Sunday, 27 May 2018

“द आउटसाइडर’


              किताब का नाम- द आउटसाइडर, लेखक- अल्बर्ट कामू
               “My mother died today. Or maybe yesterday, I don’t know.”- The outsider
अलबर्ट कामू पिछली सदी के उन चंद ख़तरनाक लोगों में से एक हैं, जिनको पढ़ना और जिनसे बचना दोनों ही बहुत ज़रूरी है| लेकिन समस्या यह है कि यह दो काम एक साथ संभव नहीं है| अगर आप इनको पढ़ते हैं, तो इन से बचना क़रीब-क़रीब असंभव है| क़रीब-क़रीब इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि कुछ हैं जिनकी बुद्धि भैंस की चमड़ी जितनी मोटी होती है, (ये भेंस की चमड़ी वाली बात बचपन में माँ मेरे लिए इस्तेमाल में लाती थी) ऐसी मोटी बुद्धि वाले लोग, पढ़कर भी बच सकते हैं| बांकी जो थोड़े भी समझदार और चेतनावान हैं, उन के लिए बचना बहुत ही मुश्किल है|
                             “Mama often said that no one is ever really entirely unhappy.”
कामू की द आउटसाइडर’ 120 पेज की एक बहुत ही पतली किताब है| किताब को बड़े आराम से एक दिन में पढ़ा जा सकता है, कहनी बिलकुल सरल और सीधी है| लेकिन इसको पचाने में आपको सालों लग सकते हैं| और अगर ग़लती से आप इसे नहीं पचा पाए, तो पहले यह नासूर बनेगा, फिर नासूर से कर्क रोग, और अंत में आप केंसर से मर जाएंगे| तो, इसे पढ़ने से पहले अच्छे से सोच विचार कर लेना जरूरी है| नहीं तो आपकी स्थिति सांप छुछुंदर जैसी हो जाएगी| अगर पचा लिया, तो आप एक ऐसे व्यक्ति हो जाएंगे, जिस तरह के व्यक्तियों से आपके माता-पिता बचपन में आपको हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे| और अगर नहीं पचा पाए, तो कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से आपकी मौत होगी|

कामू का मर्सो बहुत ही ख़तरनाक आदमी है| सामने माँ की लाश पड़ी है, और वह रोने-धोने के बजाए सिगरेट फूंक रहा है| 24 घंटे भी माँ को जलाए नहीं हुए हैं, और वह स्विमिंग पूल में अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ रंगरलियां मना रहा है, “Gentlemen of the Jury, just after his mother’s death, this man went swimming, began a casual affair and went to see a comedy. I have nothing more to say.” लेकिन इस सब का यह अर्थ नहीं है कि मर्सो अपनी माँ से प्यार नहीं करता है| नहीं वह अपनी माँ से उतना ही प्यार करता है, जितना कोई भी बेटा अपनी माँ से कर सकता है, “I undoubtedly loved Mama very much, but that didn’t mean anything. Every normal person sometimes wishes the people they love would die.” मर्सो वहां से बोल रहा हैं, जिसको जुंग ने स्टोरहाउस ऑफ़ कांशसनेसकहा है| यह वह जगह है, जहाँ आप दिन तो क्या रात सपने में भी जाना पसंद नहीं करते हैं|
                                                “Everything is true and nothing is true.”
द आउटसाइडरकामू की कालजयी रचना है| कामू का मर्सो मेरे लिए बिलकुल भी अजनबीनहीं है| साहित्य संसार में, कामू की द स्ट्रेंजर/आउटसाइडरपढ़ने से पहले, मर्सो के अलावा दो और लोगों को, मैं बहुत पहले से जानता था, जो मर्सो की तरह आउटसाइडर हैं| एक तुर्गनेव का बज़ारोव और दूसरा दोस्तोवस्की का रस्कोलनिकोव | तुर्गनेव का बज़ारोवमेरे सबसे अधिक पसंदीदा साहित्य चरित्रों में से एक है| रस्कोलनिकोव को में समझ सकता हूँ, इन फैक्ट उसे अच्छे से समझता हूँ, फिर भी उसमे कुछ ऐसा है जो मेरे लिए दस्तरस नहीं है| मेरी पूरी सहानुभूति उसके साथ नहीं है| बज़ारोव के साथ मेरी समानुभूति है, उसके साथ मैं 100 फीसदी राज़ी हूँ|
निज़ी ज़िन्दगी में भी, मैं मर्सो और बज़ारोव से बहुत ही अच्छे से परिचित हूँ| लेकिन आपके लिए किताब 10000 वोल्ट का झटका हो सकता है| इसीलिए जरा संभल कर| ‘तब्सिरापढ़ कर झट से आर्डर मत दे दीजिएगा| इस किताब को पढ़ने के बाद कई लोगों का दिमागी संतुलन बिगड़ चुका है| एक महानुभाव, जिनका नाम कामेल दाउद है, का दिमाग किताब पढ़ कर इतना सटक गया कि इन्होने इस किताब के खिलाफ एक पूरी किताब लिख दी| इसलिए ज़रा संभल कर, बहुत कठिन है डगर पनघट की| किताब का हैंगओवर महीनो तक आप पर हावी रह सकता है| एक बार दोस्तोवस्की की ब्रदर्स करमाज़ोवपढ़ते-पढ़ते मुझे ही ऐसा लगने लगा था कि कहीं मैं ही पागल ना हो जाऊं(क्या पता हो ही गया होऊं)| दोस्तोवस्की और कामू एक ही स्कूल से आते हैं| अतः दोनों, आपको सच में पागल कर सकते हैं| कामू एक बहुत ही ख़तरनाक दार्शनिक हैं, उनका दर्शन ईश्वर के इर्दगिर्द नहीं घूमता है| ईश्वर इत्यादि के बकवास में वे ज्यादा उत्सुक नहीं है| उनके लिए जीवन में एक ही मूलभूत समस्या है, आत्महत्या करें या ना करें?” इसीलिए अगर आपको जीवन पर पकड़ बनाए रखनी हो, तो कामू से थोड़ी दूरी बना कर रखिये|
“I have never truly been able to regret anything. I was always preoccupied by what was about to happen, either today or tomorrow.”
अगर आपको अपनी घर-गृहस्थी, और रोजगार ठीक ढंग से चलाना है, और किसी जोम्बी की तरह घिसट-घिसट कर मर जाना है, तो मैं यहाँ आपको उन लोगों के नामों की लिस्ट दे रहा हूँ, जिनसे मिलना तो दूर, आपको उनके आसपास भी नहीं फटकना चाहिए| दोस्तोवस्की(दइडियट और ब्रदर्स करमाज़ोव और नोट्स फॉर्म अंडरग्राउंड), तुर्गनेव (फादर्स एंड संस), कामू (द आउटसाइडर), हक्सले (आइलैंड), एलन वाट्स (दी बुक), टॉलस्टॉय (रेज़रेक्शन) और काफ्का (कहानियां), ये वो सात लोग हैं, जिन से आपको हमेशा बच कर रहना चाहिए| अगर ग़लती से भी कभी आप इनके चपेटे में आ गए, तो फिर धोबी के गधे की तरह, आप ना तो घर के रह जाएंगे, और ना ही घाट के| इस लिस्ट में दो और नाम हैं| ये दोनों भस्मासुर भारतीय हैं| मैंने जानबूझ कर इन दोनों महाभूपों का नाम लिस्ट में शामिल नहीं किया है| क्योंकि, ये दोनों लॉरेन हार्डी, उन लोगों के लिए हैं, जो अपना आमूल विनाश यानि सर्वनाश चाहते हैं| ये दोनों उनके लिए हैं, जिनके इंतजार में कबीर बीच गाँव में खड़े होकर कह रहे हैं, कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकठी हाथ जो घर बारे आपना चले हमारे साथ| ये उन फ़कीरों के लिए हैं, जिनकी घर फूंकने की तैयारी है, आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक"| जो एक बार घर छोड़ कर निकला तो फिर मुड़ कर नहीं देखा| ये उनके लिए लिए हैं जिनके कुल में अब कोई रोने धोने के लिए भी नहीं बचा,राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा
        “Even in the dock, it is always interesting to hear people talk about you.” -The outsider
अगर आप ख़ुद का नामोंनिशान हमेशा-हमेशा के लिए मिटाने के लिए आमादा हों, तो मैं आपको उनका नाम बता सकता हूँ| इन फैक्ट अभी ही बता देता हूँ, शुभ कार्य में विलंब क्यों? एक हैं मैरून माफ़िया के सरगना धार्मिक आतंकवादी ओशो’, और दूसरे हैं धर्म के ब्रह्मास्त्र जिद्दु कृष्णमूर्ति| ये दोनों वो तीर्थ हैं, जहाँ से नाहा कर कोई वापिस नहीं लौटता| ये दोनों काल के गाल हैं, एक बार अगर आप इनमे प्रवेश करते हैं, तो फिर ‘come back’ नहीं है| ये दोनों महामृत्यु हैं
ये दोनों बड़े ही अनूठे ढंग से आपका क़त्ल करेंगे| एक पहले लतीफ़ा और लच्छेदार बातें सुना कर आपको हँसाएगा, गुदगुदी लगेगा, हँसाते-हंसाते आपको बेसुध कर देगा| जब आप हँसते-हँसते बेहोश हो कर गिर जाएँगे, तब तर्क की दोधारी तलवार से आप का गला रेत दिया जाएगा| एक बूंद भी शोणित नहीं बहेगा और आप का काम तमाम हो जाएगा| दूसरा, आपको लतीफ़ा तो नहीं सुनाएगा, लेकिन बात ही इनती अनोखी बोलेगा कि सुन कर आपको हंसी आएगी| लेकिन क्या आपको हंसने दिया जाएगा? जी नहीं आपको हंसने नहीं दिया जाएगा| “Sir, please don’t laugh, don’t waste your energy.” ऐसा बोल कर आपको चुप कर दिया जाएगा| लेकिन कितनी देर कोई हंसी रोक कर बैठ सकता है? किसी भी चीज़ की एक सीमा होती है| आप का दम घुटने लगेगा, आपके प्राण शरीर छोड़ने के लिए छटपटाएंगे| जल्दी ही आप उस पॉइंट पर पहुँच जाएँगे, जहाँ एक और लतीफ़े जैसी बातअगर आपको सुनाई गई, और हंसने नहीं दिया गया, तो तक्षण आप पूरे हो जाएँगे| लेकिन आप उस क्षण इस घुटन भरी जिंदगी से मर जाना ज्यादा उचित समझेंगे| आपको अपने मरने का ग़म नहीं होगा| आपको बेसब्री से इंतजार कर  रहे होंगे एक और लतीफ़े जैसी बातकी..., आप चाह रहे होंगे हैं कि एक और लतीफ़ा आपको सुनाया जाए...., और आपको इस घुटन से..., इस देह की बोझ से मुक्ति मिल जाए| ताकि आप स्वर्ग में खुल कर हंस सके| लेकिन तभी कहानी में ट्विस्ट की तरह आपसे एक यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| प्रश्न सुनकर आप हंसी भूल जाएँगे| अब दांत निपोड़ने के बजाए, आप अपना सिर खुजाने लगेंगे| आपको सिर खुजाते देख कर, आपसे एक और यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| फिर आपको दाढ़ी में खुजली होने लगेगी| आपको अपनी दाढ़ी खुजाता देख कर, आप से तीसरा सवाल पूछा जाएगा| अब आपको पीठ में खुजली होने लगेगी| फिर चौथा प्रश्न, फिर पांचवा, फिर छठा, एक के बाद एक प्रश्नों की बमबारी शुरू हो जाएगी| अब, आपके पूरे शरीर में खुजली का भयंकर उत्पात मचेगा| सिर से लेकर पैर तक कोई ऐसा अंग नहीं बचेगा जहाँ आपको खुजली नहीं हो रही होगी| एक ऐसी घनघोर खुजली मचेगी, जिसकी आपने कभी सपनो में भी परिकल्पना नहीं की होगी| काश उस वक़्त आपके पास दस हाथ होते! लेकिन यह तो काशहै, हकीकत यह है कि आपके पास सिर्फ दो ही हाथ है| और दो कमज़ोर हाथों से आप कितना खुजा सकते हैं....? आपको अफ़सोस होगा कि आज ही आपने नाखून क्यूँ कटा था? आप सोचेंगे, 'आज अगर नाख़ून बड़े होते तो अच्छे से खुजा पता'| किसी से आप मदद भी नहीं मांग पाएँगे, क्योंकि आपका पड़ोसी भी आपनी खुजली शांत करने में व्यस्त होगा| पहले से पता होता, तो घर से खुजली की कोई दवाई, लेकर आये होते, लेकिन अब इस वक्त इस निर्जन में क्या उपाय करे कोई? अरे पहले पता होता तो आप आते ही नहीं, लेकिन अब क्या हो सकता है? खुजली का भयंकर उत्पात परमाणु के विस्फोट की तरह एक से तीन, तीन से 9 और फिर 9 से अनंत की तरफ बढ़ता ही चला जाएगा| अंत में कुछ खुलजी और कुछ खुलजी को ना खुजा पाने की खुजली की वजह से, मौके पर ही आप टें बोल देंगे| और किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होगी कि आप खुजली से मरे|  "वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किस ने किया है, ये काम किस का था " |  फिर घटेगा चमत्कारों का चमत्कार, मर कर आप पाएँगे कि जीतेजी जिन यक्ष प्रश्नों को सुन कर सिर खुजा रहे थे, मरते ही उन सारे प्रश्नों का आपको हल मिल गया| लेकिन अब इस ज्ञान का क्या फायदा? क्या बरसा जब कृषि सुखाने? 
“She murmured that I was very strange, that she undoubtedly loved me for that very reason, but that one day she might find me repulsive, for the some reason.” –The outsider
इन सात और दो नौ, लोगों से अगर आप ख़ुद को बचा लेते हैं, तो आप हमेशा सेफ है, फिर कोई माई-का-लाल आपको आपके नर्क से खीच कर बाहर नहीं ला सकता है| फिर आराम से नौकरी कीजिये, पैसा कमाइए, घर बनाइये, नाम कमाइये, जो मन में आये वो कीजिये, जिंदगी अपनी है, मौज जीते से रहिए| बस इन कुल-सोधनोंसे बचिए| अगर आपको रस्ते में सांप और इन दोनों में कोई एक साथ दिख जाएँ, तो पहले इनको मारिये, सांप का काटा तो बच भी सकता है, लेकिन इनका काटा हुआ, बिना पानी मांगे ही दम तोड़ देता है|  जैसे शंकर ने कहा था भज गोविन्दं मूढ़मते, उसी तरह मैं आप से कहना चाहता हूँ, बच इन दोनों से मूढ़मते, बच| इनसे अगर जान बच गई, तो जीने के लाखो उपाय कर लेंगे| फिर तो, सौ-सौ जूते खाएँगे, मगर तमाशा घुस कर देखेंगे| 
“The first few days she was at the old people’s home, she often cried. But that was because her routine had changed. After a few months, she would have cried if she’d been taken out of the home. For the same reason.” – The outsider


Saturday, 26 May 2018

'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस'- तब्सिरा

किताब का नाम- 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस', लेखक-ऑस्पेंसकी 

आज मैं आपसे जिस किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ उसका नाम है ‘इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस’, इस किताब को विश्व प्रसिद्द पुस्तक Tertium Organum’  के लेखक पी.डी ऑस्पेंसकी ने लिखा है| ऑस्पेंसकी ने जार्ज गुरजिएफ, जोकि पिछली सदी के सात सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे, के श्री चरणों में बैठ कर जो कुछ भी आत्मसात किया, उसे इस किताब में लिखा है| यह किताब इस अस्तित्व की तरफ से मनुष्य को दिया हुआ एक अनुपम भेंट है| पश्चिम में पैदा हुआ पहला उपनिषद है| अस्तित्व के तमाम रहस्यों की कुंची है| साधना पथ पर चल रहे साधकों के लिए पाथेय है| अस्तित्व के किसी अलौकिक लोक से उतरी आकाशसंहिता है|
सन 2014 के सितम्बर महीने में, बंबई में एक पब्लिकेशन हाउस में काम करते हुए, इस किताब को मैंने पीडीऍफ़ में पढ़ना शुरू किया था| 60 पेज पढ़ने के बाद, मैंने किताब को आगे नहीं पढ़ा| एक सच्चा रीडर किसी भी किताब का दस पेज पढ़ कर, यह समझ जाता है कि किताब को कहाँ, कब और कैसे पढ़ना चाहिए| किताब को पढ़ने के लिए जितनी पात्रता चाहिए, उस वक़्त उतनी पात्रता मुझ में नहीं थी| नवंबर में, मैंने नौकरी से अवकाश लिया और गुजरात के एक आश्रम में आकर रहने लगा| किताब पढ़ने के लिए जैसा माहौल और स्थान चाहिए था, वो मुझे आश्रम में मिल गया| प्रकृति का सानिध्य, मौन वातावरण, पक्षियों का अविरल कलरव, कहीं जाने और कुछ करने की आपाधापी से मुक्ति, यानि तनाव रहित जीवन, सब साज सही बैठ गया था| मैंने दूबारा किताब पढ़ना शुरू किया, लेकिन कुछ ही पृष्ट पढ़ने के बाद, मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि अभी भी कुछ कमी है| जल्दी ही समझ आ गया कि सही स्थान और माहौल के साथ-साथ, इस किताब को पढ़ने के लिए एक ख़ास प्रकार की भीतरी भाव दशा की भी ज़रूरत है|
एक साल के तवील इंतजार के बाद वो मुबारक घड़ी आई, जब मुझे लगा कि अब मैं सब तरह से इस किताब को पढ़ने के लिए तैयार हूँ| मैंने फिर से किताब पढ़ना शुरू किया| लेकिन आश्चर्य, इस बार फिर मुझे किसी अहम् चीज़ की कमी महसूस होने लगी| मैंने 10 पेज पढ़ कर फिर किताब पढ़ना बंद कर दिया| बहुत सिर खपाने के बाद भी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या चीज़ missing है|
11 दिन बाद 2 अक्टूबर को मेरा जन्म दिन था| आप यकीन नहीं करेंगे, उस दिन यह किताब मुझे मेरे एक बेहद अज़ीज़ मित्र ने गिफ्ट दिया| मेरे लिए यह बहुत ही हैरानी की बात थी| अपने अलावा मैंने यह बात किसी से नहीं बताई थी कि पिछले 13 महीने से मैं इस किताब को पढ़ने के लिए जद्दोजहद कर रहा हूँ| मैंने आज तक यह किसी को नहीं बाताया कि 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस' पढ़ने के लिए, मैं मुंबई से जॉब छोड़ कर गुजरात आश्रम में रहने आया था| पहली बार इस ब्लॉग पर यह सब शेयर कर रहा हूँ| शायद इससे पहले यह सब किसी को कहता भी, तो कोई नहीं समझता|  
गिफ्ट रैप हटा कर, जब मैंने किताब हाथ में लिया तो तक्षण एक बात बिजली की तरह मेरे भीतर कौंध गई| मुझे सब साफ़ हो गया कि सब कुछ ठीक होते हुए भी, क्या ठीक नहीं लग रहा था| इस किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप था| इस किताब क्या किसी भी किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप है| एक ग्रंथ को पीडीऍफ़ में पढ़ने की भूल कैसे कर रहा था मैं? अपनी मुर्खता पर मुझे हंसी आने लगी| उस दिन के बाद से आज तक मैंने कोई भी किताब पीडीऍफ़ में नहीं पढ़ी, जो भी पढ़ना होता है, उसे अमेज़न, फ्लिप्कार्ट या फिर दूकान से खरीद कर लाता हूँ|

आधी किताब ख़त्म होते-होते, मुझे फिर कुछ गड़बड़ लगने लगी| इस बार भी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ भूल हो रही है| मैंने किताब पढ़ना बंद नहीं किया| दिन में 2-3 पेज ही सही, लेकिन पढ़ता ज़रूर था| इसी दौरान, मैंने एक प्रयोग करना शुरू किया| किताब को अलग-अलग जगह, और भिन्न-भिन्न भावदशा में पढ़ कर देखने लगा| कभी ट्रेन में सफर करते हुए, कभी किसी पेड़ के नीच बैठ कर, कभी खाने की टेबल पर, कभी एक हाथ में मोबाइल तो एक हाथ में किताब लेकर| लेकिन, हर बार निराशा ही हाथ लगती थी| सब तरह से कोशिश कर के देख लिया| हर तरह से निराशा ही हाथ लग रही थी| किताब किसी लज्जावान स्त्री की तरह अपने को मुझसे छिपा ले रही थी| जहाँ भी घूमने जाता था, मैं किताब को अपने साथ लेकर जाता था| बहुत सी जगहों पर, बहुत से लोगों के साथ, और बहुत से अलग-अलग मनोदशा में मैंने पढ़ कर देखा| कहीं कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली| जितना मैं किताब के रहस्य को खोलने की कोशिश करता था, उतना ही कछुये की तरह किताब ख़ुद को अपने में बंद कर लेती थी| अंत में निराश होकर मैंने पढ़ना बंद कर दिया| उम्मीद का आखरी तारा भी डूब गया था| 
लास्ट इयर, जब मैं ध्यान करने मनाली जा रहा था, तो किसी अज्ञात प्रेरणा से एक बार फिर से किताब को अपने साथ ले लिया| सोचा दिल्ली से मनाली जाते समय बस में बैठकर पढ़ने की कोशिश करूँगा| जैसे अज्ञेय पहाड़ो में बैठ कर लिखते थे, सोचा शायद उसी तरह पहाड़ों में पढ़ने से मेरी भी बात बन जाए| लेकिन, बस में बैठने के बाद एक बार भी किताब पढ़ने का मन नहीं हुआ| एक पन्ना कभी पलट कर नहीं देखा| खिड़की के किनारे बैठकर, जब तक रोशनी में बाहर देख सकता था, मैं दृश्यों में उलझा रहा| मनाली पहुँच कर भी, एक बार भी किताब का ध्यान नहीं आया|
ध्यान शिविर के तीसरे दिन, सुबह का ध्यान करने के बाद, जब सब लोग ध्यान हॉल से चले गये| तब पता नहीं किस अन्तः प्रेरणा से, मैं अपने कमरे, जो ध्यान हॉल के पास ही था, में गया, बैग से किताब निकाला, और उसे ले कर ध्यान हॉल में वापिस आ गया| सब लोग जा चुके थे| पूरे हॉल में गहन शांति पसरी हुई थी| हॉल के एक कोने में रखे कुशन की ढेर में से, मैंने तीन कुशन उठाया और हॉल के ठीक मध्य में आ कर बैठ गया| 
जहाँ मैं बैठा था वहां मेरे आगे, खिड़की की नीचे, ओशो की बड़ी सी तस्वीर रखी थी| उसी तस्वीर के नीचे बुद्ध की एक छोटी-सी प्रतिमा रखी हुई थी| सामने हिमाच्छादित हिमालय अपनी पूरी गरिमा में ध्यानस्त खड़ा था| सूरज की पहली किरण खिड़की के कांच से छन कर कमरे में आ रही थी| पूरे हॉल में मौन बर्फ की तरफ जमा हुआ था| धड़कन के साथ-साथ, मैं अपने रगों में दौड़ते लहू की आवाज़ को भी सुन सकता था| मैं थोड़ी देर तक पहाड़ो को देखता रहा, फिर पहाड़ो से नज़रे हटा कर ओशो की तस्वीर पर ले आया, दो तीन मिनट तक टकटकी लगा कर ओशो को देखते रहने के बाद, मैंने नज़रे नीचे की और बुद्ध को देखने लगा| तांबे की प्रतिमा सूरज की भांति चमक रही थी| थोड़ी-देर तक मेरी आँखे बुद्ध पर ही गड़ी रही| फिर अहिस्ता से नज़रें समेट कर, मैं अपनी दृष्टि को सामने पड़ी किताब पर ले आया| किताब पर बनी तस्वीर को एक मिनट तक देखता रहा| पहली बार किताब के मुख्य पृष्ट को मैं इतने गौर से देख रहा था| कई तस्वीरें बनी हुई थी| उन तस्वीरों को थोड़ी देर देखने के बाद ऐसा लगने लगा, जैसे तस्वीरें जिवंत हो उठी हों, और मुझसे कुछ कह रही हो| एक पल के लिए लगा कि एलिस की तरह मैं किसी रहस्य लोक में प्रवेश कर रहा हूँ| किताब को उठा कर नाक के पास ले आया और उसके पन्नो से आती खुशबू को सूंघने लगा| नासापुट एक मुधुर सुवास से भर गया| मैंने इससे पहले बहुत बार किताब को सुंघा था| किसी भी किताब को खरीदने के बाद मैं दो काम जरूर करता हूँ, एक किताब पर डेट लिख कर दस्तखत कर देना, और दूसरा उसको सूंघना| लेकिन ऐसी गंध मैंने पहले कभी नहीं सूंघी थी| थोड़ी देर तक सूंघने के बाद, किताब को आज्ञा-चक्र के पास ले गया| काफी देर से वहां खिचाव महसूस कर रहा था| फिर मैंने किताब को माथे से लगाया| यह सब प्रक्रिया अपने आप ही हो रही थी| कुछ भी सोच विचार कर नहीं कर था| माथे से लगाने के बाद, मैंने किताब को बीच से खोला और जो पृष्ट सामने आ गया उसे पढ़ने लगा| 10 मिनट बाद, ना वहां कोई पढ़ने वाला था, ना ही किताब थी|
इस किताब के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है| क्योंकि इसको आप ऐसे ही नहीं पढ़ सकते हैं| जैसे आम किताब को हम कहीं भी, टीवी देखते हुए, बात करते हुए, खाना खाते हुए, टॉयलेट में, मोबाइल चालू रख कर, कैसे भी पढ़ लेते हैं, वैसे आप इसको नहीं पढ़ सकते हैं| पहली तो मुसीबत सही जगह, सही समय, और सही माहौल की है| यह सब अगर आपने जुटा भी लिया तो, फिर आपको अपने भीतर सही भाव दशा पैदा करनी होगी| जब तक हृदय अहोभाव से भरा ना हो, आप इसे आत्मसात नहीं कर सकते हैं| यदि आप इसे प्राथनापूर्ण हृदय से नहीं पढ़ते हैं, तो कुछ भी आपको समझ नहीं आएगा| यह किताब स्त्री जैसी है, अगर स्त्री के आत्मा से सम्बन्ध बनना हो, उसे पूरा पाना हो, तो आपको बहुत ही प्रेमपूर्वक उसके पास जाना होगा| जबरदस्ती करके आप सिर्फ उसकी देह को पा सकते हैं, उसकी आत्मा को नहीं| अगर आपने जरा भी अधर्य दिखाया, जरा भी जल्दी की, तो आप इस किताब से चूक जाएंगे|
दो ही लोग इस कताब को पढ़ने के पात्र हैं, एक वे जिनका, किसी करणवश, मृत्यु-बोध सघन हो गया है| जिन्होंने मृत्यु की सार्थकता और जीवन की निरर्थकता को समझ लिया हो| और दूसरे वे जो जीवन से पूरी तरह से निराश हो गए हैं| असफलता के बाद वाली निराशा नहीं, उस निराशा से कुछ नहीं होगा| सफलता की व्यर्थता को समझ लेने के बाद जो निराशा पकड़ती है, उस निराशा के क्षण में यदि कोई इस किताब को पढ़े तो बात बन सकती है| अन्यथा, आप बस पृष्ट पलट सकते हैं| मिलेगा कुछ भी नहीं|   

किताब से कोई भी बात या कोई उद्धरण मैं यहाँ शेयर नहीं करूँगा| ना ही किताब में क्या लिखा है, इसके ही संबंध में आपसे कुछ कहूँगा| किताब के शब्दों में कुछ भी नहीं, सारे शब्द थोथे होते हैं| शब्द का अपना कोई अर्थ नहीं होता है, अर्थ हम देते हैं| यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वो सब शब्द भले ही मेरे हैं, लेकिन उनका जो अर्थ आप देंगे, उस पर मेरा कोई वश नहीं है| इसीलिए शब्दों को आँखों के आगे से गुज़ार लेने में कोई सार नहीं है| किताब को ग्रहण करने के लिए आपको तैयारी करनी होगी| अमेज़न पर किताब का नाम सर्च करना, फिर एक हजार के क़रीब दाम देख कर चौंकना, फिर झिझकते हुए आर्डर देना, फिर बेसब्री से किताब के आने का इंतजर करना, फिर पैकेट खोल कर उसे ऐसे देखना जैसे कोई प्रेमी अपनी बिछड़ी हुई प्रेमिका को देखता है, फिर उसके पृष्ठों को पलटना, फिर सफहों को पलटते हुए उसे सूंघना, फिर समय निकाल कर उसे पढ़ना| यह सब तैयारी का हिस्सा है| इसमें अगर आपने कहीं भी जल्दबाजी दिखाई, तो फिर आप किताब से कुछ भी नहीं पाएँगे| किताब पढ़ना एक प्रकार की साधना है| जैसे आप मंदिर में नाहा-धोकर प्राथना करने जाते हैं, वैसे ही और उतनी ही पवित्रता से अगर आप इस किताब के पास नहीं जाते हैं, तो आप इस किताब को कहीं से भी नहीं समझ पाएंगे|  

-इक्क्यु केंशो तजु

Friday, 25 May 2018

रेज़रेक्शन (तब्सिरा)

किताब का नाम- रेज़रेक्शन, लेखक- लियो तोल्स्तोय

किताब के बारे में कुछ भी कहने से पहले एक शेर पेश करना चाहता हूँ| अर्ज़ किया है, एक तुमसे हाथ मिलाने के वास्ते, महफ़िल में सबसे हाथ मिलाना पड़ा”| जिस दिन से विवेचन लिखना शुरू किया है, उसी दिन से रेज़रेक्शनको टाल रहा हूँ| किताब के बारे में कुछ भी कहने में ख़ुद को असमर्थ महसूस कर रहा हूँ| जैसे गाँव की विवाहित स्त्रियाँ अपने पति का नाम लेने में झिझकतीं हैं, कुछ वैसी ही झिझक मैं इस वक़्त महसूस कर रहा हूँ| यह किताब मेरे जीवन की सबसे कोमलतम एहसासों में से एक हैं| अगर कबीर होते तो कहते, ‘इक्क्यु, हीरा मिला है, गाँठ बना कर रख लो, इसे बार-बार मत खोलो’| अगर मेरी जगह Ludwig Wittgenstein होते तो, वे भी इस किताब के बारे में चुप रह जाते, “Whereof one cannot speak, thereof one must be silent.” लेकिन मैं, काफ्का की तरह, बिना कुछ बोले नहीं रह पा रहा हूँ| जब से किताब पढ़ा हूँ, ऐसा लग रहा अपने भीतर एक गर्भ लेकर घूम रहा हूँ| ज्यादा देर तक इस प्रसव-पीड़ा के साथ जीया नहीं जा सकता है| इससे पहले कि मेरी जान चली जाए, या फिर गर्भपात हो जाए, मैं अपनी स्वेच्छा से जन्मदे देना चाहता हूँ| अभी अगर अथक कोशिश करके किसी तरह मैं चुप भी रह जाता हूँ, तो जैसे इन द मूड फॉर लवका नायक, अंत में आपने राज़ को पेड़ के धोधर में बंद कर आता है, वैसे ही मरने से पहले मुझे भी कहीं-न-कहीं इसे विसर्जित करना ही पड़ेगा| जिसका होना एक दिन तय ही है, उसे मैं अपनी स्वेच्छा से करके मुक्त होना चाहता हूँ|  


जितना नर्वस मैं इस वक़्त हो रहा हूँ, उतना पहली बार प्रेम निवेदन करते समय भी नहीं हुआ था| जिस दिन इस किताब को पढ़ना शुरू किया था, उसी दिन से किताब मेरी नसों में खून, हड्डी में मज्जा, सीने में धड़कन और खोपड़ी में विचार बन कर घूम रही है| अगर आप कभी मेरे पास बैठें और किसी अज्ञात सुगंध से अपने नासापुटों को भरता हुआ पाएं, तो समझ लीजिए की यह महक रेज़रेक्शनकी है| इस किताब को पढ़ कर इससे अछूता नहीं रहा जा सकता है| दो अजनबी व्यक्ति जिन्होंने इस किताब को पढ़ रखी है, अगर कभी किसी मोड़ पर एक-दूसरे से टकरा जाते हैं, तो तक्षण एक दूसरे की आँखों में देख कर पहचान लेंगे कि सामने वाले ने भी रेज़रेक्शनपढ़ रखा है| मेरी दृष्टि में, सिर्फ दो ही लोग इस दुनिया में मनुष्य कहलाने योग्य हैं- एक जिन्होंने इस किताब को पढ़ी है, और दूसरा जो इसे पढ़ना चाहता हैं| बांकी की भीड़ को मैं मनुष्य मानने से इंकार करता हूँ|    

अगर हजारों गुलाब को निचोड़ कर कोई इत्र बनाए, और फिर उस इत्र को भी किसी विधि से निचोड़ा जाए, फिर जो बनेगा उसे आप क्या कहेंगे? आपका पता नहीं, लेकिन मैं उसे तोल्स्तोय की रेज़रेक्शनकहूँगा| ‘ऐना केरेनिनामें तोल्स्तोय की देह है, ‘वॉर एंड पीसमें उनका मनहै, और रेज़रेक्शनमें उनकी आत्मा है| जैसे शरीर और मन का हमें पता चलता है, और आत्मा सदा अदृश्य रहती है, वैसे ही तोल्स्तोय की रेज़रेक्शनएक अदृश्य किताब है| बहुत ही थोड़े-से लोगों को यह पता है कि तोल्स्तोय ने ऐना केरेनिनाऔर वॉर एंड पीसके अलावे एक और किताब लिखी है, जो इन दोनों जगत विख्यात किताबों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है| इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि लोगों को रेज़रेक्शन' के बारे में कम पता है, आत्मा के बारे में हमेशा कम ही लोगों को पता होता है|

किताब के बारे में, मैं आपसे कुछ भी नहीं कहूँगा, ना ही इसे पढ़ने या ना पढ़ने के लिए कहूँगा| किसी को इसे पढ़ने के लिए कहना, ऐसे ही है, जैसे कोई किसी से यह कहे कि भाई, मेरी गर्लफ्रेंड बड़ी सुंदर है, तू भी उससे प्यार कर|” ऐसा भला कोई कहता है क्या? नहीं कहता ना? तो, मैं भी नहीं कहूँगा| और, कुछ भी ना कहने का एक और कारण है| वह कारण बताने के लिए मुझे आपको एक कहानी सुनानी होगी| ‘लैला के प्रति मजनू की दीवानगी के किस्से सुनकर, उस प्रदेश का राजा लैलामें बड़ा उत्सुक हो गया था| उसे लगा सौन्दर्य के मामले में लैला जरूर अद्वितीय होगी| उसने लैला को देखनी की इच्छा से, उसे महल पर आमंत्रित किया| जब लैला राजा से मिलने आई, तो उसे देख कर राजा बड़ा हैरान हुआ| लैला एक बेहद ही साधारण स्त्री थी| उसे यकीन नहीं आया कि कैसे मजनू इतनी साधारण स्त्री के लिए ऐसा दीवानावार हो सकता है? उत्सुकता की खुजली से विवश होकर, राजा ने मजनू को भी महल पर बुलाया और उससे पूछा तू क्यूं ऐसी साधारण स्त्री के लिए ऐसा पागल हुआ जाता है?’, इस पर मजनू ने जो जवाब दिया वह विचार करने योग्य है| मजनू ने कहा, महराज, लैला को देखने के लिए मजनू की आँख चाहिए| लैला साधारण स्त्री नहीं है, आपकी आँख साधारण है|”

तो, ‘रेज़रेक्शनको आप बिना तैयारी के नहीं पढ़ सकते हैं| अगर आपने बिना तैयारी के इसे पढ़ा तो आप इसकी कहानी यानि देह में ही उलझ कर रह जाएँगे| इसकी आत्मा से आप परिचित नहीं हो पाएँगे| और देह कितना ही सुन्दर क्यों ना हो, आत्मा के सौन्दर्य से उसकी तुलना नहीं की जा सकती है| ‘रेज़रेक्शनकी आत्मा को आप तभी आत्मसात कर सकते हैं, जब आपके पास भी आत्माहो|

इसीलिए, सिर्फ कहानी पढ़ने की दृष्टि से यदि आप इसे पढ़ना चाहते हों, तो मेरी मानिए इसे हाथ भी मत लगाइए| यह आपके काम की किताब नहीं है| कहानियां वो अच्छी होती हैं, जिन्हें कलम से लिखी जाती है, मशाल से नहीं| इस किताब को तोल्स्तोय ने कलम से नहीं मशाल से लिखी है| सो, अगर घर जलाने की तैयारी हो, तो इसे पढ़िए| अगर, ख़ुद को खोने की हिम्मत हो, तो इसे हाथ लगाइये| अन्यथा, पोगो देखिये, और चेतन भगत, अमीश, और रोबिन शर्मा को पढ़िए
-इक्क्यु केंशो तजु


Wednesday, 23 May 2018

‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ (विवेचन)

किताब का नाम- ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’, लेखक- निधीश त्यागी|

“हमसे अलग और दूर रह रहे पिता से मैंने कहा कि आई लव हिम, ताकि वे मुझे कार खरीदने का पैसा दे सकें|”

अभी-अभी आपने जो ऊपर पढ़ा, वह निधीश त्यागी की किताब ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ की एक कहानी है| एक ब्लॉगर मित्र से मैंने इस किताब के बारे में सुना था| ब्लॉगर मित्र ने अपने एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा था कि यह उनकी पसंदीदा किताबों में से एक है| उन्ही की बातों से प्रभावित हो कर मैंने यह किताब 30% डिस्काउंट पर 175 रुएये में, अमेज़न से मंगाई| 200 सौ पेज की इस किताब में छोटी-बड़ी कोई 100 कहानियां है| ट्विंकल खन्ना की किताब 'मिसेज फनीबोन्स' की तरह इस किताब को भी पेंगुइन ने छापा है, और इस किताब में भी बहुत से कोरे पृष्ट हैं| पृष्ठों को कोरा छोड़ने के पीछे क्या राज़ है, यह मैं नहीं समझ पता हूँ| क्या पेंगुइन यह चाहता हैं कि किताब पढ़कर पाठकों के दिमाग में जो कूड़ा भर जाता है, उसको खाली करने के पाठक 'कोरे पृष्ट पर ध्यान करे? अगर यही उदेश्य है, तो सराहनीय है| फिर तो इस तरह की किताबों में हर तीसरे पृष्ट के बाद एक पृष्ट ज़रूर कोरा होना चाहिए| 

“अगर अबार्शन के लिए नहीं गई होती, तो मैं इन दिनों माँ बनने वाली होती”- यह भी एक कहानी है|

वक़्त काटने के लिए एक बार किताब को पढ़ा जा सकता है| कुछ कहानियां बहुत ही अच्छी हैं| अच्छी से मेरा मतलब है- सुखद एहसास देने वाली| अगर आप इन दिनों प्यार में हैं, तो कुछ कहानियों को पढ़कर आपको गुदगुदी लग सकती है| लेकिन ज्यादातर कहानियां ऐसी हैं, जिनको कहानी कहा भी नहीं जा सकता है| मैंने एक बार इम्तियाज अली की एक फिल्म देखी थी, जिसके सारे दृश्य बहुत ही सुन्दर व मनमोहक थे, लेकिन फिल्म की कहानी में कोई दम नहीं था| वैसी ही निधीश त्यागी की अधिकतर कहानियां है, जिसके शब्द तो बहुत ही सुन्दर है, लेकिन वे शब्द आपको कहीं पहुंचाते नहीं है| त्यागी जी ने सुन्दर-सुन्दर शब्दों और अच्छे-अच्छे जुमलों की मायाजाल में पाठकों फ़साने की अच्छी कोशिश की है|

“अपने पिरीयड आने की ख़ुशी पहले कभी नहीं हुई, जैसे आज|”- यह भी एक कहानी है|

जिस तरह की कहानियां और बातें इस किताब में है, उन्हें किसी ब्लॉग़ पर, या फेसबुक और ट्वीटर स्टेटस में पढ़ना सुखद एहसास दे सकता है| लेकिन किताब में इन्हें पढ़कर रोष उत्पन्न होता है| पैसे, पहचान और एजेंट की मदद से लोग आजकल कुछ भी छपवा ले रहे हैं| आजकल जिस तरह की किताबें छप रही है, उन्हें देखकर मुझे बड़ी हैरानी होती है| नाम और पैसा कमाने के चक्कर में कोई भी कुछ भी छपवा ले रहा है| अगर आप सिर्फ ख़ुद के पढने के लिए किताब छपवा रहे हैं, तब तो बात ठीक है| लेकिन अगर आप पाठक तलाशते हैं, तो फिर बतौर लेखक आपको आपनी जिम्मेवारी का एहसास होना चाहिए| किताब छपवाने से पहले एक ईमानदार लेखक को ख़ुद से यह पूछना चाहिए कि ‘लोगों को उसकी किताब क्यों पढ़नी चाहिए? पाठक, जो कि इसे पढ़ने के लिए पैसा और समय खर्च करेगा, को इस किताब से क्या मिलेगा?’ सिर्फ अपने लेखक बनने की खुजली शांत करने के लिए किताब छपवा कर बेचना पाप है| अपने लेखक बनने की खुजली को आप ब्लॉग लिखकर या फिर फेसबुक पर कथा-कहानी लिखकर भी शांतकर सकते हैं| इसके लिए किताब छपवाने की कोई ज़रूरत नहीं है| ऐसे ही आजकल लोगों ने किताब पढ़ना कम कर दिया है| अगर इसी तरह की किताबें छपती रही तो निकट भविष्य में लोग किताबों से बिलकुल ही मुंह मोड़ लेंगे| 

मैं एक व्यक्ति को फेसबुक के माध्यम से जानता हूँ ‘शशिकांत ‘सदैव’, आप डायमंड पॉकेट बुक में बतौर एडिटर काम करते हैं| एक बार इन्होने मुझे फेसबुक पर मेसेज करके कहा, ‘मैंने एक किताब लिखी है, आप उसे एक बार पढ़िये|” किताब का नाम था ‘कौन हैं ओशों’| मैंने किताब मंगा कर पढ़ी और हैरान रह गया| किताब के ऊपर लेखक का नाम था ‘शशिकांत सदैव’ और किताब में सारी बातें ओशो की थी| ओशो ने अलग-अलग प्रवचनों में अपने बारे में जो बातें कहीं है, उन बातों को उठाकर, क्रमबद्ध तरीरे से डाल दिया गया था| यह ‘कहीं से ईंट और कही से रोड़ा भानुमती ने कुनमा जोड़ा’ वाले कृत करके, शशिकांत जी ने कैसे ख़ुद को लेखक कह दिया, यह देखकर मैं बहुत ही अचंभित था| 

एक और महानुभाव, जिनका नाम स्वामी प्रेम वेदांत है, ने भी इसी तरह का खेल किया है| उनकी किताब का नाम है ‘ध्यान और प्रेम के ओजस्वी ऋषि ओशो’, उन्होंने भी यहाँ-वहां से ओशो की बातें उठाकर, उनको सुव्यवस्थित तरीके से रख दिया है, और बीच-बीच में कनेक्टर के रूप में दो चार अपनी बातें लिख दी है| इतने से ही वो इस किताब के लेखक हो गए| 

इस गोरखधंधे में, एक गुजराती महानुभाव ने तो सब को पीछे छोड़ दिया है(वैसे गुजरातियों ने आजकल सब चीज़ों में साबको पीछे छोड़ दिया है)| जनाब को लेखक बनने की ऐसी खुजली थी कि बम्बई में ख़ुद का पब्लिकेशन हाउस खोल लिया| शुरुआत उन्होंने ने ओशो की बातों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को प्रवचन देने से किया था| आजकल प्रवचन भी देते हैं, और किताब भी बेचते हैं| पैसे और प्रचार के दम पर आज उनकी किताब ‘अमेज़न बेस्टसेलर है’| अमेज़न पर यदि आप हिंदी बेस्टसेलर किताबों की लिस्ट ढूंढते हैं, तो उस लिस्ट में एक उनकी भी किताब है| 

लोग ‘ऑथर’ बनने के लिए पागल हैं| कुछ भी करने के लिए तैयार हैं| 'ऑथर या फिर ऑथोरिटी' यह 'शब्द' ऐसा है कि इससे अहंकार को बड़ा पोषण मिलता है| आजकल हर कोई कुछ भी कूड़ा-कचड़ा लिख कर ऑथर बनना चाहता है| कुकुरमुत्ते की तरह ‘सेल्फ पब्लिकेशन’ हाउस खुल रहे है| लोग ख़ुद ही पैसा देकर किताब छपवाते हैं, फिर ख़ुद ही उसका प्रचार करते हैं| कुछ तो ऐसे हैं कि ख़ुद पैसा देकर किताब छपवाते हैं, फिर ख़ुद ही अपनी किताब को 50% डिस्काउंट पर पब्लिकेशन से ख़रीदकर दोस्तों को गिफ्ट देते हैं| फिर, दोस्तों से कहते हैं, ‘किताब के साथ एक ‘सेल्फी’ भेजना, फेसबुक पर लगानी है|” इस तरह से आज कल लोग लेखक बन रहे हैं| अमेज़न पर पैसा देकर प्रचार करवाइए, फिर 50 कॉपी बिक जाए तो किताब पर ‘ए नेशनल बेस्टसेलर’ लिख दीजिए| गजब की दुनिया है यह|  

बात करते-करते, मैं कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया| लेकिन क्या करूँ पैसा और समय खर्च करके किताब पढता हूँ, फिर वो किताब अर्थहीन निकले तो गुस्सा तो आता है| सब से पहले लेखक पर गुस्सा आता है कि ‘इस बकवास को तुमको छपवाने की ज़रूरत क्या थी?’ फिर गुस्सा पब्लिकेशन हाउस पर आता है| ‘सेल्फ पब्लिकेशन’ हाउस को मैं निर्दोष मानता हूँ| उनको पैसे से मतलब है, जो भी पैसा देगा उसकी किताब वे छाप देंगे| लेकिन ये जो  प्रतिष्ठित पब्लिकेशन हाउस हैं, जिनका नाम बिकता ‘पेंगुइन, रूपा और पता नहीं क्या-क्या’, इनके ऊपर बड़ा गुस्सा आता है|  
खैर, जाने दीजिए इन सब बातों को, इन सब से ज्यदा फर्क नहीं पड़ता है| देर-अबेर सही किताब अपने सही पाठक को खोज ही लेती है| और किताब के इसी खोज को आसान बनाने के लिए मैंने यह ब्लॉग लिखना शुरू किया है|

अंत में ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो’ से एक कहानी ख़ास आपके लिए|

कहानी का नाम- उसने मुझे बास्टर्ड कहा!


‘बास्टर्ड!’ क्या??’ ‘बास्टर्ड!!’ और दोनों हंसने लगे| उसके पेट में यकायक सारी तितलियाँ उड़ने लगी| उसकी हथेलीयां उन तितलियों की पुकार सुनती रहीं| बहुत रोज़ बाद तक|

-इक्क्यु केंशो तजु

‘दी इडियट’ (विवेचन)


किताब का नाम- दी इडियट’, लेखक- दोस्तोवस्की
‘दी इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे से कम चर्चित किताबों में से एक है| लेकिन, मेरी दृष्टि में ‘द इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे उत्कृष्ट कृति है| अगर मुझे दुनियां की सबसे बेहतरीन दस किताबों की फेहरिस्त बनानी हो, तो मैं ‘द इडियट’ को शीर्ष पर रखूँगा| ‘द इडियट’ उस ऊंचाई की किताब है, जिस उंचाई को देखने में ‘उपनिषदों’ की भी गर्दन टूट जाए| अगर इस किताब को भारत के किसी ऋषि ने लिखा होता, तो हिन्दू बेझिझक किताब को ही ईश्वर का अवतार मान लेते| जैसे बाल्मिकी ने राम के जन्म से सैकड़ो साल पहले रामायण लिखी थी, वैसे ही संभवतः दोस्तोवस्की ने यह कथा लिखी है|
यह किताब लिखकर दोस्तोवस्की ने अस्तित्व की सृजनात्मक क्षमता को चुनौती दी है| अभी तक इस पृथ्वी पर जितने भी बुद्ध पुरुषों का जन्म हुआ है| उन सभी का जन्म पुरुष के वीर्य और स्त्री के गर्भ से हुआ है| इससे इतर घटना सिर्फ एक बार घटी है| कहा जाता है कि जीसस का जन्म कुवारी माँ से हुआ था, मतलब बिना किसी पुरुष से संबंध बनाए मरियम गर्भवती हो गई थी| जन्म के मामले में यह अब तक की सबसे ज्यादा चमत्कृत करने वाली घटना है|  
लेकिन, दोस्तोवस्की ने जो चमत्कार पैदा किया है, उस के सामने अभी तक के सभी चमत्कारों की आभा मंद पड़ जाती है| दोस्तोवस्की ने ‘कलम’ की नोक से बुद्ध पैदा कर दिया| इस तरह के चमत्कार का इतिहास में इससे पहले कोई उल्लेख नहीं है| यह अघट पहली बार दोस्तोवस्की की कलम से घटा है|
दोस्तोवस्की का इडियट कोई साधारण इडियट नहीं है, वह ‘सम्बुद्ध’ है| किताब का नाम ‘इडियट’ रख कर दोस्तोवस्की ने मनुष्य की मूढ़ता का गहरा मजाज़ उड़ाया है| अगर यह दुनिया सम्यक व स्वस्थ्य होती तो निश्चित ही दोस्तोवस्की अपनी किताब का नाम ‘सेज’ रखते| लेकिन यह दुनिया एक बड़ा पागलखाना है| यहाँ हर कोई शीर्षासन किए हुए है| वेदों ने ठीक ही कहा है कि यह दुनिया एक ऐसे वट वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ ऊपर की ओर, और शाखाएं नीचे की ओर है| यहाँ मुर्ख पंडित बने बैठे हैं, और पंडित मुर्ख बन मारा-मारा फिर रहा है| यहाँ बुद्धो को सूली दी जाती है, और बुद्धुरामों को पूजा जाता है|
किताब की शुरुआत में ही इडियट अपने बुद्धत्व की घोषणा करते हुए कहता, “What kind of idiot am I now, when I myself am aware of the fact that people consider me an idiot? They regard me as an idiot, but I’m intelligent, and they don’t realize It.” किताब अद्वितीय है| सदियों में ऐसी सुन्दर किताब लिखी जाती| किताब का नायक एक सीधा, सरल और बच्चो सा निर्दोष चित का व्यक्ति है| उसकी सरलता साधी हुई नहीं है, वह एकदम एफर्टलेस है| उसके आस-पास के लोग उसकी सरलता को उसकी मुर्खता समझते हैं, और उसे ‘इडियट’ कह कर पुकारते हैं| उसके परिचित और कुटुम्ब उसका मजाक उड़ाते हैं, उस पर हँसते हैं| लेकिन बड़े मजे की बात है कि जब लोग उस पर हँसते हैं, तो वह भी लोगों के साथ हँसने लगता है| वह बालचित जरूर है, लेकिन बचकाना नहीं है| उसकी जीवन दृष्टि सागर से भी ज्यादा गहरी है| प्रौढ़ उसकी बातों से चिढ़ते हैं, लेकिन बच्चों को उससे प्रेम है| उसे भी बच्चों का संगसाथ पसंद है| बड़ों का संग उसे जरा भी रुचता नहीं है| उसका मानना है कि, Through children the soul is healed.”
पूरी किताब में आत्म-शुद्धिकरण के सैकड़ो सूत्र हैं| इडियट का पूरा जीवन अनुकरणीय है|
“To kill murder is an immeasurably greater evil than the crime itself. Murder by judicial sentence is immeasurably more horrible than murder committed by bandit.”
 “And then it seemed to me that even in prison one might discover an immense life.”
“Nothing should be hidden from children on the pretext that they’re too young and it’s too soon for them to know.”
“Adults don’t realize that even in the most difficult matter a child can give extremely useful advice.”
                            

एक जगह इडियट अपने एक दूर के परिचित, जो कि काफी अमीर व्यक्ति है, से मिलने जाता है| वह आदमी पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाता है, फिर जब इडियट उसे अपना परिचय देता है, तो उसे बिठाता है, और फिर चाय-पानी के लिए पूछता है| चाय-पानी के बाद वह इडियट से उसके मिलने आने के कारण के बारे में पूछता है| इस पर इडियट कहता है, “कोई कारण नहीं है, मैं बस आपसे यूं ही मिलने आया हूँ, बस मिलने के आनंद के लिए मिलने आया हूँ| (“I had a feeling’, the prince interrupted, that you would be bound to see some special purpose in my visit. But to be quite honest, apart from the pleasure of making your acquaintance, I have no private purpose.”) लेकिन अमीर व्यक्ति को यकीन नहीं आता है| वह बार-बार हर तरह से इडियट के मिलने आने का कारण पता करने की कोशिश करता है| लेकिन हर बार इडियट उसे यही समझाता है कि वह उससे अकारण मिलने आया है| लेकिन जिस आदमी ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक भी कृत्य बिना हेतु के नहीं किया हो, उसे इडियट का अकर्म कैसे समझ आए| यह दृश पढ़ कर मुझे बहुत सी बातें याद आ गई| बहुत बार ऐसा होता था कि मैं अपने किसी दोस्त, संबंधी या किसी पुराने परिचित को यूं ही कॉल कर लेता था(यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ, जब कॉल करने का प्रति मिनट 2.50 पैसा लगता था), या फिर कभी किसी के यहाँ मिलने चला जाता था| मैं बड़ा असहज महसूस करता था| सामने वाला हमेशा यही पता करने की कोशिश में दिखता था कि आख़िर मैंने उन्हें क्यों कॉल किया है, या फिर मैं क्यों उनके घर पर उनसे मिलने आया हूँ| अब मैं कॉल करने से पहले या फिर मिलने जाने से पहले कोई तर्कसांगत कारण पहले से सोच कर रखता हूँ| किसी से मिलना हो तो पहले कारण दूंढता हूँ, फिर मिलने जाता हूँ| इसी तरह की एक और घटना याद आ रही है| 2012 की बात है, मैं बम्बई में अपने एक दोस्त के साथ रह रहा था| एक बार मैंने अपने दोस्त से बम्बई में रह रहे हमारे एक परिचित से मिलने के लिए चलने को कहा| तो मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा, “क्या उससे मिल कर हमें ख़ुशी मिलेगी?”, मैंने कहा, “हाँ मिलेगी|”, फिर उसने पूछा “क्या उसे हमसे मिलकर ख़ुशी मिलेगी|” मैंने कहा ‘शायद’| तो, वह कहने लगा फिर हम नहीं जाएंगे| ‘शायद’ किसी से मिलने जाने का बहुत ही कमज़ोर रीज़न है| “याद रखो, हमेशा ऐसे ही व्यक्ति से मिलने जाना चाहिए, जिसे मिल कर हमें ख़ुशी मिले है, और जिसको हमसे मिल कर ख़ुशी मिले’’, मेरे दोस्त ने उपदेश देते हुए मुझ से कहा था| आज मेरा वह इस दुनिया से जा चुका है, लेकिन ‘द इडियट’ पढ़ते हुए मैंने उसे कई बार याद किया| उसे भी लोगों से अकारण मिलने और बात करने में ख़ुशी मिलती थी| कारण दूंढने वाले व्यक्ति के पास वह नहीं जाता था, और यदि कोई सकारण उससे मिलने की कोशिश करता, तो वह जल्दी मिलता भी नहीं था|
किताब के कुछ सूत्र जो मुझे बेहद पसंद है, आपके साथ शेयर करता हूँ|

                “You are so pretty that one is afraid to look at you.”
                     “You always hurt the one you love.”
         “The vilest and hateful thing about money is that it even imparts talent.”
               “Human beings are created in order to torment one another.”
               “Sir, we know him for the simple reason that he’s well known.”
-इक्क्यु केंशो तजु



    

Tuesday, 22 May 2018

'मिसेज फनीबोन्स' (विवेचन)

किताब का नाम- मिसेज फनीबोन्स, लेखक- ट्विंकल खन्ना 

       "Life is full of contradictions. We Crave security and independence in equal measures." 

किताब से संबंधित कुछ तथ्यों पर एक नज़र डालें:-
1. पेंगुइन प्रकाशन से छपी, 235 पृष्ट की इस किताब का मूल्य 299 रुपया है|
2. पूरी किताब को एक बैठक यानि तीन घंटे में समाप्त किया जा सकता है| (इस बात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि प्रति पृष्ट 1.11 पैसे की कीमत वाली इस किताब में क्या लिखा होगा|)
3. 2016 में इस किताब को ‘रेमंड क्रॉसवर्ड बुक अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है, और यह ‘ए नेशनल बेस्टसेलर’ है|
4. लेखिका, प्रसिद्ध अभिनेता राजेश खन्ना की सुपुत्री, और अक्षय कुमार की पत्नी हैं|
5. किताब पढ़ने के बाद निर्देशक करन जोहर ने कहा कि I love Twinkle Khanna’s brilliant observations and self-deprecating humor- she is the discovery of the decade.”

अब, किताब से संबंधित कुछ सत्यों पर एक नज़र डालें:-
1.      यह किताब अभिनेता अक्षय कुमार के प्रसंशकों को ध्यान में लिख कर लिखी गई, है, अर्थात उन्हें बहुत पसंद आएगी|
2.      यह किताब उन लोगो के लिए है, जनके पास अफ़रात फ़ालतू का पैसा, और फ़ालतू का समय है
3.      पूरे किताब में मुश्किल से तीन बार आपको हंसी आएगी|

अब विवेचन:-
किताब में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस के बारे में बात की जाए, या फिर जिसकी वजह से किताब पढ़ी जाए| लेकिन फिर भी मैं आपसे निवेदन करूँगा कि एक बार आप इस किताब को जरूर पढ़िए| क्योंकि बिना पढ़े आप यह कैसे जानेंगे कि बिना सिर-पैर की किताबें कैसी होती है? सार को सार की भांति समझने के लिए असार का ज्ञान होना जरूरी है|

बाबा तुलसीदास ने ठीक कहा है कि ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं'| पैसे के दम पर, कैसे लोगों को उल्लू बनाया जाता है, और कैसे लोग उल्लू बन जाते हैं, मैं यह देख कर हैरान रहता हूँ| हमारे यहाँ एक कहावत है, 'नामी बनिया के झाइंट बिकाय’' (प्रसिद्ध दुकानदार का प्यूबिक हेयर भी बिकता है)| यह किताब इसी कहावत को चरितार्थत करती है| अगर सिर्फ किताब के राइटर का नाम बदल दिया जाए, तो कोई 10 रूपये में इसे नहीं खरीदेगा| इस किताब से सिर्फ यह सवित होता है कि अगर आपके पास पैसा है तो आप कुछ भी उलूल-जुलूल लिख कर, किताब छपवा सकते हैं, और लेखक बन सकते हैं| ‘पैसा’ और प्रसिद्धि से लोग इतने ज्यदा प्रभावित हैं कि यदि पैसा वाला आदमी अपना ‘...द’ भी बेचे तो लोग उसे इत्र मान कर खरीदेंगे|
पूरी किताब को बिना किसी परेशानी 100 पेज में लिखा जा सकता था| लेकिन सिर्फ ज्यादा कीमत वसूलने के लिए, जबरदस्ती 235 पेज को इंक से पोता गया है| हर पांच पेज के बाद छठा पेज कोरा है| जगह-जगह निरर्थक तस्वीरें बनी हुई है| 

Monday, 21 May 2018

ब्रदर्स कर्माज़ोव (विवेचन)


                 किताब- ब्रदर्स कर्माज़ोव, लेखक- दोस्तोवस्की
“I think if the devil doesn’t exist, but man has created him, he has created him in his own image and likeness.”
ब्रदर्स कर्माज़ोव पढ़ना किसी ‘तीर्थ यात्रा’ पर जाने जैसा है| ‘तीर्थ’ जाने और ‘तीर्थ यात्रा’ पर जाने में बड़ा भेद है| बिना ‘यात्रा’ किए, हवाई जहाज से सीधा ‘तीर्थ’ पहुँच जाने में वो सुख नहीं है, जो महीनों लम्बी पद-यात्रा करके ‘तीर्थ’ पहुँचने में है| जिसने ‘यात्रा’ के सुख को नहीं जाना, वो कभी ‘तीर्थ’ की महिमा को नहीं समझ सकता है| प्लेन, ट्रेन या फिर कार से तीर्थ जाना, व्यर्थ का जाना है| लेकिन कुछ लोग ऐसे ही जाते हैं, दो दिन में ‘तीर्थ’ को धप्पा मार कर आ जाते हैं, और समझते हैं कि बड़ा पुण्य का काम करके आए हैं| यह पुण्य नहीं नासमझी है| अगर आप इसी तरह की नासमझी में जीते हैं, तो फिर दोस्तोवस्की आपके लिए नहीं हैं| फिर ‘ब्रदर्स कर्माज़ोव’ आपके लिए नहीं लिखी गई है|
“People talk sometimes of bestial cruelty, but that’s a great injustice and insult to the beasts; a beast can never be so cruel as a man, so artistically cruel.”
संभोग और साहित्य का आनंद हड़बड़ी में नहीं लिया जा सकता है| एक सार्थक साहित्य को जीने के लिए ‘समय-तैयारी-और-धर्य’ की आवश्कता होती है| 811 पृष्ट की इस किताब में कई ऐसे पड़ाव आएँगे, जहाँ आपको मंजिल पर पहुँच जाने का भ्रम हो सकता है| हर पड़ाव पर आप को ऐसा लग सकता कि इससे आगे अब और क्या हो सकता है, बात ख़त्म हो गई, जो कहना सुनना था, कह दिया गया, अब आगे और क्या कहने को शेष रह गया है? लेकिन यही तो ‘यात्रा’ का सुख है| हर पड़ाव पर ठहरते, सुस्ताते, शनै-शनै मंजिल की और बढ़ते जाना| जिसे मंजिल पर पहुँचने के जल्दी हो, उसे अच्छा यात्री नहीं कहा जा सकता है| जिसकी निगाह हमेशा मील का पत्थर तलाशती हो, वो अभी चलना नहीं जानता है|

“It’s not God that I don’t accept, Alyosha, only I most respectfully return him the ticket."
हर पड़ाव पर पहुँच कर आप का मन रुक जाना चाहेगा, लेकिन दोस्तोवस्की आपको कहीं ठहरे नहीं देंगे| एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, हर पड़ाव के बाद, वे आपको एक नई ऊंचाई पर ले जाएँगे| और अंत में, जब आप गौरीशंकर की चोटी पर पहुँचने ही वाले होंगे, आप के पैर मंजिल पर पहुँच कर नाचने के लिए बेचैन होंगे, शरीर एक लम्बी यात्रा के बाद अनंत विश्राम में जाना चाह रहा होगा, मन मंजिल पाने की ख़ुशी में आह्लादित हो झूम रहा होगा, कि तभी दोस्तोवस्की दबे पावं आपके पीछे आएँगे और आपको, दुनियां की सबसे ऊँची चोटी से, महाशुन्य में धक्का दे देंगे| उस ऊंचाई पर ले जाकर वे आपको धक्का देंगे, जहाँ से गिरने के बाद किसी को ज़मीन नसीब नहीं होती है| फिर आप त्रिशंकु की तरह कहीं शून्य में लटके रहेंगे| इस लटकन से अब आपको कभी मुक्ति नहीं मिल सकती है, क्योंकि दोस्तोवस्की के अलावा और कोई आपको शून्य से खीच कर वापिस नहीं ला सकता है| और दोस्तोवस्की ‘ब्रदर्स कर्माज़ोव’ का दूसरा पार्ट लिखे बिना ही दुनिया-ए-फानी से रुखसत कर गए थे| इसीलिए, अगर आपको शून्य में लटके रहने से डर लगता हो, तो फिर दोस्तोवस्की आपके लिए नहीं है|
“But Thou didst not know that when man rejects miracle he rejects God too; for man seeks not so much God as the miraculous.”
दोस्तोवस्की वर्तमान वादी हैं, इसीलिए उन का  सभी पात्र वर्तमान में जीता है, कहानी सदा-सर्वदा वर्तमान में चलती हैं| आप किताब को कभी-भी कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं, और कहीं भी पढ़ना बंद कर सकते हैं| हर पृष्ट अपने आप में परिपूर्ण है, हर पृष्ट सार्थक और स्वतंत्र है|
हर महान आत्मा की तरह दोस्तोवस्की स्वाभाव से विद्रोही हैं| उनका हर पात्र पूरे किताब में आग उगलता है| पूर्वाग्रहों और मान्यताओं से भरा चित इस किताब को नहीं पचा सकता है| किताब का एक पात्र जो कि एक इसाई सन्यासी है, एक बातचीत के दौरान, सन्यास की नई परिभाषा गढ़ते हुए कहता है, “For monks are not a special sort of men, but only what all men ought to be.” इसी तरह उनका एक पात्र बाइबल का उपहास करते हुए अपने टीचर से पूछता है, God created light on the first day, and the sun, moon, and stars on the fourth day. Where did the light come from on the first day?”
कहानी का एक पात्र बैठ कर शराब पी रहा है, और उसी समय अपने सन्यासी बेटे से कहता है, For I mean to go on in my sins to the end, let me tell you. For sin is sweet; all abuse it, but all men live in it, only others do it on the sly, and I openly. And so all the other sinners fall upon me for being so simple. And your paradise, Alexy, is not to my taste, let me tell you that; and it’s not the proper place for a gentleman, your paradise, even if it exists.”
पाप मीठा है’, दोस्तोवस्की से पहले यह कहने की हिम्मत पूरे मनुष्य जाती की इतिहास में किसी ने नहीं किया था| एक और जगह यही पात्र अपने बेटे से कहता है, Sir, in Russia men who drink are the best. The best men amongst us are the greatest drunkards.” अगर आज भारत में 150 साल बाद भी कोई ऐसा कह दे, तो हम उसे देशनिकाला दे देंगे|
मनुष्य के बहुचितवान होने की घोषणा करते हुए किताब का एक पात्र कहता है, Pine trees are not like people, Alexey, they don’t change quickly. किताब में हर पर पृष्ट पर कोई न कोई कालजयी उद्घोष है, सब को यहाँ साझा नहीं किया जा सकता है, फिर भी आपके आनंद के लिए में कुछ शेयर कर रहा हूँ|
I have a longing for life, and I go on living in spite of logic.”
“Love life more than the meaning of it.”
“The stupider one is, the closer one is to reality.”
“Men reject their prophets and slay them, but they love their martyrs and honour those who they have slain.



जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...