Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


सब एक वर्तुल में घूम रहा है

17-Oct. 2019 (Mehsana Aashram)
अनिरंतरता को छोड़ कर जीवन में कुछ भी निरंतर नहीं है, और मेरा जीवन इसका अपवाद नहीं है| चाहे वह लिखना, पढ़ना, घूमना या फिर फोटोग्राफी करना हो, सब कुछ एक मौसम की तरह जीवन में आता-जाता रहता है| एक मुझे छोड़कर जीवन में सब कुछ परिवर्तनशील है| धर्म-अधर्म, सुख-दुःख सब मन के मेहमान बन कर आते-जाते रहते हैं| शरीर भी अपने धर्म से नित बदल रहा है| बदलाब के इस भयंकर झंझावात में विश्व-साक्षी को छोड़कर सब एक वर्तुल में घूम रहा है|

इसी साल फरवरी में जब मेहसाणा को अलविदा कहा था तब यह सपनों में भी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी फिर से लौट कर इस अंजुमन में आना होगा| आश्रम के गेट पर कदम रखते ही एक शेर, जो राधेश्याम स्वामी जी हर शिविर के अंत के सुनाते हैं, याद आ गई, “यह मय-कदा है ओशो का, हम सब यहाँ के रिंद है, जो जरा-सी पी कर बहक गया, उसे मय-कदे से निकाल दो, यही मय-कदे का निज़ाम है”, इस शेर के साथ ही वो एक बार यह लाइन जरूर दोहराते है, “इस अंजुमन में आपको आना है बार बार दीवार-ओ-दर को गौर से पहचान लीजिये”
मुंबई में करीब महिनाभर बिताने के बाद पांच दिन दाहोद में रहा| और अभी पिछले तीन दिनों से ओशो मनन नियो सन्यास कम्यून, मेहसाणा में हूँ| 2017 के दस जनवरी को, पूरा दो साल दो महीना रहने के बाद, आश्रम छोड़ा था| आश्रम में सबकुछ वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चलता था| थोड़ा-बहुत अगर कुछ बदला भी तो वो इतना गौण है कि उसकी वजह से बदलाब महसूस हो नहीं रहा है| ऐसा लग रहा है, दो साल पहले शतरंज की चाल को जहाँ पर छोड़ गया, वह आज भी वहीं है| एक-दो मोहरे जरूर बदल गए हैं, लेकिन राजा, मंत्री, ऊंट, और घोड़ा अपनी जगह पर ही हैं| वेलकम में घुसते ही अरविन्द स्वामी की और राबिया के पास से गुजरते हुए शिवाजी की बहुत याद आई|
आश्रम में प्रवेश करने के दो घंटे के बाद मैं यह भूल ही गया कि दो साल के लम्बे अन्तराल के बाद यहाँ आया हूँ| अगर रूप के पीछे छिपे अरूप से हम थोड़े-बहुत भी परिचित हों, तो समय के बोध से पूर्णतया मुक्त हुआ जा सकता है| समय, शरीर, मन, सुख, दुःख जीवन, मृत्यु, धर्म, अधर्म, माया, बन्धन, मुक्ति यह सब एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम हैं|
आश्रम का पहला दिन इधर-उधर चक्कर लगाने, पुराने मित्रों से मिलने व जय-भगवन के साथ चर्चा करने में बीता| आज का दिन वैसा ही बीता जैसा मैं चाहता था| आश्रम आने से पहले मैंने तय किया था कि I will underplay, वही कर रहा हूँ| सालों बाद नितांत अकेले होने का अवसर मिला है, इस अवसर को मैं निम्बू की तरह नीचोड़ लेना चाहता हूँ| बिल्कुल लोड-फ्री होकर आश्रम में रह रहा हूँ|

मुंबई से समय ने मुझे ऐसे खींचकर अलग किया जैसे आदमी खून चूस रहे जोंक को अपने से अलग करता है| मुंबई का एक महीना बहुत ही सुख और चैन से गुजरा| 7 महीने की लम्बी यात्रा के बाद मैं जैसा समय बिताना चाह रहा था, वैसा मुंबई में रहते संभव हो पाया| सुस्त-सुस्त सा दिन, लम्बी राते, समंदर की ठंडी हवा, शाम को सर के साथ टहलना, फिल्म देखने जाना, बाज़-औक़ात सर, भाभी या फिर मुकेश जी के साथ ब्रह्म-चर्चा कर लेना, मेरे थके शरीर और यात्रा से ऊबे मन के लिए स्वाति की बूंदों जैसा था|
जोंक को अपने शरीर से अलग करने के बाद आदमी उसके मुंह पर नमक या तम्बाकू का पानी रख देता है| उस नमक के बाद जोंक खून की उलटी करके मर जाता है| लेकिन, समय ने मेरे साथ ऐसी बेरहमी नहीं की, उसने मुंबई से अलग करने के बाद मेरे मुंह पर शहद रख दिया| मुंबई से दाहोद आते समय वरोदरा स्टेशन पर स्वामी Atmo Govind Indachi से मिलना सडन सतोरी जैसा था| उस झटके से उबरने में मुझे काफी वक्त लगा| आत्मो का स्टेशन पर आना जितना अप्रत्यासित था, उनता ही उनका मेरे लिए थर्मस में भरकर चाय, सेब, और मेरे लिए कपड़े लाना था| अगर कुछ नोन था तो वो जाने से पहले उनका सेल्फी लेना| इस तरह से स्टेशन पर आकर इतने भावपूर्ण होकर मिलना आत्मो जैसे भक्त-हृदय व्यक्ति के लिए ही संभव है| अध्यात्म की दृष्टि से साधकों के दो प्रकार हैं- एक वे जिनका बेसिक मन बनिये का है, लेकिन लगे वे ध्यान, योग और भक्ति साधना में हैं| दूसरा वे जिनक बेसिक मन अध्यात्मिक हैं, लेकिन वे लगे हैं सांसारिक जोड़-घटाओ करने में| आत्मो दूसरे प्रकार में आते हैं| आत्मो आश्रम ना रहते हुए भी सदा आश्रम में हैं| मैं उनके दूकान पर भी गया हूँ, उन्होंने अपने दुकान और घर सब को आश्रम बना रखा है| और मैं ऐसे भी बहुत से लोगों को जानता हूँ, जिन्होंने आश्रम में दूकान सजा रखी है|
मेहसाणा पहुँच कर बिना मोबाइल फ़ोन के राव साहब और भक्त राज के साथ वार्टर पार्क वाले सीसीडी पर चार घंटे तक कॉफ़ी पर चर्चा करना बहुत ही पारलौकिक रहा है| दाहोद में मास्टर उगवे के साथ और रनत महल में स्वामी Ketan Raval के साथ बिताए गए पल और ब्रह्म-चर्चा बहुत ही आल्हादकारी रहा| स्वामी Anand Magan जी के यहाँ का भोजन इतना तृप्तिदायक था कि नाभि से सहज ही 'अन्नं ब्रह्म-अन्नम ब्रह्म' की नाद उठने लगता था| केतन स्वामी के हाथ की खिचड़ी भी अभूतपूर्व थी| दाहोद के गुलाब जामुन का स्वाद मैं अभी भी अपने मुंह में महसूस कर सकता हूँ| मास्टर उगवे के साथ बाऊका तंत्र मंदिर और काली डैम पर बिताया गया समय भी ज़ेहन पर अमिट छाप छोड़ गया है| सुबह उठकर सात बंगले तक टहलने जाना और फिर लौट कर बीरबल चाय वाले के यहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर मास्टर उगवे और उनके दोस्तों के बीच हो रही खुशगप्पियों की नशिस्त का मौन दर्शक बनने का अनुभव भी बहुत ही मजे का था|
कल सुबह आश्रम आने से पहले भक्त राज और राव साहब के साथ ‘बर्ड फोटोग्राफी’ भी काफी एन्जॉय किया| मेहसाना में जैसे भक्त राज, राव साहब और मेरी जोड़ी बनती है, वैसे ही मुंबई में सर, मुकेश जी, और मेरी जोड़ी बन गई थी| और दाहोद में जब मास्टर उगवे, स्वामी आनंद मगन हम एक ही बाइक पर बैठ कर रतनमहल जा रहे थे, तब मुझे राव साहब और भक्त राज के साथ की गई गोवा की ट्रिपलिंग याद आ गई| भक्त राज हमारी जोड़ी को ‘त्रिफला’ बुलाते हैं|
मेहसाणा से निकल कर मेरा भोपाल जाने का प्लान था, लेकिन अभी यहाँ इतना मजा आ रहा है कि भोपला जाने का प्लान मैंने टाल दिया है|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...