समय- 6:26 (सुबह), मंगलवार २४ फ़रवरी, कोलकाता
हम अभी जहाँ बैठे हैं, वहाँ से दो मिनट की walk पर तारा मंडल है। मेरे बाईं ओर एक गगनचुंबी इमारत बादलों के बोसे ले रहा है। दिव्या अपने योग-चटाई पर अष्टांग-योग के आसनों का अभ्यास कर रही है। पार्क almost ख़ाली है, हमसे काफ़ी दूर कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। पास में ही अशोक का एक विशाल पेड़ है, जिससे चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही है। मेरे दाईं ओर मुख्य सड़क को पार कर के एक पूरना चर्च है, उसकी चार मीनारों को यहाँ से मैं देख पा रहा हूँ।
सुबह तीन बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी ट्रेन चितपूर स्टेशन (उर्फ़ कोलकाता स्टेशन) पहुँच गयी थी। सवा पाँच बजे तक हम वहीं वेटिंग रूम में बैठे थे। पौ फटने के बाद बस पकड़ कर पहले हम श्याम बाज़ार आए, फिर वहाँ से दूसरी बस पकड़ कर विक्टोरिया। अभी पर्क में आने से पहले हमने गन्ने का जूस पीया।
सुबह तीन बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी ट्रेन चितपूर स्टेशन (उर्फ़ कोलकाता स्टेशन) पहुँच गयी थी। सवा पाँच बजे तक हम वहीं वेटिंग रूम में बैठे थे। पौ फटने के बाद बस पकड़ कर पहले हम श्याम बाज़ार आए, फिर वहाँ से दूसरी बस पकड़ कर विक्टोरिया। अभी पर्क में आने से पहले हमने गन्ने का जूस पीया।
Airbnb से जो रूम हमने बूक किया है, उसका चेक इनटाइम ११ बजे हैं। अभी हमारे पास पर्याप्त समय है। दिव्या अपने योग-रूटीन को निर्बाध रखना चाहती थी, इसीलिए उसे यहाँ, विक्टोरिया के सामने वाले पार्क में लेकर आया हूँ। दिव्या जब योगाभ्यास समाप्त कर लेगी, तब हम टहल कर शहर की सुबह का आनंद लेंगे।
योग करने के बाद हम एक बार फिर से गन्ने वाले के यहाँ गए। इस बार हमने दो छोटा ग्लास लिया। मूँह में गन्ने की मिठास लिए हम विक्टोरिया मेमोरियल के मुख्य द्वार तक टहलते हुए आए। द्वार के सामने खड़े अरविन्दो की आदमक़द प्रतिमा को मैंने दूर से ही पहचान लिया...हालाँकि पहली नज़र में मुझे लगा कि रविंद्रनाथ हैं, लेकिन फिर दाढ़ी की लम्बाई से लगा कि ये अरविंद ही हैं। पहली बार संभवतः २०१० में जब कोलकाता आया था, तब इस मूर्ति पर इतना ग़ौर नहीं किया था...क्या पता किया भी हो, लेकिन अब कुछ याद नहीं...!
मुख्यद्वार के सामने ही पैदलमार्ग में एक बुजुर्ग अमरूद और कुछ अजनबी फल बेच रहे थे। दिव्या की ज़िद्द पर मैंने 50 रुपये में दो अमरूद और एक लाल रंग का अजनबी फल, जिसका नाम उन्होंने जामुन बताया, ख़रीदा... जामुन का ऐसा अनोखा रंग और विलायती रूप मैंने पहले कहीं नहीं देखा था। फल का स्वाद कुछ-कुछ सेब जैसा था।
अमरूद वाले के पास ही लगे लकड़ी के बैंच पर बैठ कर हम विक्टोरिया के महल को देखने लगे। तभी आचानक वृष्टि शुरू हो गयी...। “ओह-ओ बारिश से स्वागत हुआ है हमारा”, दिव्या बोली।
आठ बजे call करके रूम मालकिन ने हमें बता कि हम अपने समय से पहले भी आ सकते हैं...! यह हमारे लिए अच्छी ख़बर थी, विक्टोरिया के खुलने में अभी दो घंटा बाँकी था। उनके call के बाद हमने तुरंत उबर बूक किया, और कोई २० मिनट की यात्रा के बाद अपने निवास स्थान पर पहुँच गए।
अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं वह एक रेसीडेंटल एरिया है..। Corporation बैंक के सामने एक चार मंज़िला मकान है। बिल्डिंग में लिफ़्ट नहीं। चौथी मंज़िल पर सफ़ेद गेट वाले घर में अभी हम ठहरे हुए हैं..। दिव्या अभी किचन में में coffee बना रही है, वहाँ से मुझे नहाने के लिए आवाज़ दे रही है..इसीलिए बाँकी कहानी बाद में...
हम जादवपूर में जहाँ रह रहे हैं, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर बस स्टेंड है। स्नान-ध्यान के बाद हम बस लेकर विक्टोरिया पहुँचे। विक्टोरिया पहुँचने से पहले हमने थोड़ा समय रविंद्र सदन में बिताया। वहीं bookshop के सामने बने फ़ूडकोर्ट से कुछ स्थानीय व्यंजन लेकर खाया।
खाने के बाद हम आर्ट गैलरी गए...वहाँ जाने के बाद हमने पता चला कि गैलरी २ बजे ओपन होता है। हम निराश होकर विक्टोरिया की तरफ़ चल पड़े। विक्टोरिया पहुँच कर हमने टिकट लिया और अंदर गए। अंदर जाने के बाद पता चला कि सोमवार को महल बंद होता है। निराश होकर हम पोखर किनारे बैठ गए...पोखर बहुत ही सुंदर था, किनारे लगे फूलों को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया। हमारे पास के पेड़ों के नीचे बैठे प्रेमी युगल खुलेआम एक दूसरे के अधरों को चूम रहे थे...प्रेम का ऐसा खुला प्रदर्शन देखकर मैं थोड़ा हैरान भी हुआ। खैर, विक्टोरिया के पार्क में थोड़ी देर बैठने के बाद हम फिर से रविंद्र सदन आ गए...
इस बार बमुश्किल हम आर्ट गैलरी ढूँढ पाए...ग़ैरलरी में कुछ आम से पेंटिंग लगे हुए थे। हम जल्दी ही hall से बाहर निकल आए..! नाट्यशाला के बाहर लोग अंदर जाने के लिए क़तार में खड़े थे। बाहर किसी बंगाली नाटक का पोस्टर लगा हुआ था। रविंद्र सदन का पूरा माहौल मुंबई के पृथ्वी थिएटर और अहमदाबाद के गुफ़ा जैसा था..।
सदन से बाहर निकल कर हमने मेट्रो लिया और काली घाट गए। खुली खिड़की वाला मेट्रो देख कर दिव्या बहुत हैरान हुई. लेकिन जब मैंने उससे कहा, “भारत में भूमिगत रेल 1984 में सब से पहले यहीं शुरू हुआ था।”, तो उसकी हैरान थोड़ी कम हुई, ‘तुम दिल्ली के मेट्रो से इसकी तुलना नहीं कर सकती हो..’
कालीघाट के आसपास का माहौल वैसा ही था जैसा पूरे उत्तर भारत में मंदिरों के पास होता है, गली के दोनो तरफ़ अनगिनत फ़ूल-प्रसाद और पूजा से जुड़ी वस्तुओं की दुकान और मंदिर के प्रांगण में कीचड़ और गंदगी..। इस सबसे भी ज़्यादा गंदी वहाँ मुझे उन लोगों के चेहरे पर दिखती है जो लाल-पीले वस्त्र पहन का पुजारी-पंडित बने यहाँ-वहाँ घूमते रहते हैं। पूजारी से अधिक अधार्मिक व्यक्ति खोजने से भी नहीं मिल सकता है।
काली घात से निकल कर हम धर्मतल्ला के new मार्केट गए। यह मार्केट दिल्ली के सरोजनी और सरद जैसा है। जूता पहन कर अधिक चलने की वजह से दिव्या का पैर कट गया है, उसमें अपने लिए एक चप्पल लिया। एक घंटा से भी अधिक समय हमने मार्केट में बिताया...
जब हम मार्केट से बाहर निकले तो मुख्य सड़क का नज़ारा देखने लायक़ था। लोग एक बड़े ट्रक पर अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रतिमा लादे हुए थे। पीछे लोग ‘ट्रम्प वापिस जाओ’ का नारा लगा रहे थे।
New-Market से अपने निवास स्थान की ओर आते से मैंने एक अद्भूत दृश्य देखा। एक जगह ओवेरब्रिज के नीचे बने बैंच पर बैठकर लोग चार-पाँच जगह शतरंज खेल रहे थे। और, कई लोग खड़े होकर उनकी खेल को देख रहे थे। इतनी ट्राफ़िक में इस तरह से लोगों को शतरंज खेलते मैं और कहीं नहीं देखा था।
बस स्टेंड से आवास की तरफ़ आते हुए, रास्ते में हमने गुड़ की चाशनी में डूबा हुआ रसगुल्ला खाया...वाह ऐसा अद्भूत स्वाद...!
वैश्वीकरण की वजह से पूरी दुनिया में संस्कृति का साम्यवाद बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है| मेरी दृष्टि में यह बहुत ही चिंतनीय और निंदनीय है| दस साल पहले जब कोलकाता गया था, तब के कोलकाता और आज के कोलकाता में जमीन आसमान का अंतर आ गया है|
लोगों, घरों, दुकानों और लोगों के पहनावा और व्यवहार को देख कर कुछ भी तय कर पाना मुश्किल था| मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और बंगलौर में आज कोई भी बुनियादी भेद नहीं हैं..(और अगर थोड़ा बहुत कुछ है भी तो वह आने वाले दस साल में एकदम मिट जाएगा) वैसे ही लोग, वही बात करने का ढंग, उसी तरह की दुकाने, घरों का वही पैटर्न, सड़के भी वैसी ही.. जैसे आजादी तलाशते-तलाशते स्त्रियाँ आज दुसरे दर्जे की पुरुष बन कर रह गई हैं, वैसे ही ग्लोबलाइजेशन की वजह से हम सब दूसरे दर्जे के यूरोपीयन बनते जा रहे हैं|
अगर तिलक लगाना, और पत्थर के सामने सिर झुकाना अंधविश्वास और गँवईपन हैं, तो मैं पूछता हूँ भारत जैसे देश में, जहाँ साल में 300 से अधिक दिन सूर्य का दर्शन होता है, वहां टाई लगाकर घूमना, जूता पहनना और कोट पहनना क्या है? कोई मुझे समझाए कि इसके पीछे क्या वैज्ञानिकता है?
ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण ने हमसे हमारी आत्मा और मौलिकता दोनों छीन ली है| आज दरभंगा, जिसे मिथिला का हृदयस्थली कहा जाता है, में जब दूकानदार से मैं पूछता हूँ, "ई समान की भाव छै यो", तो उधर से जवाब आता है, " चालीस का किलो है, कितना चाहिए..." यह हास्यास्पद है...क़रीब-क़रीब ऐसी ही स्थिति आज पूरे देश में हैं...|






