Tuesday, 4 July 2017

भावुकता भोंदूपन है





मेरा एक दोस्त शाम मुझसे पूछ रहा था कि ऐसा क्या दुःख था ग़ालिब के जीवन में कि वे ऐसे गहरे-गहरे शेर लिखते थे? मैंने कहा कि दुःख तो ग़ालिब के जीवन में उतना ही था, जितना हमारे और आपके जीवन में है। हो सकता है, हमसे कम ही दुःख रहा हो उनके जीवन में। लेकिन कुछ था, उनके पास जो हमारे और आपके पास नहीं है, और वह है दुःख को अनुभव करने की क्षमता। आश्चर्य की बात है कि हम में से बहुत कम लोगों के पास ही अनुभूति की क्षमता होती है।
                                                                          

चित्र- साभार गूगल 
आपने कभी सोचा कि ऐसा क्या था कि बुद्ध ने एक मरे हुए व्यक्ति को देखा, और सब छोड़कर जंगल चले गए, और हम रोज़ ही लोगों को मरते देखते हैं, फिर भी जीवन को वैसे ही जिए चले जाते हैं? हम सोच सकते हैं कि हम भी दुःख का अनुभव करते हैं। क्योंकि जब कोई मर जाता है तो हम रोते हैं, किसी को मुसीबत में देखकर उस व्यक्ति पर दया करते हैं। और तो और हम तो इतने भावुक हैं कि फिल्म में भी, जोकि झूठ है, अगर हीरो मर जाता है, हम रुमाल गीली कर लेते हैं। तो फिर प्रश्न उठता है 'हम में और चचा ग़ालिब या भगवान बुद्ध में क्या भेद हैं? बड़ा भेद हैं, भगवान बुद्ध या ग़ालिब संवेदनाशील व्यक्ति थे. और हम भावुक जीव है. 
भावुकता भोंदूपन है। अगर आप गौर करें, तो आप पाएँगे कि बिना किसी अपवाद के हर भावुक व्यक्ति मंदबुद्धि होता है। ऐसा क्यों? क्योंकि भावुक होना एक यांत्रिक घटना है। भावना बेहोशी से पैदा है।अगर ऐसा नहीं होता तो फिर आप फिल्म देखते समय या फिर उपन्यास पढ़ते हुए रोते नहीं।
यह जानते हुए कि फिल्म में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह वास्तविक नहीं है, आप रोते हैं। इससे यह साफ़ होता है कि आपके रोने का बोध से या फिर होश से कोई सम्बन्ध नहीं है।जैसे हम चाहकर भी अपने विचारों को नहीं रोक सकते हैं, उसी प्रकार ख़ास स्थितियों में हम भावनाओं को बहने से नहीं रोक सकते हैं। किसी के मरने पर जब आप रोते हैं, तो ज़रूरी नहीं है कि आप उस व्यक्ति के लिए रो रहे हों, बहुत संभावना है कि और लोगों को रोता देख कर आप भी रोने लगे हों। 

Sunday, 2 July 2017

हंसी और जम्हाई का राज़


आपने कभी सोचा कि हम जम्हाई क्यों लेते हैं, और क्या आप जानते हैं कि हंसने का क्या प्रयोजन है? 

हँसना और जम्हाई लेना बहुत गहरे में एक दूसरे से सम्बंधित है। योग के अनुसार हमारे शरीर में सात चक्र हैं, और हर चक्र की अपनी उपयोगिता है और विशेषता है, लेकिन यहाँ हम चक्रों से नहीं उलझेंगे। 

चित्र-साभार गूगल 
हम हंसी और जम्हाई की बात कर रहे थे, अगर आप विज्ञान से जम्हाई और हंसी के बारे में पूछेंगे तो उनके पास कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है। एक योगी के सिवाय और कोई भी आपको हंसी और जम्हाई का राज़ नहीं बता सकता है। 
जम्हाई एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा आप अपने एक चक्र से दूसरे चक्र तक उर्जा को पहुंचाते है। मतलब ज्यादा उर्जा वाले चक्र से आप कम उर्जा वाले चक्र को जम्हाई के द्वारा उर्जा देते हैं। 
और हंसी के द्वारा आप चक्रों पर जरूरत से ज्यादा संग्रहित उर्जा को बाहर फेंकते हैं। अगर ज्यादा उर्जा संग्रहित हो जाए, और उसे हंसी के द्वारा बाहर न फेका जाए, तो वह उर्जा नकारात्मक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है और आप अवसाद में चले जाते हैं। क्योंकि गति उर्जा का स्वाभाव है, आप उसे एक अवस्था में नहीं रोक सकते हैं। 
इसका मतलब यह हुआ कि आप न हंसने के कारण दुखी हो जाते हैं। साधारणतया हमें लगता है कि लोग दुखी हैं, इसीलिए नहीं हँसते हैं, लेकिन हकीकत कुछ उल्टा ही है, 'न हंसने के कारण लोग दुखी हैं'। 
हमारे 90% बीमारी और मानसिक रोग का कारण हमारे जिंदगी से हंसी का गायब हो जाना है। 
हंसने को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाइए, और गंभीरता का त्याग कीजिए। अपने उर्जा का विधायक उपयोग कीजिए। गंभीरता एक रोग, सिवाय मनुष्य के पूरे अस्तित्व में और कोई गंभीर नहीं है। गंभीर होने की मूढ़ता सिर्फ तथाकथित समझदार लोगों में पाई जाती है। ऐसी समझदारी का क्या लाभ जिससे जीवन में मनहूसियत आती हो?

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...