Friday, 24 April 2020

'तंत्र साधना सूत्र-1'


चित्र साभार- गूगल
तंत्र में उतरने से पहले ख़ुद को थोड़ा तैयार करना जरूरी है| अभी हम जिस स्थिति में हैं, उस स्थिति में तंत्र में प्रवेश करना कठिन है| इसीलिए, पहले मैं आपको कुछ ऐसी बातें बताता हूँ, जिससे हम ख़ुद को तंत्र के लिए तैयार कर सकते है|
साधना शुरू करने से पहले 21 दिन तक आपको साधना में उतरने की तैयारी करनी होगी| तैयारी का पहला चरण है, शरीर शुद्धि, बिना शरीर को शुद्ध किये तंत्र की साधना संभव नहीं है| शरीर को शुद्ध करने के लिए आपको सबसे पहले अपने आहार को ठीक करना होगा| आहार ठीक करने का सरल सूत्र है, स्वाद के नहीं, शरीर की जरूरत के हिसाब से भोजन करना| अगले 21 दिनों के लिए मांसाहार, नशे का सेवन, धूम्रपान, अधिक तला हुआ, मीठा तथा गरिष्ठ भोजन का सेवन न करें| भोजन में हरी-सब्जी, फल, सलाद, जूस, नारियल पानी, देसी गाय का दूध (अगर दूध आपको पचता हो तो) और घर का बना सादा खाना ही खाएं| भोजन की मात्रा उतनी हो, जितने से खाने के बाद भारीपन महसूस न हो| इसके अलावा, अगर संभव हो तो, सुबह उठ कर योग की सूक्ष्म क्रियाएँ तथा प्राणायाम करें| अगर ऐसा न कर पाएं तो, रात का खाना खाने के बीस मिनट बाद 40 मिनट वाक कर लें|
आहार सुधारने के अलावा, शरीर को शुद्ध करने के लिए सबसे अहम् चीज़ है ब्रह्मचर्य का पालन| अगले 21 दिनों तक आपको sex नहीं करना है| एक वीर्य स्खलन के बाद शरीर को कम-से-कम 15 दिन लगते हैं, फिर से सेक्स के लिए तैयार होने में| 15 दिन से पहले सेक्स करना,शरीर के साथ अत्याचार है| चूँकि आपको तंत्र सेक्स की साधना करनी है, इसीलिए आपको परंपरागत सेक्स की जो आदत है, उसे तोड़ना होगा| अन्यथा आप तंत्र की साधना में सफ़ल नहीं हो पाएँगे| परंपरागत सेक्स शरीर की जरूरत कम मन की आदत ज्यादा है| इसलिए, बिना इस आदत को तोड़े आप तंत्र साधना नहीं कर सकते हैं| अभी आपका शरीर 'वीर्य स्खलन' का आदी हो चुका है, बिना पुरानी आदत को तोड़े आप तंत्र के लिए उसे राजी नहीं कर सकते हैं| अगले 21 दिनों के लिए सेक्स और सेक्स जुड़ी सभी चीज़ों (पोर्न, हस्तमैथून, अश्लील किताबें, अश्लील गाने इत्यादि) से ख़ुद को दूर कर लीजिए| शरीर के बाद आता है मन शुद्धि- मन को शुद्ध करने के लिए सबसे पहले ऐसी चीज़ों से ख़ुद दूर कर लीजिए, जिससे मन को गति मिलती हो| जैसे, टीवी देखना, मोबाइल का इस्तेमाल करना, अख़बार पढ़ना, गॉसिप करना, निंदा करना, इत्यादि-इत्यादि|
शरीर और मन को शुद्ध करने के अलावा, तंत्र साधना के लिए 'धेर्य' को विकसित करना बहुत ही ज़रूरी है| धेर्य विकसित करने के लिए झेन परम्परा के पास एक सूत्र है, 'when in hurry, go slow' (जब जल्दबाजी में हों, ख़ुद को धीमा कर लें)| आपने किसी के घर का बेल बजाया, दो क्षण की देरी के बाद मन एकदम बेचैन होने लगता है| उस बेचैनी के प्रति जागें| कहीं जाने की जल्दी हैं, आप हडबडाहट में सब कुछ जल्दी-जल्दी करने लगते हैं, ऐसे क्षण में ख़ुद को थोड़ा स्लो कर लें| जब भी किसी काम को करने की बेचैनी पकड़े, पहले भीतर की बेचैनी को शांत कर लें, फिर उस को करें| तेज़ भूख लगी है, आप टेबल पर बैठे हैं, भोजन आने का इंतजार कर रहे हैं| जैसे ही भोजन आता है, आप टूट पड़ते हैं, यहाँ थोड़ा ठहर जाएँ| थोड़ी देर भूख को देखें, भीतर जो खाना जल्दी आ जाए इसकी बेचैनी है, इसको देखें| जब खाना आ जाए, तो थोड़ी देर ठहर जाएँ..मन जब थोड़ा शांत हो तब धीरे-धीरे खाना शुरू करें| इस 'गो स्लो' के सूत्र को जीवन में सब जगह लेकर आएं| जिन-जिन चीज़ों को आप जल्दबाजी में करते हैं, उनको धीरे करना शुरू कर दें| मन हमेशा मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में होता है, उसकी इसी जल्दबाजी को तोड़ना 'तंत्र' है| जब आप अपने अनुभव से यह समझ लेते हैं, कि हर उत्थान के बाद पतन आता है, आपके भीतर से मंजिल पर पहुँचने की जो बेचैनी है, कम होने लगती है|
सेक्स के क्षण में भी मन मंजिल (वीर्य स्खलन) तक पहुँचने की जल्दी में होता है| अगर पुरुष का बस चले तो वह फॉरप्ले की झंझट में कभी न पड़े, वो सीधा सेक्स ही शुरू कर दे| वो तो स्त्रियाँ, अक्सर, बिना फॉरप्ले के सेक्स के लिए तैयार नहीं हो पाती हैं, इसलिए पुरुष को यह कवायत करनी पड़ती है| २१ दिनों तक अगर आपने यह सब किया, आपका सेक्स मन से निकल कर शरीर में आ जएगा| अभी हम मन से सेक्स करते हैं, शरीर बस इंस्ट्रूमेंटल है| इसीलिए, आज दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो बिना पोर्न देखे सेक्स नहीं कर सकते हैं| जो लोग पोर्न नहीं देखते हैं, वो लोग भी सेक्स करते समय कल्पना करते रहते हैं, पुरुष किसी और स्त्री के बारे में सोचता रहता है, और स्त्री किसी और पुरुष के बारे में| कुछ लोग सेक्स करते समय एक दुसरे को गंदी-गंदी गलियां देकर उत्तेजित करते हैं, अश्लील शब्दों की मदद से ख़ुद को उकसाते हैं| यह सब इस बात का सबूत है कि शरीर से सेक्स विदा हो गया है| जब तक सेक्स शरीर में नहीं आ जाता है, तंत्र संभव नहीं है| और सेक्स शरीर में तभी आएगा, जब आप अपने मन से सेक्स से जुड़े सभी विचारों को बाहर फेंक दें|

(आगे पढ़ने के लिए मुझे ikkyutzu@gmail.com पर सब्जेक्ट में 'तंत्र सेक्स' लिख कर मेल करें.....)

Wednesday, 15 April 2020

मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था

प्रश्न-स्वामी जी, धार्मिक लोग आपस में इतना लड़ते क्यूं हैं?
इक्क्यु- मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था, आम मान्यता का अनुकरण करते हुए, बहुत सालों तक मैं इसी मुगालते में जीता रहा है कि मैं ब्राह्मण हूँ| सबसे श्रेष्ठ हूँ, विशिष्ट हूँ..मंदिर जाता था, पूजा करता था, शास्त्रों का अध्यन करता था|
जब तक गाँव में था तब तक मुझे पता था कि कौन सूद्र है, कौन डोम, कौन चमार और कौन मुसलमान| घर में जब कोई किसी और धर्म या जाति का आता था, तब माँ उसे अलग कप में चाय देती थी| कभी जब उन्हें खाना खिलाना होता था, तो माँ उन्हें अलग थाली में खिलाती थी| यह सब देख कर कभी-कभी मैं काफी उदास हो जाता था, और कई बार तो माँ से लड़ता भी था| लेकिन, माँ डांट-डपट कर मुझे चुप कर देती थी| सबसे बुरा मुझे तब लगा था, जब माँ ने मेरे एक मुसलमान दोस्त को अलग कप में चाय दी थी| लेकिन, वक़्त के साथ-साथ मैं माँ की बातों से सहमत होने लगा था-ख़ुद को श्रेष्ट और दूसरी जाति और धर्म के लोगों को अपने से नीचा मानने लगा था|

नीची जाति के लोग कभी भी, हमारे यहाँ आने पर, टेबल या कुर्सी पर नहीं बैठते थे| वे सदा नीचे ज़मीन पर बैठते थे| कुछ दुसाद जो मेरे घर पर आते थे, वे उम्र में काफी बड़े थे, उनके बाल सफ़ेद थे, लेकिन फिर भी हम उन्हें नाम लेकर ही बुलाते थे| ये मुझे थोड़ा अटपटा जरूर लगता था, लेकिन घर के सभी बच्चे ऐसा ही करते थे, सो मैं भी उन्हें नाम से ही बुलाता था, "माँ गुलमा आया है", गुलमा का पूरा नाम 'राम गुलाम दास था" वह हमारे घर का खानदानी नौकर था| हमारे घर के लोगों ने उसके घर के पूर्वजों को घर बनाने के लिए ज़मीन दी थी| वह हमारी ज़मीन पर बसा था, इसीलिए हमारे यहाँ गुलामी करता था| इस तरह की दास-प्रथा भारत में कैसे आई, यह सोचने वाली बात है| आज जब मैं इस प्रथा के बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जरूर यूरोप के लोगों ने यह प्रथा भारत में शुरू करवाई होगी| गुलमा 'माँ को गृहस्तणी, और पिता जी तथा घर के सभी मर्द हज़रात, उसमें मैं भी शामिल था, को 'गृहस्त' बुलाता था| बचपन में मैं इस शब्द की महिमा से परिचित नहीं था, लेकिन इधर कुछ दिन पहले जब किसी ने मेरी माँ को 'गिरहसनी' बुलाया, तो अचानक मुझे ध्यान आया कि यह 'गिरहसनी' दरसल गृहस्तणी का बिगड़ा हुआ रूप है| फिर मुझे ध्यान आया कि संबोधन कितना पुराना है, और अब कितना निरर्थक है| बिना वानप्रस्थ और सन्यस्त हुए 'गृहस्त' होने का क्या अर्थ है| 'गृहस्त' तो उसी को कहा जा सकता है जो एक दिन वानप्रस्थ, फिर सन्यस्त भी होगा| फिर मुझे समझ में आया कि अदिकाल में गुलमा नौकर/या दास नहीं उन ब्राह्मणों का सेवक रहा होगा, जिनको एक दिन गृहस्त-आश्रम छोड़ कर सन्यस्त होना होता था| 'सेवक' होने और एक 'नौकर' होने में बड़ा फर्क है| समय के साथ सेवक दास हो गया और गृहस्त शोषक|
गाँव में रहते हुए किसी सूद्र, चमार, डोम या दुसाद से मेरी दोस्ती नहीं हुई| स्कूल में मेरे सारे दोस्त ब्राह्मण घर के ही बच्च्चे थे| नीची जाति के लड़कों के साथ उठने-बैठने तथा खेलने की मनाही थी| स्कूल में नीची जाति से कोई भी पढ़ने नहीं आता था| वे लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र में किसी ब्राह्मण के यहाँ गाय-भैंस चराने के लिए चरवाही पर रख देते थे| उनका बच्चा वहीं बासी और बचा हुआ खाना खा कर पलता-बढ़ता था| कभी चोरी छिपे मैं अपने यहाँ के चरवाहे के साथ खेल लेता था, अगर कभी माँ पकड़ लेती थी, तो बहुत डांटती थी| दिल्ली आने के बाद, कई लड़कों से मेरी दोस्ती हुई, और मैंने सबसे बिना उनका सर नेम जाने दोस्ती की| 'रवि' नाम का एक लड़का मेरा बहुत ही करीबी दोस्त था| दो साल की लम्बी दोस्ती के बाद मुझे एक दिन पता चला कि जाति से वह चमार है| मैं बड़ा चौंका क्योंकि उसके रहन-सहन, खान-पान और पहनावे को देख कर मैं हमेशा अंदर-ही-अंदर ऐसा सोचता था कि यह ब्राह्मण है| मैंने कई बार उसके यहाँ खाना खाया था, उसने कई बार मेरे यहाँ खाया था| पहले तो, यह सोच कर मैं थोड़ा बेचैन हुआ कि चमार के साथ मैंने खाना खा लिया था| लेकिन एक दो दिन बाद मैं इन सब के बारे में ग़मभीरता से सोचने लगा| गाँव के चमार बहुत ही गंदगी में रहते थे, मरे हुए जानवर का मांस खाते थे, उनके घर गंदे थे, इन सब के बीच ख़ुद को अलग और महान समझना आसान था| लेकिन रवि का मामला अलग था...सच्चाई तो यह थी कि वह मुझसे भी ज्यादा साफ-सफाई में रहता था| पूजा-पाठ करता था, हारमोनियम बजता था| किसी भी अर्थों में मुझ से कम नहीं था| यह पहला मौका था जब मुझे अपने ब्राह्मणत्व' पर शक होने लगा| धीरे-धीरे यह शक इतना बढ़ गया कि मैंने अपने नाम के साथ वो सर नेम लगाना बंद कर दिया जिससे यह पता चलता था कि मैं ब्राह्मण हूँ| 'अगर यही ब्राह्मण होना है, तो यह तो दो कौड़ी का है'|

बहुत दिनों तक मैं अन्धकार में टटोलता रहा| मेरे अन्दर हजारों धार्मिक प्रश्न घुमते रहते थे| दिल्ली में ही मेरा एक दोस्त बना नासिर मैं उससे घंटों धार्मिक मुद्दों पर बहस करता रहता था| उसका मानना था कि धर्म का सम्बन्ध 'जन्म' से है, हम जिस परिवार, जाति में पैदा होते हैं, वही हमारा जाति और धर्म होता है| मैं इस तर्क से राज़ी नहीं होता था क्योंकि मुझे ख़ुद में, नासिर में और रवि में कोई भी अंतर नहीं दिखता था| फिर मुझे गाँव के वो लोग याद आते थे जिन्हें हम अपने से नीचा समझ कर उनके साथ अलग व्यवहार करते थे| अब मैं ख़ुद को उनसे अलग नहीं पाता था| उनका रंग रूप, मनः स्थिति, शरीर सब कुछ तो मेरे जैसा ही था| इतना तो मैं समझ गया था कि धर्म का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है| लेकिन, फिर किस चीज़ से धर्म का संबंध है, यह मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न था| हिन्दू धर्म से मेरा मोह भंग हो रहा था, मेरे किसी भी प्रश्नों का जवाब हिन्दुओं के पास नहीं था| कम-से-कम उन हिन्दुओं के पास तो नहीं ही था, जिन्हें मैं जानता था| मेरा पूरा जीवन ही प्रश्न चिन्ह बन गया था| मैं इतना परेशान रहने लगा था कि मेरे करीबी और परिचितों को ऐसा शक होने लगा कि मैं पागल होता जा रहा हूँ| मेरा छोटा भाई एक दिन माँ को फोन करके बोला, " माँ, भाई पागल हो गया है, दिन भर अलबल कुछ भी बोलता रहता है|"
कई साल बाद, मैं दिल्ली में ही बौद्ध धर्म की एक शाखा से जुड़ा| शुरू-शुरू में मैं उनकी बातों और फिलोसोफी से बड़ा मुतासिर हुआ| कई लोगों को उस प्रैक्टिस से जोड़ा भी| लेकिन, कुछ ही दिनों में बाद मुझे बहुत सी ऐसी चीज़े दिखने लगी, जिससे मेरे सारे पुराने प्रश्न फिर से ताजे हो गए| हर मीटिंग में किसी न किसी से मेरी बहस हो जाती थी| कई बार बड़े लीडर मुझे समझाने आए, लेकिन मुझ से बहस करने के बाद वो ख़ुद ही कंफ्यूज हो जाते थे| धीरे-धीरे मैं ख़ुद को प्रैक्टिस से दूर कर लिया| नासिर के साथ कुछ दिन मैं मस्जिद में भी गया| बहुत सी किताबें पढ़ीं...बौद्ध प्रैक्टिस की तरह इस्लाम से भी मैं शुरू में बड़ा प्रभावित हुआ| लेकिन थोड़े दिनों बाद फिर वही बहस| वहां जाना भी छोड़ दिया| फिर बत्रा होस्पिटल के पास एक 'मैहर बाबा' का केंद्र था..कुछ महीने तक मैं वहां भी कीर्तन में गया| इस्कॉन में भी बहुत दिन अमित मामू के साथ गया| फिर आदित्य के साथ चर्च में भी...सब जगह एक ही कहानी, थोड़े दिनों बाद मैं वहां के लोगों से बहस करने लगता था| फिर धीरे-धीरे ख़ुद को दूर कर लेता था|
आज मेरा सम्बन्ध दुनिया के किसी भी धर्म से नहीं है| लेकिन मैं फिर भी धार्मिक हूँ| और मेरी यह धार्मिकता मेरे लिए कोई विश्वास या मान्यता नहीं है| बल्कि एक अस्तित्वगत प्यास है| अब मेरा धार्मिक होना मेरी पहचान नहीं है| मेरा धर्म मेरे अहंकार का विस्तार नहीं है| इसलिए, अपने धर्म की रक्षा करने के लिए मैं किसी की जान नहीं ले सकता हूँ| चूँकि मेरा धर्म किसी भी तरह के मान्यताओं और विश्वासों पर आधारित नहीं है, मैं किसी को भी अपने धर्म में कन्वर्ट नहीं कर सकता हूँ| ना ही किसी को भी अपने धर्म को मानने के लिए मजबूर कर सकता हूँ| यह ऐसे ही होगा जैसे कोई आँख वाला किसी अंधे को प्रकाश को मानने के लिए मजबूर करे| अँधा अगर प्रकाश को मान भी लेगा तो उसके जीवन में क्या फर्क पड़ेगा? क्या प्रकाश को मान भर लेने से अंधे का अंधापन दूर हो जाएगा? धर्म का जन्म से कोई भी सम्बन्ध नहीं है| धार्मिकता का सम्बन्ध हमेशा ही व्यक्ति से होता है, किसी भी जाति, धर्म या देश से नहीं| जन्म से हम सब एक जैसे ही होते हैं| पंच तत्व से ही हम सब का शरीर बना है, इसलिए हमारे शरीर में तो जन्म से कोई भेद हो नहीं सकता है| मन भी हम सब का एक ही जैसा है- क्या हिन्दू का क्रोध किसी मुस्लिम या इसाई के क्रोध से अलग होता है? फिर जन्म से अगर कुछ तय होता है तो वह हमारा भोजन, रहन-सहन, वस्त्र और कुछ मान्यताएं| लेकिन इन में से कोई भी धर्म नहीं है| एक हिन्दू जो कि ईश्वर को मानता है, और एक ईसाई जो कि जीसस को मानता है, में बुनियादी भेद क्या है? कुछ भी नहीं...!!!! रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता है| यह ऐसे ही जैसे एक अँधा प्रकाश को मानता हो, और दूसरा अँधा प्रकाश को नहीं मानता हो...इस मानने और न मानने से उनके जीवन के क्या अंतर आएगा? कुछ भी नहीं...!!! इसीलिए, जन्म से हिन्दू होना, मुस्लिम होना, या फिर ईसाई या यहूदी होना सांयोगिक घटना है, धर्मिक नहीं|
इसलिए, विवेक, दो धार्मिक लोग कभी भी आपस में नहीं लड़ सकते हैं| लड़ाई सिर्फ अंधों के बीच होती है| जहाँ भी लड़ाई दिखे समझ जाइए कि वहां धर्म नहीं है| और यह बात न सिर्फ बाहर के संबंध में सही है, बल्कि भीतर के संबंध में भी यही सूत्र लागू होता है| अगर आप अपने भीतर के क्रोध से लड़ रहे हैं, काम वासना से लड़ रहे हैं, लोभ से लड़ रहे हैं, इर्ष्या से लड़ रहे हैं, तो समझ जाइएये कि अभी आप धार्मिक नहीं हुए हैं| मेरी दृष्टि में, और यही सभी धार्मिक लोगों की दृष्टि है, लड़ाई अधर्म है, और स्वीकार धर्म|
धार्मिकता अनुभव है, जबकि धर्म सिर्फ एक मान्यता| 'मान्यता' से जीवन में कुछ भी नहीं बदलता है| इसीलिए, "धर्म के नाम पर दुनिया का कोई भी ऐसा पाप नहीं है जो न हुआ हो|" 

Sunday, 5 April 2020

जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?


प्रश्न - 24 घंटे आनंदित रहने का क्या मार्ग है ?
Ikkyu- सबसे पहले आपके भीतर 24 घंटे आनंदित रहने का जो लोभ है, उसे छोड़ना होगा..। दूसरी बात, आनंद का अपना कोई अनुभव नहीं होता है| सुख का अनुभव होता है, दुःख का भी अनुभव होता है, लेकिन आनंद का कोई अनुभव नहीं होता है, क्योंकि अनुभव के लिए ‘दो’ का होना ज़रूरी है। सुख के पीछे दुःख छिपा होता है, इसीलिए सुख का अनुभव होता है। इसी तरह दुःख के पीछे सुख छिपा होता है। अगर भीतर बिल्कुल ही सुख न हो तो आपको दुःख का पता नहीं चलेगा। तो, इस बात को बहुत ही अच्छे से समझ लीजिए कि अनुभव हमेशा विपरीत का होता है। साथ ही एक और बात गहरे उतार लीजिए,’कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं होता है’। कैसा भी अनुभव क्यों न हो सब अनुभव मन के हैं।
आनंद का अनुभव नहीं हो सकता है क्योंकि आनंद आपका होना है। आनंद चेतना का स्वभाव है। इसीलिए, जब तक चेतना सुख और दुःख के अनुभव में उलझी रहती है, वह अपने स्वभाव से वंचित रहती है। सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होना छोड़ दीजिए, फिर जो रह जाएगा वही अनन्द है।
प्रश्न- जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?
इक्क्यू- जागकर जीना चाहिए...दो दृष्टिकोण मैं आपको देता हूँ, जो भी सही लगे उसे चुन लीजिए। दोनों का परिणाम एक जैसा है।
पहला- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखिये जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं। हर दिन को ऐसे जीना शुरू कीजिये जैसे यह आपके जीवन का पहला दिन है।
दूसरा- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखना शुरू कर दीजिए जैसे कि आप उन्हें आख़री बार देख रहे हैं। हर दिन को अपने जीवन का आख़री दिन समझिए।
दोनों ही दृष्टिकोण का एक ही लक्ष्य है-अतीत और भविष्य से मुक्ति..। जो भी आपको जमे उसे चुन लीजिए और कोई तीन महीने इस प्रयोग को कीजिए।
प्रश्न- आपका मूल संदेश क्या है ?
मेरा कोई संदेश नहीं है..। मैं कोई पैग़म्बर (पैग़ाम/मेसेज लाने वाला) नहीं हूँ..! संदेश लाना डाकिये का काम है। मैं कोई डाकिया-वग़ैरह नहीं हूँ। डाकिया एक जगह की ख़बर को दूसरी जगह पहुँचता है। यह बिचौलिये काम है। मुझे ऐसा काम पसंद नहीं है।
मैं अपने से ऊपर किसी को नहीं मानता हूँ, और ना ही कोई मुझसे नीचे है। फिर किसका संदेश किस तक पहुँचाऊँ?? मैं स्वयं संदेश हूँ।और यही मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ, “अप्प दीपो भव:”


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...