Sunday, 30 June 2019

लोभाविष्ट होकर कोई भी विधि या ध्यान करने से कोई फायदा नहीं है

प्रश्न -Swami ji प्रणाम। समझ कैसे पैदा होबताइये कृपा करके। आपका शुल्क अदा हो जाएगा।
प्रणाम!
‘कैसे’ का जवाब विधि होगा, और अगर ‘विधि’ से कुछ हो सकता था, तो फिर ‘समझ’ की जरूरत ही क्या थी? किसी भी विधि से समझ को पैदा नहीं किया जा सकता है| हाँ, यह हो सकता है कि विधि करते-करते किसी को विधि की निरर्थकता समझ में आ जाए| विधियों की उपयोगिता बस इतनी है कि एक दिन आपको उनकी निरर्थकता समझ में आ जाए| अब समस्या यह है कि अगर बुनियाद में नासमझी हो, तो विधि करते-करते जीवन गुजर सकती है, लेकिन समझ नहीं आएगी| तो, प्रश्न यह उठता है कि विधि करने से पहले जो समझ चाहिए वह समझ कहाँ से आएगा, और कैसे पता चले कि बुनियाद में क्या है?
सबसे पहली बात तो हमें यह समझना होगा कि ‘समझ’ को किसी भी उपाय से पैदा नहीं किया जा सकता है| कम-से-कम पहली बार तो ऐसा नहीं किया जा सकता है| पहली बार जब भी ‘समझ’ किसी के जीवन में आता है, तो वह प्रयास से नहीं आता है, वह हमेशा ‘प्रसाद’ की भांति आता है| और हर एक के जीवन में ऐसे दो चार क्षण आते हैं, जब समझ की किरण उसके उपर उतरी है| आमतौर, पर लोग उस किरण का कोई उपयोग नहीं करते हैं| किरण आती है और खो जाती है|
अब, दूसरी बात हमें यह समझना होगा कि ‘विधि से समझ को सिर्फ गहराया जा सकता है, उसे पैदा नहीं किया जा सकता है|’ इसीलिए विधि हमेशा सेकंडरी है| उस रात जब सिद्धार्थ गौतम ने बीमार, बुजूर्ग, और मरे हुए को देखा, तो उनके जीवन में समझ/बोध का अवतरण हुआ, फिर उस समझ/बोध को गहराने के लिए वे जंगल गए| फिर विधि किया, और एक दिन जाना की विधि वर्थ, और उसी दिन वे निर्वाण को उपलब्ध हुए|

जो सौभाग्य का क्षण बुद्ध के जीवन में आया, वह क्षण हमारे जीवन में भी आता है| एक बार नहीं बार-बार आता है, हजार बार आता है| लेकिन हमारी मूढ़ता ऐसी है कि उसको गहराने के बजाय हम उसको भूलाने और मिटाने में लग जाते हैं| दो, अतियों के क्षण में बोध जीवन में उतरता है.. अतिशय ख़ुशी के क्षण में और अतिशय दुःख के क्षण में| और पहलीबार बोध/समझ नकार के रूप में उतरता है| जैसे, जीवन वर्थ है, सब असार है, मैं बेहोश हूँ, मैं एक दिन मर जाऊँगा..| ऐसा अक्सर तब होता है, जब हमारा कोई अति निकट संबंधी मर जाता है, प्रेम संबंध टूट जाता है, या फिर ऐसी कोई अप्रत्याशित घटना घट जाती है, जो आपको एक दम से सेण्टर से बाहर फ़ेक दे| जैसे बड़ी लाटरी लग जाना, दुर्घटना हो जाना इत्यादि-इत्यादि|
जब भी जीवन में कभी सौभाग्य का ऐसा कोई क्षण आए तब विधि के द्वारा उसको गहराने की कोशिश करनी चाहिए| तब, विधि की बहुत उपयोगिता है| अन्यथा, ऐसे ही अपनी सुविधा से, लोभाविष्ट होकर कोई भी विधि या ध्यान करने से कोई फायदा नहीं है|

Wednesday, 19 June 2019

मादक द्रव्यों का सेवन


19-जून, 2019
कल शाम, जब हम ‘मून लाइट’ कैफ़े (धर्मकोट) में कॉफ़ी पीते हुए गपिया रहे थे, एक फिरंगी हमारी ओर देख कर ऐसे मुंह बना रहा था जैसे हमारी बातों को समझने की कोशिश कर रहा हो| उसकी कोशिश को देखकर मैंने उससे कहा, We are talking in Hindi.(हम हिंदी में बात कर रहे हैं)| इस पर उसने सर हिलाते हुए कहा, Yes, I know. I am just trying to get some words.” इस तरह से हमारी उससे बातें होने लगी| थोड़ी देर की बातचीत से पता चला कि वह इजरायल से है, और दो महीने से धर्मकोट में रह रहा है| उसके अलावा इजरायल के और भी बहुत से लोग इस वक़्त धर्म कोट में रह रहे हैं| देखा जाए तो जैसे अरम्बोल, गोवा में रूस वालों की तादात ज्यादा होती हैं, उसी तरह धर्मकोट में इजरायल वालों का बोलबाला है| कुछ दिन पहले एक शाम स्पेस आउट, कैफ़े में हमारी मुलाकात एक और इजरायली सैलानी, जिसका नाम सत्या था, से हुई थी| सत्या ने बताया की उसकी माँ को भारत से इतना प्यार है कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी भारतीय रख दिया|  
खैर, अभी हम सत्या के बारे में यहाँ ज्यादा बात नहीं करेंगे| उसकी अपनी लम्बी कहानी है| मेरे मित्र राव साहब को कैसे सत्या से प्यार हुआ और, कैसे सत्या ने उन्हें धोखा दिया, उसकी कहानी फिर कभी| अभी जिस इजरायली सैलानी से मैं बात कर रहा हूँ, ‘मून लाइट’ कैफ़े में, मुझे उसका नाम नहीं पता है| बातचीत के दौरान मैं नोटिस करता हूँ कि बीच-बीच में वह अपने बैग से एक पैकेट निकालता है, पैकेट में कुछ काला (मिट्टी के लोई जैसा) पदार्थ है, जिसका एक छोटा-सा हिस्सा वह तोड़ लेता है, और फिर उसको खोट-खोट कर अपनी हथेलियों के बीच रखता है, फिर दोनों हथेलियों की मदद से सरसों के दाने जितना गोली बना कर एक छोटे-से बैग में रखता है| उसके बैग, जो इअरफोन के बैग से थोड़ा बड़ा है, में कोई सौ के करीब दाने हैं, जो उसने अभी तक तैयार किया है| जिज्ञासावश जब मैंने उससे यह पूछा कि वह क्या बना रहा है, तो पता चला की वह काला पदार्थ चरस (वह चरस को ‘जरस’ बोल रहा था) है, और वह सिगरेट में डालने के लिए उसके छोटे-छोटे दाने बना रहा है| फिर उसने यह भी बताया की उसके पैकेट में कोई 10 ग्राम चरस है, जिसे उसने आज ही 2000/- रूपये में खरीदा है| साथ ही उसने यह भी बताया कि उसने आज जो जरस यानि चरस खरीदा है, वह उतना अच्छा नहीं है, और थोडा मंहगा भी है|
‘यह पी कर तुम्हे कैसा लगता है’, मैंने अपनी अगली जिज्ञासा मिटाने व बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए उससे पूछा| “गांजा से इसका नशा थोडा अलग होता है, यह मेरे विचारों को कम कर देता है, और फिर जब मैं अपने आस-पास की चीजों को देखता हूँ, तो कुछ अलग तो नहीं दिखता, लेकिन फिर भी मैं उन्हें पहले से ज्यादा अच्छे से देख पाता हूँ, और उसके सौन्दर्य को ज्यादा महसूस कर पाता हूँ|”, गोली बनाते हुए उसने यह सब मुझसे कहा| ‘क्या तुम जानते हो कि ऐसी या फिर कह लो कि इससे बेहतर अवस्था को, बिना किसी मादक पदार्थ के सेवन के प्राप्त किया जा सकता है?’ उसने ना में सिर हिलाया| मैंने बोलना जारी रखा, ‘हमारे मुल्क में हम पांच ऐसे रास्तो को जानते हैं, जिनके जरिये तुम जिस अवस्था की बात कर रहे हों उसको पाया जा सकता है| पहला तरीका वही है जो तुम कर रहे हो, ‘मादक द्रव्यों का सेवन’| लेकिन इस रास्ते को हम सबसे खतरनाक रास्ता मानते हैं, और इस पर चलने वाले को हम ‘योगभ्रष्ट’ कहते हैं| तुम्हे हिन्दुस्तान में बहुत से ऐसे साधू-सन्यासी मिल जाएँगे जो मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं| यहाँ उन्हें हम बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखते हैं| हालाँकि उन्हें हम साधू मानते हैं, क्योंकि उनकी जो खोज है, वह आनंद की है| लेकिन जिस मार्ग से वह आनंद को खोज रहे हैं, उस मार्ग को हम कुछ बहुत अच्छा नहीं मानते हैं| इस मार्ग पर चलकर जो अवस्था उपलब्ध होती है, वह वस्तुतः परमानन्द झलक मात्र है| इस अवस्था के लिए हमारे पास एक खास शब्द है, “जड़ समाधि”, जड़ समाधि यानि आनंद की एक ऐसी अवस्था जिसे जबरदस्ती मन पर थोपा गया हो, और उस अवस्था में मन मरा तो नहीं हो, बस थोड़ी देर के लिए सो गया हो| जो सो गया है वह जागेगा| और जागने के बाद पहले से ज्यादा उपद्रव मचाएगा| इसीलिए रोज़-रोज़ तुम्हे मादक द्रव की मात्रा बढ़ानी होगी, अन्यथा थोड़े दिनों के बाद मन इस द्रव का इतना आदि हो जाएगा कि इसका उस पर कोई असर ही नहीं पड़ेगा| मादक द्रवों के सेवन के कई घातक दुष्परिणाम हैं| शरीर और मन को जो क्षति पहुँचता है, वो तो गौण है| असली खतरा यह कि आध्यात्मिक रूप से यह तुम्हे इतना अपाहिज बना देगा कि तुम इस जीवन में सही रास्ते से कभी भी समाधि तक पहुँच ही नहीं पाओगे| इसीलिए हमारे मुल्क में मंदबुद्धि और नासमझों को छोड़ कर कोई भी आनंदित होने के लिए मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता है|’, वह अब अपनी रीढ़ सीधी करके मुझे सुन रहा था|
चित्र साभार-गूगल 
दूसरा रास्ता है ‘मंत्र जाप’| अगर तुम किसी एक शब्द या मंत्र को बार-बार दोहराते रहो, तो भीतर एक प्रकार की तन्द्रा पैदा होने लगती है| विचार कम हो जाते हैं, और तुम्हे थोड़ी शांति और आनंद का अनुभव होता है| लेकिन इस अवस्था में भी मन पूरी तरीके से मरता नहीं है, बस तोड़ी देर के लिए सो जाता है| इसके भी कई दुष्परिणाम है| एक ही शब्द को बार-बार दोहराने से धीरे-धीरे तुम्हारी बुद्धि जड़ होने लगती है| और तुम अंत में मंद बुद्धि बन कर रह जाते हो| मंत्र के माध्यम से जो अवस्था उपलब्ध होती है, उसे भी ‘जड़ समाधि’ ही कहते हैं|’, अब उसने गोली बनाना भी बंद कर दिया था|
तीसरा रास्ता है ‘तपश्चर्या’| पहले दो रास्तों की तरह यह बहुत ज्यदा खतरनाक तो नहीं है, लेकिन आदमी की अपनी बेवकूफीयों की वजह से यह रास्ता भी पहले दो की भांति खतरनाक हो सकता है| बल्कि कुछ मामले में पहले दो से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है| क्योंकि यह शक्ति का मार्ग है| इस मार्ग पर चेतन मन पहले दो मार्गों की तरह ही सो जाता है, लेकिन अचेतन मन की कुछ सुप्त शक्तियां जागृत हो जाती है| और शक्ति के साथ खतरा सदा मौजूद है| इसीलिए किसी सच्चे सद्गुरु के देखरेख में यदि इस मार्ग की साधना की जाए तो इसे कई सुखद परिणाम हो सकते हैं| अन्यथा यह मार्ग सिवाय सेल्फ-टार्चर के और कुछ भी नहीं| आमतौर पर आत्मघाती लोग इस मार्ग में उत्सुक हो जाते हैं| ऐसे लोग खुद को दुःख पहुंचा कर आनंद लेते हैं| बिना सद्गुरु की देशना के इस मार्ग पर एक क़दम भी नहीं चलना चाहिए| इस मार्ग पर चलकर जो अवस्था उपलब्ध होती है, उसे भी जड़-समाधि ही कहते हैं|’, वह सुनने में पूरी तरह से तल्लीन था|
चौथा रास्ता है ‘ध्यान’| यह मार्ग पहले तीनों मार्गों से ज्यादा सुरक्षित है| इस मार्ग का साधक ध्यान की अलग-अलग विधियाँ जैसे विचारों को देखना, श्वास को देखना, झाजेन में बैठना, भक्ति करना, शरीर और मन के प्रति होश रखना, आदि- आदि कर के परम-आनंद की अवस्था को पाने की कोशिश करता है| इस मार्ग पर कोई 84,000 विधियाँ है, जिसके द्वारा साधक आनंद को पाने की कोशिश करता है| इस मार्ग पर ‘मन’ साधक का दुश्मन नहीं है| इसीलिए वह मन को मारना नहीं चाहता है| वह मन के पार तो जाना चाहता है, लेकिन मन को मारना नहीं चाहता| न ही मन से मुक्त होने की उसकी कोई चाह है| बल्कि वह मन से दोस्ती करके, अपनी खोज में मन का सहयोग लेता है| उसकी खोज सकारात्मक है, वही किसी भी चीज़ से लड़ता नहीं है, न ही किसी चीज़ का विरोध करता है| वह सर्व-स्वीकार की भाव दशा में जीने की कोशिश करता है| लेकिन इस सब के बावजूद भी वह उस परमतत्व या परमानन्द की अवस्था को पाने में सफल नहीं हो पाता है| हाँ, प्रयास से जितना पाया जा सकता है, उतना वह पा लेता है| उसे कई बार उस अवस्था की झलकें भी मिलती है, जिसको पा लेने के बाद सब पा लिया जाता है| जिसको जान लेने के बाद और कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता है| लेकिन और इस अवस्था में अथाई रूप से नहीं ठहर पाता है| इसीलिए इस मार्ग का साधक जिस अवस्था को उपलब्ध होता है, उसे ‘सबीज समाधि’ कहते हैं| मन बीज रूप में इस अवस्था में मौजूद रहता है|
इस मार्ग पर चलना पहाड़ चढ़ने जैसा है, यह सबसे दुर्गम और कठिन मार्ग है| पहला मार्ग पहाड़ पर से उतरने जैसा है, एकदम सरल और सुगम| दूसरा उबड़-खाबड़ वाले रोड पर चलने जैसा है, पहले से थोडा कठिन लेकिन मुश्किल बिलकुल भी नहीं| तीसरा थोडा मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं| चौथा मार्ग दिखने में शुरू-शुरू में सरल लग सकता है, लेकिन जब आप चलना शुरू करेंगे तो पाएंगे कि यह बहुत ही कठिन है| इन्ही कठनाइयों से घबरा कर लोग पहले, दूसरे और तीसरे मार्ग को चुन लेते हैं|
पहले, दुसरे और तीसरे की तरह इस मार्ग के भी साइड-एफ्फेक्ट है| बिना गुरु या किसी मिस्ट्री स्कूल की मदद के इस मार्ग पर चलने की सोचा भी नहीं जा सकता है| इस मार्ग पर अगर आपसे जरा-सी भी चूक हुई, तो या तो आप पागल हो जाएँगे या फिर मर जाएँगे| मैंने अक्सर इस मार्ग के साधकों को पागल होते हुए देखा है|, अब वह मुझे सुनते हुए कॉफ़ी पी रहा था|
पांचवा रास्ता है-समझ’| अगर इमानदारी से कहें तो पांचवा मार्ग वस्तुतः कोई मार्ग नहीं है| पांचवे पर चलना यानि ‘अमार्ग’ पर चलना| इन फैक्ट, पांचवे पर चलना होता ही नहीं है| आप अभी इसी वक्त जैसे हैं, वैसे ही बिना किसी तैयारी के आनंद को उपलब्ध हो सकते हैं| कुछ भी करने, कहीं भी जाने की कोई जरूरत नहीं है| आँख खोलने और बंद करने के लिए जितने श्रम की जरूरत होती है, उतने भी श्रम की जरूरत नहीं है समाधि को पाने के लिए| पांचवे मार्ग का साधक (हालाँकि उसे साधक कहना ठीक नहीं है), अपने समझ से जिस अवस्था को उपलब्ध होता है, उसे ‘सहज समाधि’ की अवस्था कहते हैं| कुछ परम्परा में इस अवस्था को ‘निर्बीज समाधि’ की अवस्था भी कहते हैं| क्योंकि इस अवस्था में ‘मन’ बीज रूप में भी नहीं बचता है| इसी अवस्था को नानक ‘अमनिय अवस्था’ और झेन फ़कीर ‘नो-माइंड’ कहते हैं| यही बुद्ध का ‘नो सेल्फ’ और नागार्जुन का ‘शून्यवाद’ है|’, थोड़ी देर के लिए मुझे अपनी बात को रोकना पड़ा, उसका एक दोस्त उसे बुलाने के लिए आ गया| उसने अपने दोस्त को हाथ के इशारे से पांच मिनट के लिए रुकने के लिए बोला| और फिर मेरी तरफ मुख़ातिब होकर, इशारे से मुझे बात जारी रखने को बोला|
‘पांचवे मार्ग पर जो समझ चाहिए अक्सर वह समझ चौथे मार्ग पर चलने व असफ़ल होने के बाद आता है| लेकिन यह अपरिहार्य नहीं है| चौथे मार्ग के साधक को अक्सर मार्ग की निरर्थकता दिख जाती है, लेकिन शुरू के तीन मार्गों पर चलने वाले शायद ही कभी कोई इस चीज़ को समझ पाता है| अक्सर तो यह होता है कि वह चलने और चलते चले जाने का इतना आदि हो जाता है कि चाह कर भी खुद को रोक नहीं पाता है|
‘समझ’ मंजिल और मार्ग दोनों है| समझपूर्वक अगर चला जाए तो पहले मार्ग पर चल कर भी परम-आनंद को पाया जा सकता है| और अगर बुनियाद में नासमझी हो तो चौथे मार्ग पर चल कर भी सिवाय भटकने के और कुछ हाथ नहीं लगता| समझ पूरी हो तो एक कदम भी चलने की जरूरत नहीं है| और अगर समझ नहीं है, तो किसी भी मार्ग पर चलने से पहले अपने भीतर समझ पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए|’ इससे पहले कि मैं उसे यह बताता कि ‘समझ’ को कैसे पैदा किया जाए| उसका दोस्त उसे फिर से बुलाने के लिए आ गया| दुःख प्रगट करते हुए उसने हमसे फिर से मिलने की उम्मीद के साथ विदा लिया|
-Ikkyu Kensho Tzu

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...