन महीना मेहसाना में रह कर कहीं और चला जाऊंगा और फिर वहां तीन महीना रहूँगा. और इसी तरह तीन-तीन महीना करके अलग-अलग शरह में बिताऊंगा. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेहसाना का तीन महीना आज तीन साल में बदल चुका है. 


म-से मनाली से आने के बाद जबसे (मतलब दो दिन से) मैंने दौड़ना शुरू किया है मेरे अन्दर नए-नए विचारों का जन्म हो रहा है. उनमे से एक ताज़ा विचार यह है कि ‘अब मेहसाना में नहीं रहना है.’ अभी जनवरी में 7 दिन के लिए Goa जाने का प्लान था, लेकिन अब सोच रहा हूँ कि मेहसाना छोड़कर तीन-चार महीना Goa में ही बिताऊँ. 
‘म’ की महिमा का बखान करते हुए याद आया कि मेरे बचपन के पहले दोस्त का नाम भी म-से मुकेश है. और हैरानी की बात है कि जिस लड़की से मुझे पहली दफ़ा मोहब्बत हुआ था, यानि जिसको देख कर यह एहसास हुआ कि दिल सच में धड़कता है, का नाम भी म-से मीनाक्षी था. और जिस चीज़ की तलाश में मैं पिछले कई सालों से भटक रहा हूँ क़िबला वह भी म-से मोक्ष है. और कमाल है कि जीवन की गंगोत्री भी तो म-से माँ है. और मैं और भी अचंभित हो रहा हूँ क्योंकि मेरी माँ नाम भी म-से मीरा है.

नोट- इस पुरे लेख में ‘म’ का कुल 61 बार इस्तेमाल हुआ है

फुर्रर्रर्रर्रर...


Running Day-1 (09/12/2017)
अभी जब मनाली में था तभी क़सद किया था कि मेहसाना पहुंचकर दौड़ना शुरू करूँगा. पता नहीं कैसे दौड़ने का ख्याल आया. फिट रहने के लिए योग का और जिम का सहारा कई बार ले चुका हूँ, दौड़ना पहली बार शुरू किया है. आज सुबह जब दौड़ रहा था तो याद आया कि बचपन में हम चलते कम और दौड़ते ज्यादा थे. कहीं भी जाना होता था तो दौड़ कर जाते थे. घरवालों को भी जब हमसे कोई काम करवाना होता था तो यही कहते थे, “दौड़ कर जाओ...”. फिर धीरे-धीरे वक़्त के साथ जब बड़े हुए तो दौड़ना कम हो गया. दौड़ना थोड़ा अजीब सा लगने लगा, क्योंकि कोई भी बड़ा व्यक्ति कभी दौड़ता नहीं था. शुरू-शुरू में हैरान भी होता था कि ये बड़े-बूढ़े कभी दौड़ते क्यों नहीं हैं?

सुबह जब दौड़ना शुरू किया तो थोड़ी देर बड़ा अजीब सा लगा, ‘लोग क्या सोचेंगे इतना बड़ा आदमी दौड़ क्यों रहा है?’, सिर झटक कर विचार को तर्क किया. ‘सोचेंगे कि फिट रहने के लिए दौड़ रहा है, और भी लोग दौड़ते हैं मैं कोई अकेले थोड़े हूँ.’ फिर कान में लीड लगा कर दौड़ने लगा. लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिट रहने के लिए दौड़ने का ख्याल बड़ा बेहूदा लगने लगा. इस ख्याल के साथ मैं ज्यादा देर नहीं दौड़ सकता था. 

चित्र साभार- गूगल 
पांच मिनट बाद मैं ट्रैक छोड़ कर खेत में उतर गया और खेत की मुंडेर पर उसी तरह दौड़ने लगा जैसे 20 साल पहले बचपन में दौड़ा करता था-सिर्फ दौड़ने के लिए. दौड़ने का अंदाज़ एकदम से बदल गया. अभी पांच मिनट पहले समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कदम उठाऊँ, हाथ को कैसे और कहाँ रखूं, बड़ा अटपटा सा लग रहा था सब कुछ. लेकिन जैसे ही खेत में दौड़ना शुरू किया सब याद आ गया. दोनों होठों को थरथराते हुए गाड़ी स्टार्ट की और हाथ को हवा में लहराते हुए फुर्रर्रर्रर्रर...हो गया.

Friday, 8 December 2017

खजुराहो की खोज (यात्रा-वृतांत)

               'टिकट बुक ट्रेन की थी, लेकिन पहुंचे हम खजुराहो बस से.' 
कोई 15 दिन पहले जब हमने टिकट बुक किया था तो वेटिंग 40, 41 और 42 था. सो सोचा कि शायद कन्फर्म हो जाएगा और यदि नहीं भी हुआ तो तत्काल से बुकिंग करके चले जाएँगे. लेकिन सब गड़बड़ हो गया. ऐन वक्त पर वेटिंग 3, 2, और 1 पर आकर अटक गया. हमने सोचा था कि ट्रेन सोमनाथ से 9:30 पर खुलती है, तो सुबह 5 बजे के आस-पास चार्ट तैयार होगा और हमें हमारे टिकट का स्टेटस पता चल जाएगा. अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो 11 बजे अगले दिन यानि 11 अगस्त के लिए तत्काल से बुक कर लेंगे या फिर बस से चले जाएँगे.
रात को चार बजे मेरी नींद खुली गई, तभी से जगकर मैं चार्ट तैयार होने का इंतजार करने लगा. जाने की उत्सुकता व उत्तेजना ने नींद उड़ा दी थी. उम्मीद था की 6 बजे तक रेलवे से मेसेज आ जागेगा. लेकिन 6 क्या 8 बजे तक भी कुछ नहीं हुआ. फिर 9 बजे के क़रीब इस आशंका से घबरा कर कि कहीं ट्रेन रद्द न हो गया हो 139 पर कॉल किया. वहां से पता चला कि ट्रेन अपने समय से सोमनाथ से चलेगी. और हमारा चार्ट 2:30 के आस-पास तैयार होगा. यानि हमारे बोर्डिंग समय, जो कि अहमादाबाद से 6:30 का था, से क़रीब चार घंटा पहले. मतलब अब हम आज तत्काल बुक नहीं कर सकते थे. और अभी वेटिंग केंसल करने का मतलब एक भी पैसा वापिस नहीं मिलेगा. अब हमारे लिए दूध और माछ दोनों बांतर था.
खैर, अल्लाह-अल्लाह करते हुए हमने पैकिंग कर ली और सारा सामान बाँध कर ढाई बजने का इंतज़ार करने लगे. और अंत में वही हुआ जो अपेक्षित नहीं था, टिकट कन्फर्म नहीं हुआ. अब तीन बजे तो तत्काल बुक नहीं हो सकता था. मतलब अब हम 12 अगस्त से पहले ट्रेन से नहीं जा सकते थे. और इतना लेट जाने का कोई मतलब भी नहीं था. 12 को जाना यानि 13 पहुंचना, और 14 को वापिस आ जाना, तभी मेरे दो कामकाजू मित्र 16 को ऑफिस ज्वाइन कर सकते थे. तो ऐसे कुछ घंटों के लिए खजुराहो को धप्पा मार का आने का कोई मतलब नहीं था.
इधर पिछले एक घंटे से कुणाल का फोन स्विच ऑफ जा रहा था, सो अब हमें आगे क्या करना है यह भी तय नहीं हो पा रहा था. बिना कुणाल से बात किए हम कोई भी स्टेप नहीं ले सकते थे. हमें मेहसाणा से अहमदबाद पहुंचना था, कुणाल वहीँ रहते हैं, सो वो वहीँ से सीधा स्टेशन आने वाले थे.  
अब सामान बाँध कर हम इस सोच में डूबे हुए थे जो कहीं के नहीं रह जाते हैं वो कहाँ जाते हैं? पिछले १० साल से मैं खजुराहो जाने का ख़्वाब पाले हुआ था. तीन-चार बार पूरी शिद्दत से जाने की कोशिश कर चूका था, हर बार कोई न कोई अरंगा खड़ा हो जाता था और जाना रद्द हो जाता था. इस बार भी यही लग रहा था. टिकट का ऐन एक-दो-तीन पर आकर अटक जाना, अचानक कुणाल के फ़ोन का स्विच ऑफ हो जाना कुछ शुभ संकेत नहीं लग रहा था. इन सब प्रतिकूल स्थिति में सुकून सिर्फ इस बात का था कि टिकट ख़ुद से केंसल न करा कर हमने 180 रुपए बचा लिया था. लेकिन यह ख़ुशी भी फूस की आग की तरह ज्यादा देर टिक नहीं पाई. 3 बजे के क़रीब IRCTC मेसेज आया कि आपका टिकट केंसल हो गया है और आपका 180 रुपया कट गया है. दरयाफ्त करने पर पता चला कि अब ऑटो-ऑटोकेंसेलेशन पर भी पैसा कटता है. मन खिन्न हो गया. यही 180 रुपया बचाने के लिए तो हमने टिकट केंसल नहीं किया था. अगर यह 180 गवाना ही था तो हम कब का टिकट केंसल करके तत्काल से बुक लिए होते. 
खैर, कोई ३ बजे, कुणाल का फ़ोन आया, पता चला कि बेट्री डाउन हो जाने की वजह से भाई साहब का दोनों फोन ऑफ हो गया था. ये भी खूब रहा, अगर ऐन मौके पर बेट्री डाउन ही हो जाए तो लानत है नोकिया फ़ोन पर, दो-दो मोबाइल रखने का क्या मतलब है फिर? खैर कोई नहीं यह कुणाल का जाति मामला है कि इस घटना के बाद उन्हें दो फ़ोन रहना चाहिए या नहीं. चलिए आगे बढ़ते हैं... काफी देर तक घमर्थन करने के बाद हमने ये तय पाया कि अहमदाबाद से आज रात की कोई बस लेकर हम भोपाल जाएँगे और फिर वहां पहुँच कर तय करेंगे आगे क्या और कैसे करना हैं. यह भी कुछ तय करना हुआ? बस की टिकट बुक करने का जिम्मा कुणाल ने अपने सिर लिया. हमें दिलासा दिया कि तुरंत टिकट बुक करके इत्लिया करता हूँ. सुरंग के उस तरफ मुझे रौशनी दिखने लगा, उम्मीद का बुझता हुआ दिया फिर से टिमटिमाने लगा. और खुली आँखों से मैं खाजुरोहों के देवी-देवताओं का दर्शन करने लगा. एक घंटे बाद जब मैं ये पता करने के लिए कुणाल को कॉल किया कि टिकट बुक हुआ कि नहीं, कुणाल का फ़ोन एक बार फिर से ऑफ जा रहा था. अब हमें अपने भाग्य के साथ-साथ कुणाल के इरादे पर भी संदेह होने लगा था. हम सामान बाँध कर घर के बाहर बैठे हुए थे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. पीछे घर अच्छा नहीं लग रहा था, आगे कोई मंजिल नहीं दिख रही थी. घनघोर अवसाद के क्षण में हमने ये तय किया कि अब हम माउंट आबू जाएँगे और वहीँ ग़म ग़लत करेंगे. लेकिन अगले ही क्षण इस विचार पर उलटी आने  लगा. कहाँ खजुराहो जाने का सुनहरा ख्वाब और कहाँ आबू की घिसीपिटी गलियां. मन ओकिया-सा  गया.

अगर सिर्फ पांच मिनट और देर हो गया होता कुणाल का कॉल आने में तो हम अपने घर के पंखे से लटक कर जान दे दिए होते. और विदेह खजुराहो की ओर रवाना हो लिए होते. लेकिन, जैसे अभी तक सभी कुछ ऐन वक्त पर होता आ रहा था, उसी तरह ठीक ऐन वक्त पर कुणाल का कॉल आ गया, और शरीर छोड़ने के पाप और विदेह खजुराहो जाने के सुख से हम वंचित रह गए. 1714/- रुपया में कुणाल ने अहमादाबाद से भोपाल की टिकट, रेड बस के थ्रू, बुक कर लिया था. कुणाल ने जब टिकट वाला मेसेज फॉरवर्ड किया तो थोड़ी तसल्ली मिली. और हम आनन-फानन में घर से बस स्टैंड की ओर अहमादाबाद के लिए बस लेने निकल पड़े.
“खजुराहो जा रहे हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आप अहमादाबाद को हलके में लेंगे”, कुणाल ने खिड़की से बाहर एक पुरानी इमारत की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा. हम महासागर परिवहन की शानदार एसी बस में बैठे..नहीं ...नहीं.. लेटे हुए थे. ट्रेन टिकट के रद्द हो जाने और 180 रुपए कटने का अब हमें कोई मलाल नहीं था. हम तीनो अपनी-अपनी खिड़की के बाहर का नज़ारा देखने मैं व्यस्त थे. तभी अचानक वो पॉइंट आगया जहाँ से कूद कर मेरे एक दोस्त की भाभी अभी एक महीना पहले आत्महत्या की थी. पीछे छुट गए दो टुअर बच्चे की मनोस्थिति को सोचकर मैं थोड़ी देर के लिए अवसाद में चला गया. और जीवन और मृत्यु के विषय में गंभीरता से सोच-विचार करने लगा. लेकिन मेरी ये सधुकड़ी ज्यादा देर नहीं चल पाई. कुणाल के लतीफ़ों ने विचारों की अनवरत धारा को तोड़ दिया. और फिर हम ख़ुशगप्पी की नशिस्त लगाकर बैठ गए.
बात-चीत करते-करते कब हमें नींद आ गई और कब हम सो गए, कुछ पता था. हमारी बस भी कुछ अलग टाइप की थी. रात कहीं रुकी ही नहीं. कुणाल ने सुबह से कुछ खाया नहीं था. हमने, हालाँकि, दोपहर में खाना का लिया था, लेकिन फिर भी थोड़ी भूख थी, सो हमने सोचा था कि अगर बस कहीं रुकेगी तो हलझप्पी करेंगे. लेकिन बस कहीं रुई ही नहीं. शायद जैसे हम खजुराहो पहुँचने के लिए अधीर थे, वैसे बस भोपाल पहुँचने के लिए बेचैन थी. भोपाल पहुँचते-पहुँचते 12 बज गया, अगर समय से पहुँचते तो शयद 9 बजे के आस-पास हम भोपाल पहुँच गए होते. लेकिन भारतीय धावक की तरह बस अपनी अनवरत गतिशीलता के वावजूद बस मंजिल पर समय से नहीं पहुँच सका.
ISBT में घुसते के साथ ही मेरी निगाहे सुलभ-शौचालय को ढूँढने लगी. मेरा एक….. (क्रमशः)


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...