इतने वर्षों बाद फिर से ब्लॉग पर लौट कर आना किसी चमत्कार-सा लग रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भूल ही गया था कि मेरा कोई ब्लॉग भी है। हालाँकि कभी-कभी कभी मेरे पाठक में से कोई मुझे यह याद दिला देते थे कि आपके बारे में फ़लाँ बात मैंने आपके ब्लॉग 'तब्सिरा' पर पढ़ी थी, तब घुप अंधेरे में अचानक से चमकी बिजुरी की तरह भक से मुझे याद आती थी कि हाँ कभी ब्लॉग लिखा करता था, लेकिन वह याद ज़ेहन में इतनी देर तक कभी नहीं टिक सकी कि घर लौटकर ब्लॉग की टोह लूँ।
लेकिन, पता नहीं कैसे पिछले कुछ दिनों से मुझे अपने इस आभासी दुनिया में बने घर की याद बार-बार आ जाती थी। पिछले दिनों बोधिसत्व वाचस्पति मिलने आए थे, एक दिन बात-चीत के दौरान उन्होंने जब कहा कि वे मेरे किताबों पर लिखे लेखों को ब्लॉग पर पढ़े थे, तो यह बात मेरे भीतर कहीं अटक गई। बीते कुछ महीनों से मेरे भीतर Facebook के किसी विकल्प की खोज चल रही थी। मैत्रेयी से मैंने एक बार कहा भी था कि अपने वेबसाइट www.satiyoga.in पर कुछ ऐसा कर दो कि मुझे जब मन आए कुछ लिख कर पोस्ट कर सकूँ। लेकिन तब भी मुझे अपने ब्लॉग की याद नहीं आयी।
हमारे यहाँ एक कहावत है 'घर में छोरा, नगर में ढिंढोरा', यही हाल था मेरा, नाक पर चश्मा था और मैं इसे सब जगह ढूँढ रहा था। Facebook बहुत तेज़ है, दिन-प्रति-दिन उसकी रफ़्तार बढ़ती जा रही है। वहाँ लिखना अब किसी रेस में दौड़ने जैसा हो गया है, हालाँकि रेस में एक मंज़िल होती है जहां पहुँच कर आप ठहर जाते हैं, लेकिन Facebook पर आपके पास ठहरने का विकल्प नहीं है। वहाँ आपको रोज़ लिखना है, एक पैटर्न को फ़ॉलो करना है। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो फ़ेसबुक का AI आपको मृत मान लेता है। अगर आप अपनी रफ़्तार से चलना चाहते हैं, तो फ़ेसबुक के पास ऐसी कोई सड़क नहीं है जिस पर आप टहल सकते हैं, वहाँ आपको सिर्फ़ दौड़ने, और दौड़ते रहने की आज़ादी है। अगर आप कुछ भी नया या अलग करते हैं, तो AI आपकी रीच को कम कर देता है, आपके पाठकों को आपसे दूर कर देता है। न सिर्फ़ आपके पाठकों को आपसे दूर करता है बल्कि इसकी पूरी कोशिश करता है कि आपके पाठक आपको पूरी तरह से भूल जाएँ।
इसीलिए, पहले जब कोई फ़ेसबुक पर लिखना कम कर देता था, तो उसके पाठक उसकी खोज ख़बर लेते थे, उसके पोस्ट की प्रतीक्षा करते थे, अगर प्रत्याशा से अधिक समय तक कोई ख़ैर-ओ-ख़राब नहीं मिलती थी, तो उसके पेज पर जाकर उसे संदेश भेजते थे। लेकिन अब ऐसा बहुत कम होता है। जिस चीज़ की खोज में आप फ़ेसबुक पर जाते हैं, अगर वह आपको नहीं मिला, तो फ़ेसबुक इसकी पूरी कोशिश करता है कि आपको निराश न लौटने दे, वह आपको कुछ न कुछ दिखा कर एंटरटेन ज़रूर करेगा, कुछ नहीं तो कोई ट्रेंडिंग रील दिखा देगा, उससे भी बात नहीं बने तो आप के सामने कोई सेमी अश्लील कंटेंट परोस देगा।
पहले अगर किसी लेखक का पाठक कम होता था तो उसके पीछे का कारण होता था पाठकों को कुछ उससे बेहतर पढ़ने के लिए मिल जाना, लेकिन अब मामला बिल्कुल अलग है। लेखकों की लड़ाई अब अच्छे कंटेंट से नहीं है, बल्कि उस कचरा से है जो फ़ैकबुक परोसता है। यही कारण है कि लेख पढ़कर कमेंट या लाइक करने वालों की संख्या दिन ब दिन घटती जा रही है, लोग बिना पढ़े ही पोस्ट लाइक कर देते हैं, बिना पूरा लेख पढ़े ही कमेंट कर देते हैं। लोगों का मन अब इतना थिर नहीं है कि वे किसी भी चीज़ को कुछ देर ठहर कर पढ़ सकें, और उस पर मनन कर सकें। इसलिए, लेखक लोग आज कल कुछ सार्थक कहने के लिए लिखने के बजाय फ़ेसबुक के AI की नज़र में बने के लिए कुछ भी अंटशंट पोस्ट करते रहते हैं। लो आईक्यू वाले पाठकों का मनोरंजन करने के लिए पहले भी खूब पोस्ट और किताबें लिखी जाती थी, लेकिन AI को एंटरटेन के लिए लिखना तो इंतहा है।
किसी लेखक का जब आप ब्लॉग ढूँढ कर पढ़ते हैं, या फिर उसकी किताब पढ़ते हैं, तो उसकी बातों का आपके मन जो प्रभाव बनता है, वह बहुत दूरगामी होता है। फ़ेसबुक पर लिखे पोस्ट को पढ़कर आप किसी से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करें, इसकी बहुत कम संभावना होती है। फ़ेसबुक पोस्ट को प्रमोट करता है, उसके लेखक को नहीं है। उसके लिए किसी पोस्ट की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उस पर कितने लाइक और कमेंट आए हैं। और यह किसी पोस्ट की गुणवत्ता को तय करने का सबसे घटिया तरीक़ा है। मनुष्य का मन ऐसा है कि वह नकारात्मक, वाहियात और अश्लील चीज़ों को अधिक तवज्जो देता है, तो क्या यही सब चीज़ें सर्वश्रेष्ठ हैं?
यह विषय बहुत गंभीर है। इस पर और भी बहुत कुछ लिखना अभी बाँकी है। आज बस आपको इतना कहना है कि ब्लॉग के नाम को 'तब्सिरा' से बदल कर 'औराक़-ए-परेशाँ' कर दिया है, थीम में भी थोड़ा हेरफेर किया है। इतने वर्षों बाद भूल भी गया हूँ कि कैसे क्या करना होता है। लेकिन उम्मीद है कि अब यहाँ निरंतर लिखता रहूँगा।
-इक्क्यु त्ज़ु