Thursday, 26 July 2018

राग दरबारी

किताब का नाम- 'राग दरबारी' , लेखक - श्रीलाल शुक्ल 


पढ़कर आदमी पढ़े-लिखे लोगों की तरह बोलने लगता है | बात करने का असली ढंग भूल जाता है”- राग दरबारी

साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल की किताब ‘राग दरबारी’ एक क्लासिक उपन्यास है, जिसे आज से ठीक पचास वर्ष पूर्व 1968 में पहलीबार राजकमल प्रकाशन ने छापा था | तब से, आज तक किताब की पांच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी है| “मोटीतौर पर उपन्यास गावं की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है | शुरू से आखिर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिंदी का शायद यह पहला वृहत उपन्यास है|”

“चुनाव के चोंचले में कुछ नहीं रखा है | नया आदमी चुनो, तो वह भी घटिया निकलता है | सब एक-जैसे हैं| इसी से मैंने कहा, जो जहाँ है, उसे वहां चुन लो | पड़ा रहे अपनी जगह | क्या फ़ायदा है उखाड़-पछाड़ करने से ! चुनाव लड़नेवाले प्रायः घटिया आदमी होते हैं, इसीलिए एक नए घटिया आदमी द्वारा पुराने घटिया आदमी को, जिसके घटियापन को लोगों ने पहले से समझ-बूझ लिया है, उखाड़ना न चाहिए |”राग दरबारी

क्लासिक के बारे में कुछ भी कहना पिटी लकीर को पीटने जैसा होता है| किताब के बारे में पहले ही इतना कुछ कहा और सुना जा चुका है कि आप चाह कर भी कुछ नया नहीं कह सकते हैं | बचपन में प्रेमचंद मेरे पसंदीदा लेखक थे| मानसरोवर की शायद ही ऐसी कोई कहानी होगी जिसे मैंने न पढ़ा हो | लेकिन समय के साथ प्रेमचंद से मेरा लगाव थोड़ा कम हो गया | अब दो चार कहानियों को छोड़ कर मैं आमतौर पर प्रेमचंद को पसंद नहीं करता हूँ | शुरुआत के 17 साल गाँव में बिताने के कारण आंचलिक कथा कहानियों से मेरा वेशेष लगाव होना स्वाभाविक है | रेणु की ‘मैला आंचल’ मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है| लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि तीन बार की कोशिश के बाद भी मैं आज तक उसे पूरा नहीं पढ़ पाया हूँ| राही मसूम रज़ा की ‘आधा गाँव’ 5 साल से मेरी स्टडी में चित पड़ा है | कई बार पढ़ने की कोशिश की लेकिन सौ पेज से अधिक कभी नहीं पढ़ पाया | 2006 के बाद ‘राग दरबारी’ हिंदी की दूसरी ऐसी उपन्यास है जिसे मैंने पूरा पढ़ा है| इससे पहले अज्ञेय की ‘नदी के द्वीप’ को कुछ दिन पहले समाप्त किया था| ‘नदी के द्वीप’ के बाद हिंदी पर से खोई आस्था फिर से वापिस लौट आई  है| इस बीच आचार्य चतुरसेन की ‘वैशाली की नगरवधू’ भी शुरू की थी, लेकिन 160 पेज के बाद किताब को मोड़ कर रख दिया|

अक्सर मुझे हिंदी के लेखक बचकाने और भेड़ चाल के हिस्से लगते हैं | और हिंदी लेखकों में जिस चीज़ की सबसे अधिक कमी होती है वह है ‘मौलिकता’ | और भूल से यदि कभी कोई लेखक ‘मौलिक’ होने की कोशिश करता है तो वह ‘छिछली’ बातें करने लगता है| बाबा तुलसीदास के बाद हिंदी में आज तक कोई ठीक से प्रतिभाशाली उपन्यासकार पैदा नहीं हो पाया |

“मुझे इन डायरेक्टर से कोई उम्मीद नहीं है | जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नज़र आता है |”राग दरबारी


खैर, यहाँ मैं आपसे ‘राग दरबारी’ की बात कर रहा था | मेरे लिए राग दरबारी ‘एक यथार्थवादी’ उपन्यास है | ऐसा पहलीबार हुआ है कि एक किताब के सभी पत्रों के साथ मैं ‘रिलेट’ कर पाया | किताब का एक भी पात्र काल्पनिक नहीं है | भारतीय समाज का ऐसा सटीक चित्रण इससे पहले मैंने कहीं नहीं देखा था | पहले पृष्ट से लेकर अंतिम पृष्ट तक किताब आपको बाँध कर रखती है | और हैरानी की बात है कि पूरे किताब में शुक्ल जी ने एक बार भी ‘रोमांच, रोमांस, अतिशयोक्ति, ड्रामा, सस्पेंस, सेक्स और सतही हास्य जैसी बाजारू चीज़ों का सहारा नहीं लिया है | इस सबसे भी बड़ी बात यह है कि किताब में कोई कहानी नहीं है | किताब एक अंतहीन प्रवाह की भांति है जिसमे सिर्फ 'बहते चले जाना' अपने आप में एक आनंद है | किताब समाप्त होने पर ऐसा नहीं लगता है कि कोई कहानी समाप्त हुई हो, कुछ भी समाप्त नहीं होता है | शिवपालगंज आज भी अपनी जगह मौजूद है| छोटे पहलवान आज भी अपनी मूंछो पर ताव देते हुए, अपने ख़ानदानी परम्परा अनुसार अपने बाप को पीटते हैं, सनीचर का प्रधानी अभी भी चल ही रहा है, रुप्पन बाबू आज भी भांग पीकर बेला के घर के चारो ओर चक्कर लगा रहे हैं| जैसे समुन्दर का पानी कहीं से भी चखने पर खारा ही लगता है, वैसे ही किताब को आप कहीं से भी खोल कर पढ़ सकते हैं, हर पृष्ट, हर दृश्य आपको अन्दर से गुदगुदा जाएगा |  

“असल झगड़ा अठन्नी का नहीं, उधर पहलवान की ओर से है | ये गंजजहे जब अठन्नी के लिए झायं-झायं कर रहे थे तो उधर से पहलवान बोले कि भाई, इस झगड़े में हमारा दिया हुआ रुपिया न भूल जाना| अब देने को तो इन्होने एक छदम भी नहीं दिया और कह रहे हैं कि हमारा रुपिया न भूल जाना | क्या ज़माना आ गया है!”राग दरबारी

अगर मेरी तरह आपकी जड़े भी किसी गाँव से जुड़ी है, और रोजीरोटी की जुगाड़ में वर्षों से शहर में रह रहे हैं, तो इस किताब को जरूर पढ़िए | यह किताब आपके उपर पड़ी शहरी संस्कार की धूल को छाड़ कर आपको फिर से नया कर देगी | किताब पढ़ते समय ऐसे हजारों शब्द और सैकड़ों कहवतों से आपका सामना होगा, जिन्हें आप कब के भूल चुके हैं| वर्षो से अंग्रेज़ी बोलते-बोलते अकड़ चुकी आपकी जीभ, उन पावन शब्दों और मुहावरों के उच्चारण से सीधी हो जाएगी |

“कल का जोगी, चूतड़ तक जटा | सनीचर को देखो, देखते-देखते मंगलप्रसाद बन गए”- राग दरबारी

पचास साल पहले के हिंदुस्तानी ग्राम्य जीवन के बारे में लिखी गई यह किताब आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी | “जैसे-जैसे उच्चयस्तरीय वर्ग में ग़बन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़े मज़बूत करता जाता है, वैसे-वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास प्रासंगिक होता जा रहा है |” -श्रीलाल शुक्ल और मैं ऐसा मानता हूँ कि अगले पचास सालों तक भी इस किताब की प्रासंगिकता खत्म नहीं होगी | जिस तरह घोंघे की रफ़्तार से हम बदल रहे हैं, सौ साल भी कम ही लगता है | और यदि कभी समाज बदल भी गया तो अपनी ख़ूबसूरती के कारण ‘राग दरबारी’ को अनंत काल तक एक धरोहर की तरह रखा जाएगा | और साहित्य प्रेमी अपने अतीत में झाँकने और उसका रस्वादन करने के लिए इसे पढ़ते रहेंगे | अंत में आपसे यही कहूँगा कि किसी भी कीमत पर शुक्लजी की इस कालजयी रचना का आनंद लेने से न चुकें | और किताब पढ़ने के बाद नीचे कमेंट में हमें जरूर बताएं कि किताब आपको कैसी लगी |

“वजह यह है कि जैसे बुद्धिमत्ता एक वैल्यू है, वैसे ही बेवकूफ़ी भी अपने-आपमें एक वैल्यू है | बेवक़ूफ़ की बात चाहे तुम काट तो, चाहे मान लो, उससे उसका न कुछ बनता है, न बिगड़ता है | वह बेवक़ूफ़ है और बेवक़ूफ़ रहता है | इसीलिए मेरी आदत पड़ गई है कि बेवक़ूफ़ को कभी न छेड़ो |” - राग दरबारी




Tuesday, 24 July 2018

The Perils of Being Moderately Famous

किताब- द पेर्लिस ऑफ़ बीइंग मॉडरेटली फेमस, लेखक- सोहा अली खान


2014 में जब जॉब छोड़ कर मेहसाना आया था, तो यही सोचा था कि 3 महीने आश्रम में रह कर कहीं और चला जाऊंगा| लेकिन 3 महीना कब तीन साल हो गया पता ही नहीं चला| पिछले साल जनवरी में आश्रम से भी निकल गया, लेकिन फिर भी मेहसाना नहीं छुटा| 2016 में जब धर्मशाला गया था, तो वहां मेक्लोड़गंज से ऊपर बाकसू बहुत पसंद आया था| बाकसू से भी उपर धर्मकोट के पास बाकसू नाग में रहने के लिए एक घर भी देखा, सोचा आश्रम से निकल कर यहीं रहने आऊंगा| सब कुछ क़रीब-क़रीब तय था लेकिन फिर अंत में ठंड की डर से बाकसू में रहने के प्लान रद्द कर दिया| उस के बाद से अचेतन रूप से नई जगह की तलाश करता रहा| कभी माउंट आबू, कभी दाहोद, कभी मनाली, कभी सागर, कभी अजमेर, कभी रणकपुर, कभी ऋषिकेश, कभी अमृतसर, कभी वलसाड, खेडब्रह्मा, तो कभी गोवा| अभी इस साल जब जनवरी में गोवा गया, तो वहां जगह ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी| अंत में 16 दिन गोवा में बिता कर वापिस आ गया|
गोवा से आने के बाद घूमने और जगह दूंढने का सारा जोश ठंडा हो गया था, सोचा शायद अस्तित्व नहीं चाहता है कि हम मेहसाना से बाहर निकले| गोवा के बाद कई बार कई जगह जाने का प्लान बनाया लेकिन ऐन मौके पर सब रद्द हो जाता था| काफी जद्दोजहद के बाद, एक बार होली से बचने के लिए खेडब्रह्मा गया और आम खाने के वलसाड| वलसाड से आने के बाद घूमने का कीड़ा फिर से खून में दौड़ने लगा| वलसाड यात्रा काफी सफल रही थी| आम खाने के साथ-साथ दमन और नारगोल जाने का भी मौका मिला|
                                  वलसाड 
वलसाड से आने के बाद, अपने एक सन्यासी मित्र, जो मेहसाना आश्रम से निकलने के बाद पिछले दो साल से देहरादून में रह रहे हैं, से मैंने देहरादून के बारे में बात की| उन्होंने दून की काफी तारीफ की, उनकी बातों से प्रभावित होकर मैंने यह तय किया अब मेहसाना छोड़ कर देहरादून में शिफ्ट हो जाना है| लेकिन मेरे मित्र ने आग्रह किया कि मेहसाना छोड़ने से पहले मुझे एक बार देहरादून कुछ दिनों के लिए आना चाहिए सिर्फ देखने के लिए| मुझे उनकी बात जंची, शिफ्ट करने से पहले एक बार देहरादून देख लेना उचित लगा|

मैंने 6 जुलाई की टिकट बुक की| मेहसाना से निकलने से पहले सोचा कि 10 दिन के क़रीब देहरादून में रहूँगा, और जगह देखूंगा, फिर वहां से मसूरी जाऊंगा, वहां दस दिन रहूँगा, फिर मसूरी से ऋषिकेश आ जाऊंगा| ऋषिकेश में कुछ दिन रह कर योग सीखूंगा, फिर वहां  से दिल्ली होते हुए मेहसाना आ जाऊंगा| और फिर अनुभव के आधार पर तय करूँगा कि कहाँ रहना है, देहरादून में या फिर ऋषिकेश में, या फिर मसूरी में|
                                   नरगोल 
इसी तरह की ख़याली खिचड़ी पकाते हुए 7 जुलाई की शाम देहरादून पहुंचा| पिछली यात्राओं का यह अनुभव रहा था कि सफ़र में किताब पढ़ना न के बराबर ही हो पाता है, इसीलिए सफर में ज्यादा किताब लेकर जाने का कोई मतलब नहीं है| वैसे भी ‘नदी के द्वीप’ के बाद से मेरे किताब पढ़ने का सिलसिला टूट सा गया था| जिस रात नदी के द्वीप पूरा किया, उसी सुबह से जीवन में एक उलझन शुरू हो गई| उस उलझन को सुलझते-सुलझते दो महीने का वक़्त लग गया| इन दो महीनो में बमुश्किल दो या तीन किताब समाप्त कर पाया| पढ़ना कम हुआ तो परिणाम स्वरूप लिखना भी कम हो गया| लेकिन देहरादून के लिए निकलने से पहले-पहले तक सब कुछ ठीक हो चुका था| जीवन क़रीब-क़रीब पहले की तरह अपने पुरानी लीक पर आ गई थी| सो, सोचा लम्बी छुट्टी पर जा रहा हूँ, क्या पता पढ़ने का मौका मिल ही जाए, इसीलिए चलने से पहले चार किताबें अपने साथ ले लिया| एक कामू की किताबों का संग्रह लिया, जिसमे कामू की चार किताबें हैं, दूसरी श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ ली, तीसरी सोहा अली खान की ‘द पेर्लिस ऑफ़ बीइंग मॉडरेटली फेमस’ और चौथी डेल कार्नेगी की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल’ लिया| सोचा भीड़-भाड़ में सोहा और कार्गेगी को पढूंगा, और शान्ति के क्षणों में श्रीलाल शुक्ल और कामू को पढूंगा|
देहरादून में नौ दिन काफी अच्छा बीता| मैं क्लेमेंट टाउन में बुद्धा टेम्पल के पास एक गेस्टहाउस में रह रहा था| जहाँ मैं रह रहा था वहीँ से थोड़ी दूर पर ‘ओशो आश्रम’ भी था| एक दिन वहां भी ध्यान करने गया| प्लान था कि कुछ दिन आश्रम में भी बिताऊंगा, लेकिन फिर बाद में आश्रम में रहने का आइडिया तर्क कर दिया|
                                    देहरादून
देहरादून की हरियाली से मैं काफी मुतासिर हुआ| लोग भी कभी अच्छे लगे| रोज़ शाम घूमने के लिए बुद्धा टेम्पल पर जाता था| जहाँ मैं रह रहा था, उसके पास में ही एक आर्मी कैंप था, जिसके अन्दर एक काफी सुन्दर झील था| झील के अन्दर मछलियों का अम्बार था, बत्तख भी बहुत सारे थे| बुद्धा टेम्पल पर वक़्त बीताने के बाद रोज़ शाम मैं झील के किनारे अपने सन्यासी मित्र के साथ चक्कर लगाने के लिए चला जाता था| दिल्ली बम्बई की तरह देहरादून के युवकों और युवतियों में भी फिटनेस को लेकर काफी क्रेज़ देखा|
एक दिन हम चार बजे के क़रीब झील पर पहुंचे| तब मैंने एक युवक को पीली टीशर्ट में दौड़ कर झील का चक्कर लगाते देखा| उस वक़्त में झील के किनारे रखे बैंच पर बैठकर मछलियों के क्रीड़ा का आनंद ले रहा था| जब चार बार वो युवक मेरे सामने से गुज़रा, तो मैं उसे नोटिस करने लगा| क्योंकि दौड़ कर झील का चार चक्कर लगा देना मेरे लिए बड़ी बात थी| मैंने सोचा लगता है आज यह दस चक्कर लगा देगा| और ऐसा हुआ भी मेरे देख-देखते ही उसने दस चक्कर लगा दिया| और हैरानी की बात यह थी कि दस के बाद भी वह दौड़ता रहा| काफी देर तक उसे दौड़ता हुआ देखने के बाद मेरे अन्दर जोश आ गया| मैं बैंच से उठा और चप्पल उतार कर मिलंदी सोमन की तरह नंगे पैर ही दौड़ना शुरू कर दिया| एक चक्कर पूरा करते-करते मेरी हालत ख़राब हो गई| थक कर मैं फिर से बैंच पर आकर बैठ गया| एक घंटा से ज्यादा हो चुका था, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| अंत में थक कर मैं वहां से चला गया| एक घंटे बाद जब लौटा, तो मैं हैरान रह गया, वह युवक अब भी दौड़ रहा था| मैं उसके विषय में जानने के लिए काफी उत्सुक हो गया, और तय किया कि इसके रुकने तक यहीं इंतज़ार करूँगा| हमारे एक घंटे के इंतज़ार के बाद उसने अपनी गति थोड़ी धीमी की और धीमी गति से क़रीब दस चक्कर लगाने के बाद दौड़ना बंद किया| मैं लपक कर उसके पास गया और पूछा ‘भाई यह तीन घंटे तक लगातार तुम कैसे दौड़ लेते हो?’, “यह तो कुछ भी नहीं है, मैं सुबह भी इतना ही दौड़ता हूँ”, उसने कान से लीड हटाते हुए बोला|” ‘एंअ...’ मेरे मुंह से बस इतना निकला|
देहरादून के मौसम में नमी थी, दिन में कहीं निकलना संभव नहीं था| इसीलिए घूमने टहले का सारा कार्यक्रम हम सुबह और शाम में ही रखते थे| 7 तारिख को शनिवार की शाम हम देहरादून पहुंचे थे, रविवार विश्राम में बीता था| शाम में बस थोड़ी देर के लिए टहलने निकले थे| सोमवार से लेकर शुक्रवार तक हमने अपना ज्यादा समय क्लेमेंट टाउन के आस-पास ही बिताया| बस एक दिन शुद्ध शहद की खोज में जंगल की तरफ गया था| दोपहर का पूरा समय या तो सो कर बिताया या फिर किताब पढ़ कर| सोते-सोते जब थक जाता था तो किताब पढ़ लेता था, और किताब पढ़ते-पढ़ते जब थक जाता था, तो सो लेता था| शुक्रवार तक रुटीन लाइफ बिताने के बाद हमने शनिवार को एक स्कूटी किराए पर लिया और उसमे तेल भरा कर थोड़ी साईट सीइंग की| पहले दिन ‘डाकुओं की गुफा’, FRI और ‘शिखर फॉल’ देखने गया| ‘शिख़र फॉल’ का अनुभव काफी अभूतपूर्व रहा| दूसरे दिन सहस्त्रधारा पर नहाने में काफी आनंद आया|
                                     मसूरी
सोमवार की सुबह देहरादून में नौ दिन बिताने के बाद हम मसूरी आ गए| मसूरी शिमला और नैनीताल से काफी मिलताजुलता लगा| देहरादून में नौ दिन गर्मी झेलने के बाद, मसूरी में हमने काफी राहत महसूस की| सब कुछ बहुत ही सुन्दर लगा, लेकिन भीड़ की वजह से एक दिन बिताने के बाद ही थोड़ी उब पकड़ने लगी| दो दिन बिताने के बाद हमने मसूरी से मूव करने का तय किया| इन दो दिनों में पढ़ने का ज्यादा समय नहीं मिला| बस रात सोने से पहले राग दरबारी का कुछ पेज पढ़ लेता था| तय यह था कि हम मसूरी से ऋषिकेश जाएँगे और वहां योग सीखेंगे| लेकिन जब मैं देहरादून में था तब मेरे मित्र ने मुझे ‘धनौलटी’ के बारे में बताया था, “बहुत ही सुन्दर छोटा सा हिलस्टेशन है, समय और मौसम साथ दे तो वहां ज़रूर जाइएगा, एक दो दिन रहने जैसा है”| ‘धनौलटी’ मसूरी से 35 किलोमीटर दूर है| गाड़ी से एक घंटा लगता है| बकौल गूगल हमें पता चला कि धनौलटी मसूरी से ज्यादा सुन्दर है, और वहां ठंड भी ज्यादा है| फिर काफी चिन्तन-मनन के बाद हमने यह तय कि एक दिन हम धनौलटी में रुकेंगे और फिर वहां से चंबा, जोकि धनौलटी से 30 की.मी. की दूरी पर है,  जाएँगे, वहां भी एक दिन रुकेंगे| फिर ऋषिकेश जाएँगे और वहां योग सीखेंगे|
18 जुलाई की सुबह आज से 6 दिन पहले हम दोपहर 1 बजे के क़रीब मसूरी से धनौलटी पहुंचे| और पहुँचते के साथ ही दो घंटे के भीतर हमें धनौलटी से गहरा प्यार हो गया| हमने  सोचा कि यहाँ कम-से-कम दो या तीन दिन तो ज़रूर रुकना चाहिए| अगले दिन सुबह जब उठे, तो हमने तय किया कि यहाँ कम-से-कम एक महीना तो रुकना ही चाहिए| अब एक महीने का तो पता नहीं लेकिन इस महीने के अंत तक तो हम यहीं हैं| पिछले चार सालों से जिस जगह की अचेतन रूप से मैं तलाश कर रहा था, संभवतः यह वही जगह है| न भीड़, न शोर, न प्रदूषण, न ट्राफिक और न ही धूल मिट्टी|
                                     धनौलटी 
एक अभूतपूर्व शांति और सौदर्य से आबद्ध यह जगह किसी स्वप्नलोक से कम नहीं है| जहाँ मैं रह रहा हूँ मार्किट वहां से कोई 3 किलोमीटर की दूरी पर है| रेसॉर्ट से मार्किट जाना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है| प्रकृति का ऐसा सामीप्य मुझे पहले कभी उपलब्ध नहीं हुआ था| पहाड़, बादल, वृक्ष, और पंछी सब दस्तरस है| एक ऐसा देश जहाँ तिल रखने की भी जगह न हो, वहां एक ऐसी जगह में रहना जगहं दिन भर में मुश्किल एक या दो आदमी का दर्शन हो, काफी रोचक बात है|
                                        धनौलटी

देख रहा हूँ कि मैं लेख के मूल उदेश्य से काफी भटक गया हूँ| इन अध्यात्मिक बातों को यहीं विराम देता हूँ| अल्डोउस हक्सले की पत्नी लारा हक्सले ने एक बार किसी इंटरव्यू में एलन वाट्स से कहा था, “आप के लेक्चर का टाइटल कुछ होता है, और आप बोलते कुछ हैं|” ऐसा ही कुछ मुझे अपने लेखों में महसूस होता है, लिखना कुछ शुरू करता हूँ, और लिख कुछ और ही देता हूँ| तो अपने सोहा अली खान की किताब ‘The perils of being moderately famous’ की बात करने जा रहा था| यह तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि यात्रा पर जिन चार किताबों को मैं आपने साथ लेकर आया हूँ, उनमे से एक सोहा की किताब भी है| हालाँकि सोच कर यह आया था कि यात्रा के दौरान भीड़-भाड़ में इस किताब को पढूंगा| लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं| देहरादून और मसूरी में जब भी वक्त मिला ‘राग दरबारी’ ही पढ़ा| यहाँ धनौलटी में भी राग दरबारी ही पढ़ता रहा हूँ| परसों स्वाद बदलने के लिए सोहा को शुरू किया| और कल रात किताब समाप्त हुई| नॉर्मली मेरी कोशिश रहती है कि दिन में कम-से-कम 100 पेज पढूं| लेकिन ‘नदी के द्वीप’ के बाद से पढ़ने की स्पीड काफी स्लो हो गई है| बमुश्किल दिन में 30 पेज पढ़ पाता हूँ| इस लिहाज से सिर्फ दो दिन में 210 पेज की किताब समाप्त कर देना, इस बात का सूचक है कि किताब अच्छी और इजी-रीड है| किताब के बारे में मैं कुछ भी निष्पक्ष होकर शायद ही कह पाऊं, क्योंकि बतौर अभिनेत्री सोहा को मैं काफी पसंद करता हूँ| फिर भी मैं कोशिश करता हूँ कि आपको निष्पक्ष जानकारी दे सकूँ| किताब पढ़ने से पहले मुझे इस बात का कोई भी इल्म नहीं था कि सोहा कितनी पढ़ी लिखी हैं| हां, उनके चरित्र चुनाव को देख कर ऐसा जरूर प्रतीत होता था कि लड़की समझदार है| किताब पढ़ कर सोहा और उनके परिवार के बारे में काफी कुछ जानने को मिला| एक जहग सोहा के अब्बू मोबाइल फोन के बारे में कहते हैं, I’ll turn it on when I want to call someone. It’s to make other people available to me, not to make me available to other people.”  यह बात मुझे जमी| इसी तरह किताब में एक जगह सोहा का एक दोस्त टॉम उनसे कहता है, The good traveler has no fixed plans, and is not intent on arriving.” टॉम की इस बात से मैं इत्तेफाक रखता हूँ| अगर मुझे किताब की रेटिंग करनी हो, तो दस में से इसे मैं 3 स्टार दूंगा|
                               My होम at धनौलटी
अगर आप भी मेरी तरफ सोहा अली खान के मद्दा हैं, तो आप इस किताब को पढ़ सकते हैं, किताब आपको अच्छी लगेगी| वैसे किताब अगर किताब न होकर ब्लॉग के रूप में आता तो मैं इसकी ज्यादा सराहना करता| सोहा ने बहुत ही संभल-संभल कर सब कुछ लिखा है| किताब बिलकुल ही ‘सब्जेक्टिव’ है| इसीलिए, अगर आप किताबों को लेकर काफी चूज़ी हैं, तो फिर इस किताब से ख़ुद को दूर रखें, आपके लिए किताब में कुछ भी नहीं है| अगर मैं सोहा का फैन नहीं होता, तो चार पेज पढ़ कर मैं किताब को कहीं दूर फेक देता| मुझे इस तरह की सब्जेक्टिव किताबें बिलकुल भी पसंद नहीं है| इन किताबों को मैं बस स्वाद बदलने के लिए पढ़ता हूँ|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...