Tuesday, 5 June 2018

'क्राइम एंड पनिशमेंट'-तब्सिरा

कार्ल-चेपाक की एक कहानी है- आखिरी फैसला| उसमे कगलर नाम का एक ‘मुजरिम’ जब मरने के बाद दूसरी दुनिया की अदालत में पेश किया जाता है, तो उसने ज़िन्दगी में जो-जो कुछ किया था उसका ब्योरा उसके सामने रखा जाता है| ब्योरा सही है, वो इंकार नहीं करता| लेकिन वो सब कुछ क्यों हुआ, जब वो इसकी तफसील देना चाहता है, तो उसकी सुनवाई नहीं होती| ब्योरे की तस्दीक के लिए एक गवाह को तलब किया जाता है, और कगलर देखता रह जाता है कि जो अजीबोगरीब व्यक्ति वहां गवाही देने के लिए आता है, उसके नीले चोगे में आसमान के सितारे जड़े हुए हैं, और उसके चेहरे पर कोई इलाही नूर है कि वहां के मुनसफ भी उसके स्वागत में एक बार खड़े हो जाते है, और फिर उस इलाही व्यक्ति को गवाह के कठघरे में खड़ा करते हैं, और कहते हैं- ‘यह मुकदमा बहुत उलझा हुआ है, हालाँकि जो भी हादसे इस व्यक्ति के हाथों हुए उनमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है| लेकिन यह व्यक्ति बार-बार कहे जाता है कि वो बेगुनाह है| इसलिए खुदावंद! एक तुम हो जो परम सत्य हो, इसलिए तुम्हे बुलाया गया है- गवाही देने के लिए...
और वो गवाह कहना शुरू करता है- ‘यह कगलर अपनी माँ को इतना प्यार करता था कि उसे किसी तरह व्यक्त नहीं कर पाता था| इसीलिए यह बचपन से इतना जिद्दी हो गया कि माँ पर जब भी कोई ज्यादती की जाती, यह बाप से उलझ जाता था| इतना कि यह छोटा बच्चा हों के कारण जब एक बेबसी महसूस करता तो अपने दांतों से बाप की अँगुलियों को काट खाता....
तीनो मुनसिफ गवाह को टोक देते हैं; कहते हैं- खुदावंद, यह माँ से इतना प्यार करता था, हमें इसकी गवाही नहीं चाहिए, हमें तो यह बताओ कि इसने पहला जुर्म किसी के बाग़ से फूल तोड़ने का किया था या नहीं?
गवाह मुस्कुरा देता है, कहता है- वो फूल तो इसने एक इरमा नाम की प्यारी सी लड़की को देने के लिए तोड़े थे| वो इसे बेहद अच्छी लगती थी... वो इसके दिल में प्राणों की तरह बस गई थी...
कलगर जल्दी से पूछता है- खुदावंद! इरमा कहाँ चली गई, यही तो मुझे कभी पता नहीं चल सका...
ख़ुदा बताता है- तुम तो गरीब थे, इसलिए इरमा का विवाह मिल मालिक के लड़के से कर दिया गया, जिसे गुप्त रोग था, और इसी वजह से जब इरमा का हमल गिर गया तो वह भी बच नहीं सकी, मर गई थी...
अदालत के मुंसिफ ख़ुदा को फिर टोक देते हैं| "हमें यह सब तफसील नहीं चाहिए- हमें यह बताइए कि कगलर कब से शराब पीने लगा और बुरी सांगत में पड़ गया?"
ख़ुदा फिर मुस्कुराता देता है; कहता है- "इसका एक दोस्त था, जो जलसेना में भर्ती हो गया, और समुन्द्र की दुर्घटना में उसका जहाज डूब गया, और वो मर गया, और यह हताश होकर गलत लोगों की संगत में पड़ गया, और गारिबल नाम के एक शराबी के घर आने-जाने लगा| उसकी एक बेटी थी मेरी, जिससे यह प्यार करने लगा, लेकिन मेरी को पैसा कमाने के लिए उसके बाप ने एक ऐसी जलील जिंदगी में ढाल दिया था कि वो जवानी में ही मर गई, और मरते हुए उसका ही नाम लेकर पुकारती रही..."
मुंसिफ लोग खीझ-से उठते है, कहते हैं- "इस वाकयात का मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं, खुदावंद करीम! हमें यह बताइए कि इसने कितने क़त्ल किए?"
ईश्वर कहता है- "शहर में जब दंगा हुआ तो इसके हाथों पहला क़त्ल हुआ था| इसने जान-बूझकर नहीं किया था, पर इसके हाथों हुआ था| फिर जब इसे जेल में डाला दिया गया और वहां इसे यातनाएं दी गई तो इसके मन में वो दुःख ऐसा पकने लगा कि जेल से छूटने पर जब इसने एक लड़की से मुहब्बत की, और वो बेवफ़ा साबित हुई तो इसने उस लड़की का कत्ल कर दिया..."
और इस तरह कार्ल चेपाक की कहानी, हर घटना की गहराई में उतरती चली जाती है, और जब वो मुंसिफ आपना फैसला लिखने के लिए एक अलग कमरे में जाते हैं, तो कलगर ख़ुदा से पूछता है- "खुदावंद ! यह क्या हो रहा है? मैंने तो समझा था कि इस दूसरी दुनिया में तुम ख़ुद मुंसिफ होगे और ख़ुद फैसला सुनाओगे| लेकिन यहाँ भी..."
उस वक़्त ख़ुदा की मुस्कुराहट ग़मगीन हो जाती है और वो कहता है- फैसला सिर्फ वो लोग दे सकते हैं, जो अधूरा सच जानते हैं| मैं तो पूरा सच जानता हूँ| और पूरा सच जानने वाला इस तरह से फैसले नहीं देता....
“I wanted to become a Napoleon, that is why I killed her... Do you understand now?- Crime and Punishment
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नायक राम भी है और रावण भी| और दोस्तोवस्की राम को रावण से  और रावण को राम से अलग करने के लिए कहीं भी अस्पष्ट लकीर नहीं खीचते है| दोस्तोवस्की अपने पत्रों को कभी भी किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| उनकी किताब में न तो कोई खलनायक होता है, और न ही कोई नायक| दोस्तोवस्की मनुष्य के मन को समझते है, वे जानते हैं कि मनुष्य बहुचितवान है, उसे किसी छवि के साथ कैद करना न्याय नहीं है| इसीलिए ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ हो या ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’, कहीं भी आप यह तय नहीं कर पाएँगे कि कौन सही था और कौन गलत| अपने पात्रों के साथ जितना न्याय दोस्तोवस्की कर पाते है, उतना और किसी ने नहीं किया है| सभी लेखक पक्षपातों और अपने समूह की मान्यताओं से बंधे होते हैं| हर कोई अपने चश्मे से चाँद को देखता है, और अपने ढंग से उसकी व्याख्या करता है| लेकिन दोस्तोवस्की नंगी आँख से खुले आसमान के नीचे खड़े हो कर चाँद को देखते हैं, और फिर चाँद उनसे जो भी कहता है, उसे लिख देते हैं| दोस्तोवस्की की अपनी कोई मान्यता नहीं है, उनके पात्र स्वतंत्र हैं| इसीलिए सत्य के जितने क़रीब दोस्तोवस्की आ पाते हैं, उतना कोई दूसरा नहीं आ पता है| दोस्तोवस्की को पढ़ना बेघर होने जैसा है| जिस ज़मीन पर आप अभी खड़े हैं, उसे दोस्तोवस्की आपके पैरों के नीचे से खींच लेंगे| दोस्तोवस्की को पढ़ना एक अनंत खाई में गिरने जैसा है|
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ दोस्तोवस्की की सबसे प्रसिद्ध कृति है| आप अगर गूगल पर दुनिया के सबसे लोकप्रिय उपन्यासों की सूचि ढूंढेंगे, तो उसमे प्रथम दस में ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नाम आता है| बहुत ही सरल कृति है, कहानी समझने मैं आपको कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी| पात्र भी ज्यादा नहीं हैं, इसीलिए नाम याद रखने में भी ज्यादा झंझंट नहीं होती है| रूसी उपन्यास पढ़ने में सबसे अधिक दिक्कत नाम याद करने की ही होती है| अगर आप दुनिया के बेहतरीन साहित्यों से अभी तक परिचित नहीं हैं, तो ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ आपके के लिए सबसे उपयुक्त किताब है| आप यहाँ से शुरुआत कर सकते हैं| लेकिन शुरुआत को अंत मत मान लीजिएगा, ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में जिस बीच को दोस्तोवस्की ने रोपा है, वह ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ में वृक्ष बनता है, ‘दी इडियट’ में उसमे फूल लगते हैं, और ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ उस फूल की सुवास है| 

पीछे मैंने आपसे लियो टॉलस्टॉय एक किताब ‘रेज़रेक्शन’ की बात की थी| उस किताब में टॉलस्टॉय एक जगह लिखते हैं, “यह एक आम मान्यता है कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं- अच्छे और बुरे| जो अच्छा है वह हमेशा अच्छा है, और जो बुरा है वह हमेशा बुरा है| लेकिन यह मान्यता भ्रांत है| बुरे से बुरा आदमी भी हमेशा बुरा नहीं होता है, और अच्छे से अच्छा आदमी भी हमेशा अच्छा नहीं होता है| इन फैक्ट, आदमी न तो अच्छा होता है और न ही बुरा, वह बस आदमी होता है|” इसी चीज़ को लओत्जु दूसरे ढंग से कहते हैं, “तारीफ़ और निंदा दोनों इंसान को पाखंड की ओर धकेलता है| जब तुम किसी से कहते हो, “आप अच्छे हैं”, तो तुम उसे अच्छाई से बाँध रहे हो, अब तुम्हारी नज़र में अच्छा बने रहने के लिए वह पाखंड का सहारा लेगा| इसी तरह जब तुम किसी से कहते हो, “आप बुरे हैं”, तब तुम उसे बुराई से बाँध देते हो| एक बार जब कोई व्यक्ति किसी ‘छवि’ से बंध जाता है, तो उसे कायम रखने के लिए वह पाखंड का सहारा लेने लगता है|’’ एक बार जब हम किसी व्यक्ति को किसी छवि से बाँध कर देख लेते हैं, तो फिर उसे छवि से परे देखने में हमें परेशानी होनी लगती है| जैसे अगर कोई हमसे यह कहने लगे कि रावण उतना बुरा नहीं था जितना हम उसे बारे में सोचते है, और राम उतने भी अच्छे नहीं जितना हम उन्हें मानते हैं, तो हमें परेशानी होने लगती है, हम असहज होने लगते हैं| हम ऐसा मान कर चलते हैं कि राम सदा अच्छे थे, और रावण सदा बुरा था| लेकिन यह मान्यता सही नहीं है| कोई भी राम हमेशा अच्छा नहीं होता है, और न ही कोई रावण हमेशा बुरा होता है| लेकिन हम ऐसा मान कर चलते है, इसीलिए हम फिर राम की गलतियों और रावण के पुण्यों पर लीपापोती करने लगते हैं| हम राम की कहानी में से उन सब बातों को हटा देते हैं, जिससे हमारी अच्छे की मान्यता को चोट पहुँचती हो, और रावण की कहानी में उन सब बुराइयों को भी जोड़ देते हैं, जो रावण में कभी था भी नहीं| हमारी सभी कहानियां अतिशयोक्तियों से भरी पड़ी है|
लेकिन हम इन तथ्यों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं| क्योंकि इन को स्वीकार करते ही हमारी न्याय व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी| क्योंकि जिसको हम बुरा कह रहे हैं, वह अगर हमेशा बुरा नहीं है, और जिसको हम अच्छा कह रहे हैं, हमेशा अच्छा नहीं है, तो फिर सज़ा कैसे देंगे? सज़ा देने के लिए यह सिद्ध कर देना अत्यंत आवश्यक है कि बुरा हमेशा बुरा है, और अच्छा हमेशा अच्छा है|
लेकिन अगर अच्छा, अच्छा नहीं है, और बुरा, बुरा नहीं है, और हम इस तथ्य को स्वीकारते हैं, तो हमें अपने कथा-कहानियों को फिर से लिखना पड़ेगा| फिर हमें इस कहावत को बदलना पड़ेगा कि ‘सत्यमेव जयते’, यह कहावत झूठ है, मामला बस इतना है कि जो भी जीतता है उसे सत्य मान लिया जाता है| क्योंकि वस्तुतः न तो इस जगत कुछ सत्य है, और न ही झूठ- सब व्याख्या है| एक ‘तथ्य’ की व्याख्या हज़ार तरीके से की जा सकती| जिस तर्क से हम राम को भगवान सिद्ध करते हैं, और रावण को राक्षस उसी तर्क से इससे उल्टा भी सिद्ध किया जा सकता है| सारे तर्क बेठुआ होते हैं| इसीलिए कोई भी मान्यता कभी भी सार्वभौमिक नहीं हो सकती है| पूरी दुनिया किभी भी किसी आदमी को एक मत होकर कभी न तो अच्छा मान सकती है, और न ही कभी बुरा| अगर दुनिया में राम, कृष्ण, महावीर और बुद्ध को पूजने वाले लोग हैं, तो ऐसे भी लोग हैं जो रावण, कंस, हिटलर और तैमूर को पूजते हैं| किसी खास समुदाय में ही किसी को अच्छा या बुरा माना जा सकता है| इसीलिए हर व्यक्ति अपने हिसाब के समूह के साथ रहना पसंद करता है| और एक समूह का व्यक्ति हमेशा दूसरे समूह के लोगों को गलत मान कर चलता है| अगर हमारे समूह में शादीशुदा और पतिव्रता स्त्री को सही माना जाता है, तो इस दुनिया में ऐसे समूह हैं जिसमे वेश्याओं को सही माना जाता है, और शादीशुदा स्त्री को नीच और चरित्रहीन समझा जाता है| ऐसे में आप कैसे तय कर सकते हैं कि कौन सही है, और कौन गलत? हमारे पास सही और गलत को तय करने का एक ही पैमाना है और वो है भीड़| हमारी मान्यता है कि अधिक लोग जिस मत में मानते हैं वह सही है| लेकिन यह मान्यता बिलकुल ही भ्रांत है| क्योंकि ऐसे लोग हैं जो यह सिद्ध करने पर अमादा हैं कि अधिक लोग सिर्फ उन्ही चीज़ों को मानते हैं जो बिलकुल ही नासमझी की है| वे भीड़ की तुलना भेड़ से करते हैं| उनके अनुसार भीड़ हमेशा अंधानुकरण में जीती है|
सब के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं, सब के पास अपनी-अपनी मान्यताएं हैं| इसीलिए जिसको भी आप गौर से सुनेंगे वही आपको सही लगने लगेगा| सभी मतों के लोगों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है उनके समूह का व्यक्ति किसी और समूह की बात को गौर से न सुने| इसीलिए सब भोपूं लगा कर अपनी गुणगान और दूसरों की निंदा करने में लगे रहते हैं|
दोस्तोवस्की, कामू, चेपक, काफ्का और टॉलस्टॉय को पढ़ना नए पाठकों के लिए बहुत ही हिलाने वला अनुभव हो सकता है| इन लोगों का संबंध किसी समूह से नहीं है, ये मान्यताओं में नहीं मानते हैं| ये मनुष्य को उसकी पूरी विराटता और संभावनाओं के साथ स्वीकार करते हैं, उसे किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| दोस्तोवस्की ख़ुदावंद है जो सिर्फ गवाही देते हैं, फैसला करने का काम वे पाठकों पर छोड़ देते हैं| लेकिन बिडम्बना यह है कि इनको पढ़ने के बाद पाठक किसी भी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में रह नहीं जाता है| जिसने एक बार ख़ुदावंद को सुन लिया, उस का ख़ुदा हो जाना तय है| यही तो तुलसी कहते हैं, “झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥“
      Crime? What crime? He cried in sudden fury. ‘That I killed a vile noxious insect, an old pawnbroker woman, of use to no one !... Killing her was atonement for forty sins. She was sucking the life out of poor people. Was that a crime? - Crime and Punishment


-इक्क्यु केंशो तजु 

7 comments:

  1. Perception और personality ......को बहुत ही बारीकी से उजागर करता लेख....

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  2. गजब लिखते हो यार एक एक पैराग्राफ नशे में सराबोर लगता है बस पीता ही रहूं लगता है ।

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    1. हौसलाअफजाई के लिए शुक्रिया मित्र ... :)

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  3. Right post ,,thanks �� I will wait for next

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    1. Thank you so much for reading and appreciating.. :)

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