Sunday, 18 August 2024

जा जा रे अपने मंदिरवा



दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ का एल्बम है 'The sounds of India', रवि शंकर अभी भारतीय संगीत के बारे में मोटी-मोटी बातें बता रहे हैं। डोलते हुए पर्दे के ओट से लुकछिप करती हुई धूप मेरे टेबल पर कभी आती है, कभी छिप जाती है। आज थोड़ी अभी नींद आ रही है। इन दिनों बेड रूम में घड़ी ले जाना भी बंद कर दिया है, इसलिए सुबह बिना समय देखे ही जब ही आँखें खुल जाए बिस्तर छोड़ देता हूँ। आज पौने पाँच में ही उठ गया था। इसीलिए अभी आँखें थोड़ी बोझिल है।

संगीत, धूप, फ़िल्टर कॉफ़ी, खिड़की के बाहर की हरियाली, और सामने खुला ब्लॉग का राइटिंग विंडो, तैयारी तो पूरी है, लेकिन लिखूँगा क्या? अल्लाह जानता है। आह!! क्या बजा रहे हैं रवि शंकर! अभी दूसरा ट्रैक बज रहा है 'Maru Bihag',  ११ मिनट का यह धुन एकदम ताज़ा कर देती है आपको। नेक्स्ट भीमपालसी है, मेरा सबसे पसंदीदा राग। जयातीर्थ मेवुंडी का जा जा रे अपने मंदिरवा कोई सौ बार सुना होगा, आज सुबह भी योग के बाद सुना था, I can never get enough of this raag. अगर आपने नहीं सुना है तो एकबार यूट्यूब पर ज़रूर सुनिए। सुनिए ही। आपके आसपास की हवा बदल जाएगी। 

ओ-हो!! रवि शंकर जान लिए जाते हैं, आह! क्या लिखूँ, आँखें खुल ही नहीं रही है, बंद आँखों से टाइप कर रहा हूँ। ल्लिलाह!!! 

बड़े दिनों बाद आज कव्वे की आवाज़ सुन रहा हूँ। इधर मेहसाणा में कव्वे बहुत नहीं दिखते हैं। सिंधी भैरवी बजा रहे हैं रवि शंकर। यह अंतिम ट्रैक है। भीमपालसी के बाद से मेरा दिमाग़ रुक-सा गया है। अब यह नशा दो तीन दिन तक नहीं उतरेगा। भगवान से एक शेर सुना था, 

                            "सज़ा का हाल सुनाएँ जज़ा की बात करें

ख़ुदा मिला हो जिन्हें वो ख़ुदा की बात करें"

यही हाल आज अपना है। संगीत के अलावा आज किसी और चीज़ की बात नहीं हो पाएगी। कोशिश भी कर रहा हूँ तो सिर को झूमने से नहीं रोक पा रहा हूँ। क्या उठान है, वाह! आनंद! यह पंद्रह मिनट कट जाए किसी तरह, बच गया तो जीवन बहुत बड़ी है। हो'अ.... ख़त्म हुआ। मरते-मरते बचा हूँ। 

अब आज कुछ और नहीं हो सकता है। लैपटॉप बंद कर रहा हूँ। मेरा अनार के नीचे बैठने का समय हो गया है। आज का संगीत सत्र यहीं पूरा होता है। 
- इक्क्यु त्ज़ु 


Saturday, 17 August 2024

आँगन में छावँ उतर आया है


 चित्र-साभार गूगल 

दोपहर के तीन बज रहे हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ कुछ लिखने बैठ हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रफ़ी साहब और आशा जी गा रहे हैं 'इशारों-इशारों में दिल लेने वाले...' 

यह गीत मुझे बहुत पसंद है। बाहर से गिलहरी के किकियाने की आवाज़ आ रही है।ऐसी आवाज़ सुनकर कई बार ऐसा धोखा हो जाता है कि कोई पक्षी है। बाहर की धूप रोकने के लिए खिड़की पर पर्दा लगा रखा है, रोज़ इस समय कमरे में धूप आने लगती है। हर बार पर्दा हटा कर आवाज़ की दिशा में देखता हूँ कि कौन सी चिड़िया हैं, कहीं कुछ नहीं दिखता है, बस सहजन के पेड़ पर उछल-कूद करती खिसकोली दिख जाती। अभी कुछ दिन पहले वाचस्पति से कह रहा था, "गुजराती में आप लोगों ने एकदम सटीक नाम दिया है इसको 'खिसकोली', हमारे यहाँ भी इसके स्वभाव से मिलता-जुलता ही नाम है 'लुक्खी', पता नहीं हिन्दी में 'गिलहरी' क्यों कहते हैं।" लुक्खी से बचपन का एक क़िस्सा याद आ गया। मेरे एक फूफेरे भाई की दादी का नाम लुक्खी था, बड़का बाबा (बड़े दादा जी) उसको चिढ़ाया करते थे, "लुक्खी-लुक्खी तार पर, कूदे भतार (पति) पर", वह बहुत चिढ़ता था, हम हँसा करते थे। 

दूध वाली कॉफ़ी पीना एक अरसे से बंद कर दिया था, लेकिन 8AM Metro देखने के बाद फ़िल्टर कॉफ़ी पीने का भूत चढ़ गया। रिसर्च करके आमेजन से एक फ़िल्टर कॉफ़ी मेकर मँगवाया। इस बार निर्वाणों एडिंबरा से Lavazza Coffee लेकर आयी थी, जिसका कुछ दिनों से फ़्रेंच प्रेस बना कर पी रहा था, अब उसी का फ़िल्टर कॉफ़ी बनाता हूँ। फ़्रेंच प्रेस का प्रोसेस काफ़ी छोटा था, पाँच-से-सात मिनट में कॉफ़ी बनकर तैयार हो जाती थी, इंस्टेंट कॉफ़ी के बनिस्बत अच्छा था, लेकिन फ़िल्टर कॉफ़ी मुझे उससे भी ज़्यादा सही लग रहा है। एक कप कॉफ़ी तैयार करने में कोई तीस मिनट लग जाते हैं। जिस चीज़ को पीने में कम-अज-कम एक घंटे लगाता हूँ, उसको बनने में तीस मिनट तो लगना ही चाहिए।   

गाना बदल चुका है, "दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छाई..." कॉफ़ी आधी बची हुई है अभी। बीच में लिखना रोकर अमज़ेन पर ब्रास का फ़िल्टर कॉफ़ी मेकर और ब्रास का ही डबरा (कप और कटोरी जिसमें दक्षिण भारत के लोग फ़िल्टर कॉफी पीते हैं) देखने लगा था। कुछ समझ नहीं आया, लोगों के मिक्स्ड रिव्यू थे। लगता है कभी दक्षिण भारत जाना होगा तभी ले पाऊँगा। अजमेर में झील किनारे एक कॉफ़ी शॉप है 'बुडान अंकल', यह अजीब सा नाम सुनकर कई बार ज़ेहन में सवाल उठता था कि इस अजीब से नाम का क्या अर्थ है? इन दिनों जब साउथ इंडियन कॉफ़ी पर रिसर्च कर रहा था तो पता चला कि बाबा बुडान एक सूफ़ी फ़क़ीर थे, जो पहली बार अरब के देशों से कॉफ़ी का बीज भारत लेकर आए थे। अरब के लोग कॉफ़ी को अपने देश से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे, इसलिए वे भूना हुआ कॉफ़ी ही एक्सपोर्ट करते थे। कहानी कहती है कि बाबा बुडान अपनी लंबी दाढ़ी में बीज छुपा कर लाए थे। क्या बात है चाय का संबंध बौद्ध फ़क़ीर बोधिधर्म से है, तो कॉफ़ी का सूफ़ी फ़क़ीर बाबा बुडान से! 


चार बजने को हैं। मेरी कॉफ़ी ऑलमोस्ट ख़त्म हो चुकी है। आशा जी गा रही हैं, "बालमा खुली हवा में दिल चाहता है मिलना..." आँगन में छावँ उतर आया है। लैपटॉप बंद कर के अनार के नीचे बैठने जा रहा हूँ। कुछ पढ़ूँगा अभी। कुछ दिन पहले बोधिसत्व गार्गी एक किताब भेजी थी 'दास्तान-ए-लापता' इन दिनों वही पढ़ रहा हूँ।

-इक्क्यु त्ज़ु  



Friday, 16 August 2024

लौट कर आना



इतने वर्षों बाद फिर से ब्लॉग पर लौट कर आना किसी चमत्कार-सा लग रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भूल ही गया था कि मेरा कोई ब्लॉग भी है। हालाँकि कभी-कभी कभी मेरे पाठक में से कोई मुझे यह याद दिला देते थे कि आपके बारे में फ़लाँ बात मैंने आपके ब्लॉग 'तब्सिरा' पर पढ़ी थी, तब घुप अंधेरे में अचानक से चमकी बिजुरी की तरह भक से मुझे याद आती थी कि हाँ कभी ब्लॉग लिखा करता था, लेकिन वह याद ज़ेहन में इतनी देर तक कभी नहीं टिक सकी कि घर लौटकर ब्लॉग की टोह लूँ। 

लेकिन, पता नहीं कैसे पिछले कुछ दिनों से मुझे अपने इस आभासी दुनिया में बने घर की याद बार-बार आ जाती थी। पिछले दिनों बोधिसत्व वाचस्पति मिलने आए थे, एक दिन बात-चीत के दौरान उन्होंने जब कहा कि वे मेरे किताबों पर लिखे लेखों को ब्लॉग पर पढ़े थे, तो यह बात मेरे भीतर कहीं अटक गई। बीते कुछ महीनों से मेरे भीतर Facebook के किसी विकल्प की खोज चल रही थी। मैत्रेयी से मैंने एक बार कहा भी था कि अपने वेबसाइट www.satiyoga.in पर कुछ ऐसा कर दो कि मुझे जब मन आए कुछ लिख कर पोस्ट कर सकूँ। लेकिन तब भी मुझे अपने ब्लॉग की याद नहीं आयी। 

हमारे यहाँ एक कहावत है 'घर में छोरा, नगर में ढिंढोरा', यही हाल था मेरा, नाक पर चश्मा था और मैं इसे सब जगह ढूँढ रहा था। Facebook बहुत तेज़ है, दिन-प्रति-दिन उसकी रफ़्तार बढ़ती जा रही है। वहाँ लिखना अब किसी रेस में दौड़ने जैसा हो गया है, हालाँकि रेस में एक मंज़िल होती है जहां पहुँच कर आप ठहर जाते हैं, लेकिन Facebook पर आपके पास ठहरने का विकल्प नहीं है। वहाँ आपको रोज़ लिखना है, एक पैटर्न को फ़ॉलो करना है। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो फ़ेसबुक का AI आपको मृत मान लेता है। अगर आप अपनी रफ़्तार से चलना चाहते हैं, तो फ़ेसबुक के पास ऐसी कोई सड़क नहीं है जिस पर आप टहल सकते हैं, वहाँ आपको सिर्फ़ दौड़ने, और दौड़ते रहने की आज़ादी है। अगर आप कुछ भी नया या अलग करते हैं, तो AI आपकी रीच को कम कर देता है, आपके पाठकों को आपसे दूर कर देता है। न सिर्फ़ आपके पाठकों को आपसे दूर करता है बल्कि इसकी पूरी कोशिश करता है कि आपके पाठक आपको पूरी तरह से भूल जाएँ। 

इसीलिए, पहले जब कोई फ़ेसबुक पर लिखना कम कर देता था, तो उसके पाठक उसकी खोज ख़बर लेते थे, उसके पोस्ट की प्रतीक्षा करते थे, अगर प्रत्याशा से अधिक समय तक कोई ख़ैर-ओ-ख़राब नहीं मिलती थी, तो उसके पेज पर जाकर उसे संदेश भेजते थे। लेकिन अब ऐसा बहुत कम होता है। जिस चीज़ की खोज में आप फ़ेसबुक पर जाते हैं, अगर वह आपको नहीं मिला, तो फ़ेसबुक इसकी पूरी कोशिश करता है कि आपको निराश न लौटने दे, वह आपको कुछ न कुछ दिखा कर एंटरटेन ज़रूर करेगा, कुछ नहीं तो कोई ट्रेंडिंग रील दिखा देगा, उससे भी बात नहीं बने तो आप के सामने कोई सेमी अश्लील कंटेंट परोस देगा। 

पहले अगर किसी लेखक का पाठक कम होता था तो उसके पीछे का कारण होता था पाठकों को कुछ उससे बेहतर पढ़ने के लिए मिल जाना, लेकिन अब मामला बिल्कुल अलग है। लेखकों की लड़ाई अब अच्छे कंटेंट से नहीं है, बल्कि उस कचरा से है जो फ़ैकबुक परोसता है। यही कारण है कि लेख पढ़कर कमेंट या लाइक करने वालों की संख्या दिन ब दिन घटती जा रही है, लोग बिना पढ़े ही पोस्ट लाइक कर देते हैं, बिना पूरा लेख पढ़े ही कमेंट कर देते हैं। लोगों का मन अब इतना थिर नहीं है कि वे किसी भी चीज़ को कुछ देर ठहर कर पढ़ सकें, और उस पर मनन कर सकें। इसलिए, लेखक लोग आज कल कुछ सार्थक कहने के लिए लिखने के बजाय फ़ेसबुक के AI की नज़र में बने के लिए कुछ भी अंटशंट पोस्ट करते रहते हैं। लो आईक्यू वाले पाठकों का मनोरंजन करने के लिए पहले भी खूब पोस्ट और किताबें लिखी जाती थी, लेकिन AI को एंटरटेन के लिए लिखना तो इंतहा है। 

किसी लेखक का जब आप ब्लॉग ढूँढ कर पढ़ते हैं, या फिर उसकी किताब पढ़ते हैं, तो उसकी बातों का आपके मन जो प्रभाव बनता है, वह बहुत दूरगामी होता है। फ़ेसबुक पर लिखे पोस्ट को पढ़कर आप किसी से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करें, इसकी बहुत कम संभावना होती है। फ़ेसबुक पोस्ट को प्रमोट करता है, उसके लेखक को नहीं है। उसके लिए किसी पोस्ट की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उस पर कितने लाइक और कमेंट आए हैं। और यह किसी पोस्ट की गुणवत्ता को तय करने का सबसे घटिया तरीक़ा है। मनुष्य का मन ऐसा है कि वह नकारात्मक, वाहियात और अश्लील चीज़ों को अधिक तवज्जो  देता है, तो क्या यही सब चीज़ें सर्वश्रेष्ठ हैं? 

यह विषय बहुत गंभीर है। इस पर और भी बहुत कुछ लिखना अभी बाँकी है। आज बस आपको इतना कहना है कि ब्लॉग के नाम को 'तब्सिरा' से बदल कर 'औराक़-ए-परेशाँ' कर दिया है, थीम में भी थोड़ा हेरफेर किया है। इतने वर्षों बाद भूल भी गया हूँ कि कैसे क्या करना होता है। लेकिन उम्मीद है कि अब यहाँ निरंतर लिखता रहूँगा। 
-इक्क्यु त्ज़ु

 

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...