Thursday, 31 May 2018

‘दिये की आख़िरी दीप्ती’-तब्सिरा

किताब का नाम- नदी के द्वीप, लेखक- हीरानंद सचिदानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’

“संतान को पढ़ा-लिखा कर फिर अपनी इच्छा पर चलाना चाहने का मतलब है स्वयं अपनी दी हुई शिक्षा-दीक्षा को अमान्य करना, अपने को अमान्य करना, क्योंकि बीस बरस में माँ-बाप संतान को स्वतंत्र विचार करना भी न सिखा सके तो उन्होंने क्या सिखाया?”- नदी के द्वीप

काफी दिनो से मैं ‘नदी के द्वीप’ बारे में लिखना चाह रहा था, लेकिन कोई सिरा ही नहीं मिल रहा था कि बात कहाँ से शुरू करूँ| टॉलस्टॉय, दोस्तोवस्की, कामू और काफ्का की किताबों के बारे में लिखना मेरे लिए सहल है, लेकिन अज्ञेय के बारे में बात करना मेरे लिए ख़ुद के बारे में बात करने जैसा है| किसी के बारे बात करने के लिए थोड़ी दूरी चाहिए होती है| थोड़ा फालसा चाहिए, अवलोकन करने के लिए| अज्ञेय और ख़ुद के बीच मैं इंच भर का भी फासला नहीं पाता हूँ| और अपने बारे में बात करने में आदमी हमेशा ही बड़ा असहज महसूस करता है|

       “तुम मुखातिब भी हो और क़रीब भी, तुम को देखूं कि तुमसे बात करूँ”

जैसे ही अज्ञेय के बारे में कुछ लिखता हूँ, वैसे ही ऐसा महसूस होने लगता है कि जैसे अज्ञेय से मेरी दूरी बढ़ रही, और मैं बेचैन होने लगता हूँ, फिर लिखना बंद कर देता हूँ| इसी कशमकश में चार दिन से रोज़ लिख-लिख कर मिटाता रहा हूँ| कल तो मैंने यह तय किया कि अभी ‘तब्सिरा’ नहीं लिखूंगा, कुछ दिन पढ़ने पर जोर देता हूँ, फिर कभी लय बंधा तो लिखना शुरू करूँगा| लेकिन कल एक मित्र ने एक कहानी भेज दी, उस कहानी को पढ़ने के बाद, बिना लिखे रह नहीं पा रहा हूँ| कहानी ने जैसे भीतर कोई झरोखा खोल दिया हो, द्वन्द के सारे बादल छंट गए हैं, और खिड़की के सलाखों के उस पार अज्ञेय पूर्णिमा की चाँद की तरह चमक रहे हैं| मैं खिड़की के इस तरफ खड़ा हूँ, और अज्ञेय उस तरफ से मुझे आवाज़ दे कर बुला रहे है, “इधर मेरे पास आओ, आओ आकाश को छूते हैं, उसका व्यास नापते हैं”| उनके इसी निमंत्रण को स्वीकार करके मैंने लिखने का निर्णय लिया है| क्योंकि मैं चाहता हूँ, आप भी मेरे साथ आए और अज्ञेय की ऊँगली पकड़ कर आकाश की सैर करें, उसको छुएँ, और उसके व्यास को नापें|  

इससे पहले कि मैं आपसे ‘नदी के द्वीप’ के बारे में कहूँ, मैं आपको वह कहानी सुना दूँ, जिसे पढ़ कर यह सब घटना घटी है| कहानी- डिप्रेशन से ग्रस्त व्यक्ति एक बड़े डाक्टर के पास गया| डाक्टर ने उसकी जांच की और पाया कि उसे कुछ भी नहीं है | डाक्टर बोला, मुझे तुम्हारे शरीर में कुछ भी गलत दिखाई नहीं पड़ता, और मैं तुम्हें किसी दवा का सुझाव नहीं दूँगा| बल्कि शहर में एक प्रसिद्ध कॉमेडियन ग्रिमाल्डी का कॉमेडी शो हो रहा है, तुम वह देखने चले जाओ| कॉमेडी शो में जी भर के हंसो| यदि तुम हंस सको तो तुम्हारी सारी उदासी, सारा विषाद, सारा डिप्रेशन गायब हो जाएगा| और उसका असर तुम पर किसी भी दवा से ज्यादा गहरा होगा क्योंकि तुम्हारे शरीर में कुछ भी गलत नहीं है| तुम केवल एक चीज भूल गए हो, और वह यह है कि कैसे हंसा जाए| तुम हंसने की भाषा ही भूल गए हो| और वह यह कि कैसे हंसा जाए| तुम्हें यह भाषा फिर से सीखनी  होगी| तुम्हें किसी उपचार की जरूरत नहीं है| बस ग्रिमाल्डी के शो में जाओ और हंसों| वह व्यक्ति बोला,  "अरे मैं ही तो ग्रिमाल्डी हूं"|

“मैं जागती हूँ कि सोती हूँ? तुम हो, कि स्वप्न हो? मुझे लगता है कि मैं जागती हूँ, जाग कर तुम्हे देखती हूँ, और आश्वस्त हो कर सो जाती हूँ| लेकिन शायद सोती हूँ सोते में देख कर जाग उठती हूँ...”- नदी के द्वीप

इस कहानी को पढ़ते ही मुझे एकदम से समझ आया कि वो क्या था, जो अज्ञेय के बारे में मैं कहना चाह रहा था, और नहीं कह पा रहा था| और इसी वजह से इतने दिनों से ‘तब्सिरा’ लिख नहीं पा रह था| ‘अज्ञेय ग्रिमाल्डी नहीं हैं, और हमारे 99 फीसदी लेखक, कवि, और कलाकार ग्रिमाल्डी हैं| बस यही भेद है, अज्ञेय और दूसरे लेखकों में| अज्ञेय दुःखवादी नहीं हैं| ना ही कामू और दोस्तोवस्की की तरह जीवन उनके लिए ‘absurd(बेहूदा) है| अपने समसामयिकों की तरह अज्ञेय बुद्ध के पहले आर्य सत्य ‘जीवन दुःख है’ पर खुट्टा गाड़ कर नहीं बैठे हैं| अज्ञेय बुद्ध के दूसरे, तीसरे और चौथे आर्य सत्य से भी भलीभांति परिचित हैं| और इसीलिए मेरा अज्ञेय से मेल बैठता है|

“भविष्य की बात नहीं सोचनी चाहिए-वर्तमान ही सब-कुछ है, भविष्य केवल उसका एक प्रस्फुटन है| सोचने को तो हम बहुत कुछ सोचते हैं, पर जब जांच कर के देखते हैं तो यही मानना पड़ता है कि हाँ, वर्तमान ही सब-कुछ है|” –नदी के द्वीप

वे लेखक जो बचपन में अपनी दादी और नानी से कहानी सुन कर बड़े होते हैं, वे कभी भी अच्छे लेखक नहीं बन सकते हैं| अच्छा लेखक वही हो सकाता है जिसने अपने बाप से कहानी सुनी हो, असली कहानी बाप, दादा और नाना के पास होती है, नानी और दादी के पास नहीं| जिनको बचकानी कहानियां पढ़नी और सुननी हो, अज्ञेय उनके लिए नहीं है| और चूँकि अज्ञेय ग्रिमाल्डी नहीं हैं, इसीलिए फूहड़ बातें करके न तो उन्हें अपना गम ग़लत करना है, और न ही आपका| अज्ञेय मनोभंजन के लिए लिखते हैं, मनोरंजन के लिए नहीं| इसीलिए लिए उनकी कहानी ‘केवल बौद्धिक रूप से व्यस्कों के लिए’ है|

“जीवन एक बार का वरण नहीं है, वह अनंत वरण है; प्रत्येक क्षण हम स्वीकार और परिहार करते चलते हैं” – नदी के द्वीप

हिंदी जानने की सर्थकता इसी में है कि आपने ‘नदी के द्वीप’ पढ़ी हो| अगर आपने अभी तक यह किताब नहीं पढ़ी है, तो हिंदी जानने का कोई मतलब नहीं है| फिर अभी तक आप हिंदी के सिर्फ अपशब्दों से परिचित हैं, शब्द को आपने अभी तक नहीं जाना है|
‘नदी के द्वीप’ पढ़ते समय दो तीन बातों का ख़ास ध्यान रखें, तभी आप इस किताब का पूरा आनंद ले सकते हैं| पहला यह कि इस किताब को किसी पहाड़ पर पढ़े| अज्ञेय ने अपना ज्यादातर लेखन पहाड़ों में बैठ कर ही किया है, इसीलिए उनकी कहानी में एक विशालता है, जो पहाड़ों से उसमें आई है| बंद कमरे में आप इस उपन्यास को नहीं पढ़ सकते हैं, अगर आपने कोशिश की तो मारे घुटन के आपकी जान भी जा सकती है| दूसरा जब भी किताब पढ़ने बैठें कॉफ़ी का मग साथ लेकर बैठे| कॉफ़ी और पहाड़ दो सहयोगी शर्तें हैं, इनको पूरा करके ही आप किताब को पढ़, समझ और आत्मसात कर सकते हैं| तो, अगली बार, जब कभी शिमला, मनाली, या फिर नैनीताल जाना हो, तो यह किताब साथ लेते जाइएगा|

-इक्क्यु केंशो तजु 


'I don't enjoy earning money.'(Old office diary)

Date- 20/02/2014, Place- Mumbai 

"If I was drowning in the ocean and had to choose just one novel out of all the millions of novels in the world, I would choose Anna Karenina. It would be beautiful to be with that beautiful book. It has to be read and read again; only then you can feel it, smell it, and taste the flavour. It is no ordinary book." -Osho

For some days, I have just been watching movies, first watched 'Zindagi Na  Milegi Dobara, then, 'Do Bigha Zameen', and today I finished watching 'Godfather-II', last part is yet to be watched. 
 Watching movie is not possible in the office, so I keep reading something or the other. These days I have been reading 'Anna Karenina' by Leo Tolstoy. It's such a huge novel, almost 800 pages, but I have come to love this novel; it's very dramatic and intense. Anna, the main protagonist in the novel, is very vivacious; she is full of life and supremely beautiful. Now I know why Osho loved this novel so much. This novel is a work of art, each line makes you think and think deeply, it goes deep inside you. 
   “He stepped down, trying not to look long at her, as if she were the sun, yet he saw her, like the sun, even without looking.” ― Leo Tolstoy, Anna Karenina
   
                                                     'Anna Karenina' by Leo Tolstoy
In the office, I am not being given new work; my boss has not been turning up to the office for many days, only God knows what he is up to..!! I fear I may lose my job. Though I am bored with what I am doing, yet I would like to stay at my job for sometimes. A part of me always keeps telling me to leave the job and take rest for some months. Since 2002, I have been very busy, earlier I was busy with my study, then work. Now, I need some gape, and I think now I can have some free time, as I don't have any major responsibility on my shoulder. 

I am very much aware of the fact that it's time to make money, I am not supposed to take rest at this age. But I don't know why I don't enjoy earning money. My sir is not keeping well, he has asked me to write biographies on his behalf and has offered me 50% of the amount he gets for a bio, but I am not writing. I have plenty of free time; I come back home around 7 in the evening and sleep around 2 at night, I can easily complete a bio in two or three days, but only Jesus knows why I don't write. 

In all its likelihood, on 8th of the coming month, I will go to my native place; I am looking forward to going there. It's been really long, since Nepal I have not visited my family. 

These days everything is going smoothly barring my job, however, I am not very much worried about it. 

Sometimes I do get upset because of sir's ill health. Whenever I go to see him I feel immense pain in my heart. 

Lately, I have observed that I have developed escaping tendency. I never pay my bills on time. I always pay them after due day with late charges. In the office, I never complete my work before the deadline, unless I feel 'now I will be fired from the job', I don't submit my work.' I carry the same attitude with many things. I always keep contradicting myself. Sometimes, I say 'I want this, but in the same breath, I say I don't want it.' I am never sure and certain about what I want and what I don't want. Most of the time, I feel restless for no known reason. I have developed devil may care attitude with so many things. 

                                                      This is it....enough for today. 

Sunday, 27 May 2018

“द आउटसाइडर’


              किताब का नाम- द आउटसाइडर, लेखक- अल्बर्ट कामू
               “My mother died today. Or maybe yesterday, I don’t know.”- The outsider
अलबर्ट कामू पिछली सदी के उन चंद ख़तरनाक लोगों में से एक हैं, जिनको पढ़ना और जिनसे बचना दोनों ही बहुत ज़रूरी है| लेकिन समस्या यह है कि यह दो काम एक साथ संभव नहीं है| अगर आप इनको पढ़ते हैं, तो इन से बचना क़रीब-क़रीब असंभव है| क़रीब-क़रीब इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि कुछ हैं जिनकी बुद्धि भैंस की चमड़ी जितनी मोटी होती है, (ये भेंस की चमड़ी वाली बात बचपन में माँ मेरे लिए इस्तेमाल में लाती थी) ऐसी मोटी बुद्धि वाले लोग, पढ़कर भी बच सकते हैं| बांकी जो थोड़े भी समझदार और चेतनावान हैं, उन के लिए बचना बहुत ही मुश्किल है|
                             “Mama often said that no one is ever really entirely unhappy.”
कामू की द आउटसाइडर’ 120 पेज की एक बहुत ही पतली किताब है| किताब को बड़े आराम से एक दिन में पढ़ा जा सकता है, कहनी बिलकुल सरल और सीधी है| लेकिन इसको पचाने में आपको सालों लग सकते हैं| और अगर ग़लती से आप इसे नहीं पचा पाए, तो पहले यह नासूर बनेगा, फिर नासूर से कर्क रोग, और अंत में आप केंसर से मर जाएंगे| तो, इसे पढ़ने से पहले अच्छे से सोच विचार कर लेना जरूरी है| नहीं तो आपकी स्थिति सांप छुछुंदर जैसी हो जाएगी| अगर पचा लिया, तो आप एक ऐसे व्यक्ति हो जाएंगे, जिस तरह के व्यक्तियों से आपके माता-पिता बचपन में आपको हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे| और अगर नहीं पचा पाए, तो कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से आपकी मौत होगी|

कामू का मर्सो बहुत ही ख़तरनाक आदमी है| सामने माँ की लाश पड़ी है, और वह रोने-धोने के बजाए सिगरेट फूंक रहा है| 24 घंटे भी माँ को जलाए नहीं हुए हैं, और वह स्विमिंग पूल में अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ रंगरलियां मना रहा है, “Gentlemen of the Jury, just after his mother’s death, this man went swimming, began a casual affair and went to see a comedy. I have nothing more to say.” लेकिन इस सब का यह अर्थ नहीं है कि मर्सो अपनी माँ से प्यार नहीं करता है| नहीं वह अपनी माँ से उतना ही प्यार करता है, जितना कोई भी बेटा अपनी माँ से कर सकता है, “I undoubtedly loved Mama very much, but that didn’t mean anything. Every normal person sometimes wishes the people they love would die.” मर्सो वहां से बोल रहा हैं, जिसको जुंग ने स्टोरहाउस ऑफ़ कांशसनेसकहा है| यह वह जगह है, जहाँ आप दिन तो क्या रात सपने में भी जाना पसंद नहीं करते हैं|
                                                “Everything is true and nothing is true.”
द आउटसाइडरकामू की कालजयी रचना है| कामू का मर्सो मेरे लिए बिलकुल भी अजनबीनहीं है| साहित्य संसार में, कामू की द स्ट्रेंजर/आउटसाइडरपढ़ने से पहले, मर्सो के अलावा दो और लोगों को, मैं बहुत पहले से जानता था, जो मर्सो की तरह आउटसाइडर हैं| एक तुर्गनेव का बज़ारोव और दूसरा दोस्तोवस्की का रस्कोलनिकोव | तुर्गनेव का बज़ारोवमेरे सबसे अधिक पसंदीदा साहित्य चरित्रों में से एक है| रस्कोलनिकोव को में समझ सकता हूँ, इन फैक्ट उसे अच्छे से समझता हूँ, फिर भी उसमे कुछ ऐसा है जो मेरे लिए दस्तरस नहीं है| मेरी पूरी सहानुभूति उसके साथ नहीं है| बज़ारोव के साथ मेरी समानुभूति है, उसके साथ मैं 100 फीसदी राज़ी हूँ|
निज़ी ज़िन्दगी में भी, मैं मर्सो और बज़ारोव से बहुत ही अच्छे से परिचित हूँ| लेकिन आपके लिए किताब 10000 वोल्ट का झटका हो सकता है| इसीलिए जरा संभल कर| ‘तब्सिरापढ़ कर झट से आर्डर मत दे दीजिएगा| इस किताब को पढ़ने के बाद कई लोगों का दिमागी संतुलन बिगड़ चुका है| एक महानुभाव, जिनका नाम कामेल दाउद है, का दिमाग किताब पढ़ कर इतना सटक गया कि इन्होने इस किताब के खिलाफ एक पूरी किताब लिख दी| इसलिए ज़रा संभल कर, बहुत कठिन है डगर पनघट की| किताब का हैंगओवर महीनो तक आप पर हावी रह सकता है| एक बार दोस्तोवस्की की ब्रदर्स करमाज़ोवपढ़ते-पढ़ते मुझे ही ऐसा लगने लगा था कि कहीं मैं ही पागल ना हो जाऊं(क्या पता हो ही गया होऊं)| दोस्तोवस्की और कामू एक ही स्कूल से आते हैं| अतः दोनों, आपको सच में पागल कर सकते हैं| कामू एक बहुत ही ख़तरनाक दार्शनिक हैं, उनका दर्शन ईश्वर के इर्दगिर्द नहीं घूमता है| ईश्वर इत्यादि के बकवास में वे ज्यादा उत्सुक नहीं है| उनके लिए जीवन में एक ही मूलभूत समस्या है, आत्महत्या करें या ना करें?” इसीलिए अगर आपको जीवन पर पकड़ बनाए रखनी हो, तो कामू से थोड़ी दूरी बना कर रखिये|
“I have never truly been able to regret anything. I was always preoccupied by what was about to happen, either today or tomorrow.”
अगर आपको अपनी घर-गृहस्थी, और रोजगार ठीक ढंग से चलाना है, और किसी जोम्बी की तरह घिसट-घिसट कर मर जाना है, तो मैं यहाँ आपको उन लोगों के नामों की लिस्ट दे रहा हूँ, जिनसे मिलना तो दूर, आपको उनके आसपास भी नहीं फटकना चाहिए| दोस्तोवस्की(दइडियट और ब्रदर्स करमाज़ोव और नोट्स फॉर्म अंडरग्राउंड), तुर्गनेव (फादर्स एंड संस), कामू (द आउटसाइडर), हक्सले (आइलैंड), एलन वाट्स (दी बुक), टॉलस्टॉय (रेज़रेक्शन) और काफ्का (कहानियां), ये वो सात लोग हैं, जिन से आपको हमेशा बच कर रहना चाहिए| अगर ग़लती से भी कभी आप इनके चपेटे में आ गए, तो फिर धोबी के गधे की तरह, आप ना तो घर के रह जाएंगे, और ना ही घाट के| इस लिस्ट में दो और नाम हैं| ये दोनों भस्मासुर भारतीय हैं| मैंने जानबूझ कर इन दोनों महाभूपों का नाम लिस्ट में शामिल नहीं किया है| क्योंकि, ये दोनों लॉरेन हार्डी, उन लोगों के लिए हैं, जो अपना आमूल विनाश यानि सर्वनाश चाहते हैं| ये दोनों उनके लिए हैं, जिनके इंतजार में कबीर बीच गाँव में खड़े होकर कह रहे हैं, कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकठी हाथ जो घर बारे आपना चले हमारे साथ| ये उन फ़कीरों के लिए हैं, जिनकी घर फूंकने की तैयारी है, आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक"| जो एक बार घर छोड़ कर निकला तो फिर मुड़ कर नहीं देखा| ये उनके लिए लिए हैं जिनके कुल में अब कोई रोने धोने के लिए भी नहीं बचा,राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा
        “Even in the dock, it is always interesting to hear people talk about you.” -The outsider
अगर आप ख़ुद का नामोंनिशान हमेशा-हमेशा के लिए मिटाने के लिए आमादा हों, तो मैं आपको उनका नाम बता सकता हूँ| इन फैक्ट अभी ही बता देता हूँ, शुभ कार्य में विलंब क्यों? एक हैं मैरून माफ़िया के सरगना धार्मिक आतंकवादी ओशो’, और दूसरे हैं धर्म के ब्रह्मास्त्र जिद्दु कृष्णमूर्ति| ये दोनों वो तीर्थ हैं, जहाँ से नाहा कर कोई वापिस नहीं लौटता| ये दोनों काल के गाल हैं, एक बार अगर आप इनमे प्रवेश करते हैं, तो फिर ‘come back’ नहीं है| ये दोनों महामृत्यु हैं
ये दोनों बड़े ही अनूठे ढंग से आपका क़त्ल करेंगे| एक पहले लतीफ़ा और लच्छेदार बातें सुना कर आपको हँसाएगा, गुदगुदी लगेगा, हँसाते-हंसाते आपको बेसुध कर देगा| जब आप हँसते-हँसते बेहोश हो कर गिर जाएँगे, तब तर्क की दोधारी तलवार से आप का गला रेत दिया जाएगा| एक बूंद भी शोणित नहीं बहेगा और आप का काम तमाम हो जाएगा| दूसरा, आपको लतीफ़ा तो नहीं सुनाएगा, लेकिन बात ही इनती अनोखी बोलेगा कि सुन कर आपको हंसी आएगी| लेकिन क्या आपको हंसने दिया जाएगा? जी नहीं आपको हंसने नहीं दिया जाएगा| “Sir, please don’t laugh, don’t waste your energy.” ऐसा बोल कर आपको चुप कर दिया जाएगा| लेकिन कितनी देर कोई हंसी रोक कर बैठ सकता है? किसी भी चीज़ की एक सीमा होती है| आप का दम घुटने लगेगा, आपके प्राण शरीर छोड़ने के लिए छटपटाएंगे| जल्दी ही आप उस पॉइंट पर पहुँच जाएँगे, जहाँ एक और लतीफ़े जैसी बातअगर आपको सुनाई गई, और हंसने नहीं दिया गया, तो तक्षण आप पूरे हो जाएँगे| लेकिन आप उस क्षण इस घुटन भरी जिंदगी से मर जाना ज्यादा उचित समझेंगे| आपको अपने मरने का ग़म नहीं होगा| आपको बेसब्री से इंतजार कर  रहे होंगे एक और लतीफ़े जैसी बातकी..., आप चाह रहे होंगे हैं कि एक और लतीफ़ा आपको सुनाया जाए...., और आपको इस घुटन से..., इस देह की बोझ से मुक्ति मिल जाए| ताकि आप स्वर्ग में खुल कर हंस सके| लेकिन तभी कहानी में ट्विस्ट की तरह आपसे एक यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| प्रश्न सुनकर आप हंसी भूल जाएँगे| अब दांत निपोड़ने के बजाए, आप अपना सिर खुजाने लगेंगे| आपको सिर खुजाते देख कर, आपसे एक और यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| फिर आपको दाढ़ी में खुजली होने लगेगी| आपको अपनी दाढ़ी खुजाता देख कर, आप से तीसरा सवाल पूछा जाएगा| अब आपको पीठ में खुजली होने लगेगी| फिर चौथा प्रश्न, फिर पांचवा, फिर छठा, एक के बाद एक प्रश्नों की बमबारी शुरू हो जाएगी| अब, आपके पूरे शरीर में खुजली का भयंकर उत्पात मचेगा| सिर से लेकर पैर तक कोई ऐसा अंग नहीं बचेगा जहाँ आपको खुजली नहीं हो रही होगी| एक ऐसी घनघोर खुजली मचेगी, जिसकी आपने कभी सपनो में भी परिकल्पना नहीं की होगी| काश उस वक़्त आपके पास दस हाथ होते! लेकिन यह तो काशहै, हकीकत यह है कि आपके पास सिर्फ दो ही हाथ है| और दो कमज़ोर हाथों से आप कितना खुजा सकते हैं....? आपको अफ़सोस होगा कि आज ही आपने नाखून क्यूँ कटा था? आप सोचेंगे, 'आज अगर नाख़ून बड़े होते तो अच्छे से खुजा पता'| किसी से आप मदद भी नहीं मांग पाएँगे, क्योंकि आपका पड़ोसी भी आपनी खुजली शांत करने में व्यस्त होगा| पहले से पता होता, तो घर से खुजली की कोई दवाई, लेकर आये होते, लेकिन अब इस वक्त इस निर्जन में क्या उपाय करे कोई? अरे पहले पता होता तो आप आते ही नहीं, लेकिन अब क्या हो सकता है? खुजली का भयंकर उत्पात परमाणु के विस्फोट की तरह एक से तीन, तीन से 9 और फिर 9 से अनंत की तरफ बढ़ता ही चला जाएगा| अंत में कुछ खुलजी और कुछ खुलजी को ना खुजा पाने की खुजली की वजह से, मौके पर ही आप टें बोल देंगे| और किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होगी कि आप खुजली से मरे|  "वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किस ने किया है, ये काम किस का था " |  फिर घटेगा चमत्कारों का चमत्कार, मर कर आप पाएँगे कि जीतेजी जिन यक्ष प्रश्नों को सुन कर सिर खुजा रहे थे, मरते ही उन सारे प्रश्नों का आपको हल मिल गया| लेकिन अब इस ज्ञान का क्या फायदा? क्या बरसा जब कृषि सुखाने? 
“She murmured that I was very strange, that she undoubtedly loved me for that very reason, but that one day she might find me repulsive, for the some reason.” –The outsider
इन सात और दो नौ, लोगों से अगर आप ख़ुद को बचा लेते हैं, तो आप हमेशा सेफ है, फिर कोई माई-का-लाल आपको आपके नर्क से खीच कर बाहर नहीं ला सकता है| फिर आराम से नौकरी कीजिये, पैसा कमाइए, घर बनाइये, नाम कमाइये, जो मन में आये वो कीजिये, जिंदगी अपनी है, मौज जीते से रहिए| बस इन कुल-सोधनोंसे बचिए| अगर आपको रस्ते में सांप और इन दोनों में कोई एक साथ दिख जाएँ, तो पहले इनको मारिये, सांप का काटा तो बच भी सकता है, लेकिन इनका काटा हुआ, बिना पानी मांगे ही दम तोड़ देता है|  जैसे शंकर ने कहा था भज गोविन्दं मूढ़मते, उसी तरह मैं आप से कहना चाहता हूँ, बच इन दोनों से मूढ़मते, बच| इनसे अगर जान बच गई, तो जीने के लाखो उपाय कर लेंगे| फिर तो, सौ-सौ जूते खाएँगे, मगर तमाशा घुस कर देखेंगे| 
“The first few days she was at the old people’s home, she often cried. But that was because her routine had changed. After a few months, she would have cried if she’d been taken out of the home. For the same reason.” – The outsider


Saturday, 26 May 2018

'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस'- तब्सिरा

किताब का नाम- 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस', लेखक-ऑस्पेंसकी 

आज मैं आपसे जिस किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ उसका नाम है ‘इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस’, इस किताब को विश्व प्रसिद्द पुस्तक Tertium Organum’  के लेखक पी.डी ऑस्पेंसकी ने लिखा है| ऑस्पेंसकी ने जार्ज गुरजिएफ, जोकि पिछली सदी के सात सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे, के श्री चरणों में बैठ कर जो कुछ भी आत्मसात किया, उसे इस किताब में लिखा है| यह किताब इस अस्तित्व की तरफ से मनुष्य को दिया हुआ एक अनुपम भेंट है| पश्चिम में पैदा हुआ पहला उपनिषद है| अस्तित्व के तमाम रहस्यों की कुंची है| साधना पथ पर चल रहे साधकों के लिए पाथेय है| अस्तित्व के किसी अलौकिक लोक से उतरी आकाशसंहिता है|
सन 2014 के सितम्बर महीने में, बंबई में एक पब्लिकेशन हाउस में काम करते हुए, इस किताब को मैंने पीडीऍफ़ में पढ़ना शुरू किया था| 60 पेज पढ़ने के बाद, मैंने किताब को आगे नहीं पढ़ा| एक सच्चा रीडर किसी भी किताब का दस पेज पढ़ कर, यह समझ जाता है कि किताब को कहाँ, कब और कैसे पढ़ना चाहिए| किताब को पढ़ने के लिए जितनी पात्रता चाहिए, उस वक़्त उतनी पात्रता मुझ में नहीं थी| नवंबर में, मैंने नौकरी से अवकाश लिया और गुजरात के एक आश्रम में आकर रहने लगा| किताब पढ़ने के लिए जैसा माहौल और स्थान चाहिए था, वो मुझे आश्रम में मिल गया| प्रकृति का सानिध्य, मौन वातावरण, पक्षियों का अविरल कलरव, कहीं जाने और कुछ करने की आपाधापी से मुक्ति, यानि तनाव रहित जीवन, सब साज सही बैठ गया था| मैंने दूबारा किताब पढ़ना शुरू किया, लेकिन कुछ ही पृष्ट पढ़ने के बाद, मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि अभी भी कुछ कमी है| जल्दी ही समझ आ गया कि सही स्थान और माहौल के साथ-साथ, इस किताब को पढ़ने के लिए एक ख़ास प्रकार की भीतरी भाव दशा की भी ज़रूरत है|
एक साल के तवील इंतजार के बाद वो मुबारक घड़ी आई, जब मुझे लगा कि अब मैं सब तरह से इस किताब को पढ़ने के लिए तैयार हूँ| मैंने फिर से किताब पढ़ना शुरू किया| लेकिन आश्चर्य, इस बार फिर मुझे किसी अहम् चीज़ की कमी महसूस होने लगी| मैंने 10 पेज पढ़ कर फिर किताब पढ़ना बंद कर दिया| बहुत सिर खपाने के बाद भी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या चीज़ missing है|
11 दिन बाद 2 अक्टूबर को मेरा जन्म दिन था| आप यकीन नहीं करेंगे, उस दिन यह किताब मुझे मेरे एक बेहद अज़ीज़ मित्र ने गिफ्ट दिया| मेरे लिए यह बहुत ही हैरानी की बात थी| अपने अलावा मैंने यह बात किसी से नहीं बताई थी कि पिछले 13 महीने से मैं इस किताब को पढ़ने के लिए जद्दोजहद कर रहा हूँ| मैंने आज तक यह किसी को नहीं बाताया कि 'इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस' पढ़ने के लिए, मैं मुंबई से जॉब छोड़ कर गुजरात आश्रम में रहने आया था| पहली बार इस ब्लॉग पर यह सब शेयर कर रहा हूँ| शायद इससे पहले यह सब किसी को कहता भी, तो कोई नहीं समझता|  
गिफ्ट रैप हटा कर, जब मैंने किताब हाथ में लिया तो तक्षण एक बात बिजली की तरह मेरे भीतर कौंध गई| मुझे सब साफ़ हो गया कि सब कुछ ठीक होते हुए भी, क्या ठीक नहीं लग रहा था| इस किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप था| इस किताब क्या किसी भी किताब को पीडीऍफ़ में पढ़ना पाप है| एक ग्रंथ को पीडीऍफ़ में पढ़ने की भूल कैसे कर रहा था मैं? अपनी मुर्खता पर मुझे हंसी आने लगी| उस दिन के बाद से आज तक मैंने कोई भी किताब पीडीऍफ़ में नहीं पढ़ी, जो भी पढ़ना होता है, उसे अमेज़न, फ्लिप्कार्ट या फिर दूकान से खरीद कर लाता हूँ|

आधी किताब ख़त्म होते-होते, मुझे फिर कुछ गड़बड़ लगने लगी| इस बार भी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ भूल हो रही है| मैंने किताब पढ़ना बंद नहीं किया| दिन में 2-3 पेज ही सही, लेकिन पढ़ता ज़रूर था| इसी दौरान, मैंने एक प्रयोग करना शुरू किया| किताब को अलग-अलग जगह, और भिन्न-भिन्न भावदशा में पढ़ कर देखने लगा| कभी ट्रेन में सफर करते हुए, कभी किसी पेड़ के नीच बैठ कर, कभी खाने की टेबल पर, कभी एक हाथ में मोबाइल तो एक हाथ में किताब लेकर| लेकिन, हर बार निराशा ही हाथ लगती थी| सब तरह से कोशिश कर के देख लिया| हर तरह से निराशा ही हाथ लग रही थी| किताब किसी लज्जावान स्त्री की तरह अपने को मुझसे छिपा ले रही थी| जहाँ भी घूमने जाता था, मैं किताब को अपने साथ लेकर जाता था| बहुत सी जगहों पर, बहुत से लोगों के साथ, और बहुत से अलग-अलग मनोदशा में मैंने पढ़ कर देखा| कहीं कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली| जितना मैं किताब के रहस्य को खोलने की कोशिश करता था, उतना ही कछुये की तरह किताब ख़ुद को अपने में बंद कर लेती थी| अंत में निराश होकर मैंने पढ़ना बंद कर दिया| उम्मीद का आखरी तारा भी डूब गया था| 
लास्ट इयर, जब मैं ध्यान करने मनाली जा रहा था, तो किसी अज्ञात प्रेरणा से एक बार फिर से किताब को अपने साथ ले लिया| सोचा दिल्ली से मनाली जाते समय बस में बैठकर पढ़ने की कोशिश करूँगा| जैसे अज्ञेय पहाड़ो में बैठ कर लिखते थे, सोचा शायद उसी तरह पहाड़ों में पढ़ने से मेरी भी बात बन जाए| लेकिन, बस में बैठने के बाद एक बार भी किताब पढ़ने का मन नहीं हुआ| एक पन्ना कभी पलट कर नहीं देखा| खिड़की के किनारे बैठकर, जब तक रोशनी में बाहर देख सकता था, मैं दृश्यों में उलझा रहा| मनाली पहुँच कर भी, एक बार भी किताब का ध्यान नहीं आया|
ध्यान शिविर के तीसरे दिन, सुबह का ध्यान करने के बाद, जब सब लोग ध्यान हॉल से चले गये| तब पता नहीं किस अन्तः प्रेरणा से, मैं अपने कमरे, जो ध्यान हॉल के पास ही था, में गया, बैग से किताब निकाला, और उसे ले कर ध्यान हॉल में वापिस आ गया| सब लोग जा चुके थे| पूरे हॉल में गहन शांति पसरी हुई थी| हॉल के एक कोने में रखे कुशन की ढेर में से, मैंने तीन कुशन उठाया और हॉल के ठीक मध्य में आ कर बैठ गया| 
जहाँ मैं बैठा था वहां मेरे आगे, खिड़की की नीचे, ओशो की बड़ी सी तस्वीर रखी थी| उसी तस्वीर के नीचे बुद्ध की एक छोटी-सी प्रतिमा रखी हुई थी| सामने हिमाच्छादित हिमालय अपनी पूरी गरिमा में ध्यानस्त खड़ा था| सूरज की पहली किरण खिड़की के कांच से छन कर कमरे में आ रही थी| पूरे हॉल में मौन बर्फ की तरफ जमा हुआ था| धड़कन के साथ-साथ, मैं अपने रगों में दौड़ते लहू की आवाज़ को भी सुन सकता था| मैं थोड़ी देर तक पहाड़ो को देखता रहा, फिर पहाड़ो से नज़रे हटा कर ओशो की तस्वीर पर ले आया, दो तीन मिनट तक टकटकी लगा कर ओशो को देखते रहने के बाद, मैंने नज़रे नीचे की और बुद्ध को देखने लगा| तांबे की प्रतिमा सूरज की भांति चमक रही थी| थोड़ी-देर तक मेरी आँखे बुद्ध पर ही गड़ी रही| फिर अहिस्ता से नज़रें समेट कर, मैं अपनी दृष्टि को सामने पड़ी किताब पर ले आया| किताब पर बनी तस्वीर को एक मिनट तक देखता रहा| पहली बार किताब के मुख्य पृष्ट को मैं इतने गौर से देख रहा था| कई तस्वीरें बनी हुई थी| उन तस्वीरों को थोड़ी देर देखने के बाद ऐसा लगने लगा, जैसे तस्वीरें जिवंत हो उठी हों, और मुझसे कुछ कह रही हो| एक पल के लिए लगा कि एलिस की तरह मैं किसी रहस्य लोक में प्रवेश कर रहा हूँ| किताब को उठा कर नाक के पास ले आया और उसके पन्नो से आती खुशबू को सूंघने लगा| नासापुट एक मुधुर सुवास से भर गया| मैंने इससे पहले बहुत बार किताब को सुंघा था| किसी भी किताब को खरीदने के बाद मैं दो काम जरूर करता हूँ, एक किताब पर डेट लिख कर दस्तखत कर देना, और दूसरा उसको सूंघना| लेकिन ऐसी गंध मैंने पहले कभी नहीं सूंघी थी| थोड़ी देर तक सूंघने के बाद, किताब को आज्ञा-चक्र के पास ले गया| काफी देर से वहां खिचाव महसूस कर रहा था| फिर मैंने किताब को माथे से लगाया| यह सब प्रक्रिया अपने आप ही हो रही थी| कुछ भी सोच विचार कर नहीं कर था| माथे से लगाने के बाद, मैंने किताब को बीच से खोला और जो पृष्ट सामने आ गया उसे पढ़ने लगा| 10 मिनट बाद, ना वहां कोई पढ़ने वाला था, ना ही किताब थी|
इस किताब के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है| क्योंकि इसको आप ऐसे ही नहीं पढ़ सकते हैं| जैसे आम किताब को हम कहीं भी, टीवी देखते हुए, बात करते हुए, खाना खाते हुए, टॉयलेट में, मोबाइल चालू रख कर, कैसे भी पढ़ लेते हैं, वैसे आप इसको नहीं पढ़ सकते हैं| पहली तो मुसीबत सही जगह, सही समय, और सही माहौल की है| यह सब अगर आपने जुटा भी लिया तो, फिर आपको अपने भीतर सही भाव दशा पैदा करनी होगी| जब तक हृदय अहोभाव से भरा ना हो, आप इसे आत्मसात नहीं कर सकते हैं| यदि आप इसे प्राथनापूर्ण हृदय से नहीं पढ़ते हैं, तो कुछ भी आपको समझ नहीं आएगा| यह किताब स्त्री जैसी है, अगर स्त्री के आत्मा से सम्बन्ध बनना हो, उसे पूरा पाना हो, तो आपको बहुत ही प्रेमपूर्वक उसके पास जाना होगा| जबरदस्ती करके आप सिर्फ उसकी देह को पा सकते हैं, उसकी आत्मा को नहीं| अगर आपने जरा भी अधर्य दिखाया, जरा भी जल्दी की, तो आप इस किताब से चूक जाएंगे|
दो ही लोग इस कताब को पढ़ने के पात्र हैं, एक वे जिनका, किसी करणवश, मृत्यु-बोध सघन हो गया है| जिन्होंने मृत्यु की सार्थकता और जीवन की निरर्थकता को समझ लिया हो| और दूसरे वे जो जीवन से पूरी तरह से निराश हो गए हैं| असफलता के बाद वाली निराशा नहीं, उस निराशा से कुछ नहीं होगा| सफलता की व्यर्थता को समझ लेने के बाद जो निराशा पकड़ती है, उस निराशा के क्षण में यदि कोई इस किताब को पढ़े तो बात बन सकती है| अन्यथा, आप बस पृष्ट पलट सकते हैं| मिलेगा कुछ भी नहीं|   

किताब से कोई भी बात या कोई उद्धरण मैं यहाँ शेयर नहीं करूँगा| ना ही किताब में क्या लिखा है, इसके ही संबंध में आपसे कुछ कहूँगा| किताब के शब्दों में कुछ भी नहीं, सारे शब्द थोथे होते हैं| शब्द का अपना कोई अर्थ नहीं होता है, अर्थ हम देते हैं| यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वो सब शब्द भले ही मेरे हैं, लेकिन उनका जो अर्थ आप देंगे, उस पर मेरा कोई वश नहीं है| इसीलिए शब्दों को आँखों के आगे से गुज़ार लेने में कोई सार नहीं है| किताब को ग्रहण करने के लिए आपको तैयारी करनी होगी| अमेज़न पर किताब का नाम सर्च करना, फिर एक हजार के क़रीब दाम देख कर चौंकना, फिर झिझकते हुए आर्डर देना, फिर बेसब्री से किताब के आने का इंतजर करना, फिर पैकेट खोल कर उसे ऐसे देखना जैसे कोई प्रेमी अपनी बिछड़ी हुई प्रेमिका को देखता है, फिर उसके पृष्ठों को पलटना, फिर सफहों को पलटते हुए उसे सूंघना, फिर समय निकाल कर उसे पढ़ना| यह सब तैयारी का हिस्सा है| इसमें अगर आपने कहीं भी जल्दबाजी दिखाई, तो फिर आप किताब से कुछ भी नहीं पाएँगे| किताब पढ़ना एक प्रकार की साधना है| जैसे आप मंदिर में नाहा-धोकर प्राथना करने जाते हैं, वैसे ही और उतनी ही पवित्रता से अगर आप इस किताब के पास नहीं जाते हैं, तो आप इस किताब को कहीं से भी नहीं समझ पाएंगे|  

-इक्क्यु केंशो तजु

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...