आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है|
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा|
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता|
मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ|
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया|
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं|
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ|
(दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)

