मुझे दिखता है आज से 30 साल पहले के भारत का एक सुदूर गाँव, जिसमें अभी तक बिलजी नहीं पहुंची है| लोग आज भी सूरज डूबने से पहले मिट्टी के चूल्हे पर खाना बना लेते हैं| अँधेरा घिर जाने के बाद यदि डिबिये (दिये) की रौशनी में खाना बनाया तो, खाने में कीड़े गिरेंगे| सांझ ढलते ही गाँव के बच्चे चप्पल पहन कर पैर धोते हैं, और लालटेन जलाकर पढ़ने बैठ जाते| चप्पल बच्चे सिर्फ सांझ में पैर धोने के समय ही पहनते हैं, दिन भर खाली पैर ही भटकते रहते हैं| जिसका परिणाम यह होता है कि हर दूसरे दिन सूई लेकर बच्चे तलवों में चुभे काँटों को निकालने के लिए बैठते हैं| गोतुआ के घर के नीचे जो धान का खेत है, उसने गीदड़ ने छः बच्चे दिए हैं| गोतुआ के चाचा जो दिल्ली रहते हैं, अभी गाँव आए हुए हैं- इन गीदड़ के बच्चों को मैं अपने साथ इस बार दिल्ली ले जाऊंगा, वहां इन्हें जर्मन शेफर्ड का बच्चा बता कर बेच दूंगा|
Monday, 7 June 2021
खिड़की से आसमान देख रहा था
जिस लालटेन की रौशनी में बच्चे पढ़ने के लिए बैठते हैं, उसका शीशा एक तरफ से हमेशा फूटा हुआ होता है| फूटे हुए शीशे को कागज़ से बंद कर दिया जाता है, ताकि तेज हवा से लौ बच सके| किताब से ऊबे बच्चे लालटेन के पास टपकते परवानों को पकड़-पकड़ कर लालटेन के अंदर रखते रहते हैं| लौ पर गिरने के बाद परवाने एक बार को माचिस की तिली की तरह भभक कर जल उठते हैं| किताब से ऊबे और नीम-नींद में डूबे हुए बच्चों का यह बहुत बड़ा मनोरंजन है| जो बच्चे इससे भी ऊब गए हैं, वे फूंक मार कर लालटेन को बुझा देते हैं| पूछे जाने पर उनका जवाब होता- हवा ने बुझा दिया|
गाँव के मंदिर वाले पोखर के पास मेरा घर है| मेरे घर के सामने ही पाकड़ का एक विशाल वृक्ष है| वृक्ष मंदिर और पोखर दोने से ही बहुत पुराना है| वृक्ष के खोखल में सैकड़ों विषधर और टहनियों पर हजारों पंछीयों का आशियाना है| जब थोड़ा तंदुरुस्त था तब इसी बूढ़े वृक्ष के नीचे बैठकर तालाब में घूमते मछलियों को देखा करता था| लेकिन पिछले कई महीनों से शारीरिक असमर्थता की वजह से वहां तक नहीं जा पाया हूँ| दिन में कभी जब मेरा जी करता है, तो अपने कमरे की खिड़की को खोलकर वृक्ष और मंदिर के गुम्बद को देखता हूँ| शाम को पंछियों को सुनना मुझे अच्छा लगता है|
मंदिर गाँव के घनी आबादी वाले इलाके से दूर है, इसीलिए, मंदिर के पास मेरा घर एकला है| मंदिर आने वाले श्रद्धालु जन कभी-कभी लौटते समय मेरा हालचाल पूछने आ जाते हैं| इसके अलावा घर में अकेले रहता हूँ, किताबों के साथ| एक महराजिन सुबह-शाम आती है, जो मेरे लिए खाना बना जाती है| और वही थोड़ा साफ़-सफाई भी कर जाती है| हाँ, एक और चीज़ बताना भूल गया, मेरे घर के आसपास जो बगीचा है, उसमें गाँव के बच्चे कभी मुझसे पूछ कर, तो कभी चोरी से फल खाने के लिए आते रहते हैं| कभी किसी बच्चे को यदि चोरी करते हुए पकड़ लेता हूँ, तो सजा के तौर पर उससे घर का कोई काम करवा लेता हूँ|
आज सुबह से ही तेज बारिश हो रही है, साथ ही तूफ़ान भी है| कल तक जो खेत सूखे थे, उनमें अब पानी भर गये हैं| सुबह से ही पीले बेंग खेतों में टर्र..टर्र कर रहे हैं| इन पीलों मेढ़कों को सिर्फ बारिश के दिनों में ही देखता हूँ, बांकी समय ये कहाँ होते हैं, ये मेरे लिए शोध का विषय है| खिड़की से झाँकने पर देखता हूँ पाकड़ के हिलते हुए टहनियों को| पंछी दम साधे बैठे हुए हैं| पोखर के उस पार खेतों में भेंस टहल रहे हैं| भैसों के आसपास ही कुछ बच्चों को प्लास्टिक की बोरी से सिर ढककर जुते हुए खेतों में डोका चुनते हुए देख रहा हूँ| मंदिर सूना है| पोखर में गिरते पानी को देख कर लगा रहा है, जैसे टोपी वाले सिपाही कूदते हुए लड़ाई के लिए जा रहे हैं|
जिस खिड़की से अभी बाहर झाँक रहा था, वह मेरे बेड से लगा हुआ है, उसे आसानी से खोल-बंद कर सकता हूँ| लेकिन मेरे सामने की दीवार में जो खिड़की है, उसका एक पल्ला खुला रह गया है| उसी से ठंडी हवा के साथ पानी के छीटें भी घर में आ रहे हैं| महराजिन के आने का इंतजार कर रहा हूँ| मेरी अपनी इतनी हिम्मत नहीं कि उठ कर ख़ुद बंद कर दूं| पता नहीं क्यों कल रात से ही हिरघिराट हो रही है| सुबह की चाय अपने लिए ख़ुद बनाता हूँ, लेकिन आज उसकी भी हिम्मत नहीं हुई|
सुबह महराजिन आई थी, लेकिन अपने समय से बहुत लेट| दिन में ही उसने मेरे लिए शाम का भी भोजन तैयार कर दिया| मेरे कहने पर खिड़की का पल्ला उसने बंद तो कर दिया था, लेकिन शायद ठीक से बंद नहीं हो पाया| खिड़की के खुले हुए पल्ले से एक विषधर को कमरे में प्रवेश करता हुआ देख रहा हूँ| सुबह चाभी देना भूल गया था, मेरी घड़ी बंद हो गई है| कभी जब बिजली कड़कती है, तो दीवार घड़ी में समय देखना चाहता हूँ| इसी समय देखने के क्रम में ही मुझे खिड़की से लिपटा सांप दिख गया था| सांप की देह बहुत चमकदार है, संभवतः करैत है| खिड़की से बाहर कड़कती बिजली में मुझे आम के चमकते पत्ते भी दिखते हैं|
बहुत जतन के बाद समय देखने में सफल हो पाया हूँ, दो बज रहे हैं-मतलब १२ बजे से ही जगा हुआ हूँ, दो घंटे तो हो ही गए होंगे यूं लेटे-लेटे| महराजिन खाना मेरे बेड के ही पास टेबल पर रख कर गई थी| तीन-चार दिनों से ऐसा लगातार हो रहा है, आधी रात को नींद टूट जाती है, और उसके बाद फिर सो नहीं पाता हूँ|
अगली सुबह जब महराजिन चाय बना कर मेरे कमरे में आई, तो उसने मुझे सोया हुआ पाया| उसे कुछ हैरानी भी हुई, क्योंकि हमेशा उसके आने से पहले नाहा धोकर तैयार रहता था| ‘बाबूजी उठिए, चाय पी लीजिए’, टेबल पर चाय रखते हुए वह बोली| ‘ये खाना पड़ा ही हुआ है, आपने खाया नहीं?’, ढके हुए खाने पर से बर्तन हटाते हुए बोली| ‘और आपने रात में खिड़की क्यों खोल लिया, पूरे घर में पानी भर गया है?’, खिड़की बंद करने के लिए जाते हुए बोली| अपनी किसी भी बात का जवाब न पाकर वह मेरे पास आई, और चादर हटा कर मुझे हिलाने लगी| मेरा निष्प्राण शरीर एक ओर लुढ़क गया|
“इनका तो शरीर नीला पड़ा हुआ’’, मंदिर में पूजा करने आए लोगों में से एक ने कहा| महराजिन की चीखें सुन कर, मंदिर से लोग आ गए थे| ‘कल तो एकदम ठीक ही थे, कल सुबह मैंने चाय बना कर दी तो पिया, खाना भी खाया|’, महराजिन लोगों से कह रही थी| ‘इनके शरीर को तो देख कर लग रहा है इनकी मृत्यु सांप कांटने से हुई है’, भीड़ में से कोई कह रहा था| मैं लोगों से कहता हूँ, “नहीं सांप काटने से नहीं मारा हूँ| सुबह महराजिन के आने से पहले खिड़की से आसमान देख रहा था, उसी की वजह से मेरा शरीर नीला पड़ गया है|” लेकिन बड़ा हैरान होता हूँ कोई मेरी बातों पर ध्यान नहीं देता है| फिर मुझे ध्यान आता है कि मरने के बाद जिंदा लोग आपको नहीं सुन पाते हैं|
कुछ लोगों का सुझाव है कि मुझे अपने ही घर के पीछे बगीचे में जला दिया जाए| लेकिन महराजिन उनसे कहती, “बाबूजी को पाकड़ का पेड़ बहुत पसंद था, उनको उसी के पास जलाया जाए|” कुछ गावं वाले राजी हो जाते हैं, लेकिन कुछ इसके विरोध में हैं| अंत में महराजिन की ज़िद पर पेड़ के पास ही मेरी चिता तैयार की जाती है| मुझे अब इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि लोग मुझे बगीचे में जलाते हैं, या पेड़ के पास| ये बात मैं लोगों से कहना चाहता हूँ, लेकिन जानता हूँ कि वे नहीं सुनेंगे| हम मरे हुए लोगों की बात क्यों नहीं सुन पाते हैं? इसलिए कि हम जिंदा हैं, या कि हम मरे हुए लोगों से भी अधिक मरे हुए हैं?
-इक्क्यु केंशो तजु
Subscribe to:
Comments (Atom)
जा जा रे अपने मंदिरवा
दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...
-
प्रश्न- बुद्ध की वाईफ अच्छी थी ,. He had a small child. He was king, but still, he left his house and went to the jungle because he wan...
-
अभी जहाँ मैं रह रहा हूँ वह एक छोटा-सा ख़ूबसूरत द्वीप है| शायद यह दुनिया का सबसे छोटा द्वीप है| तीन तरफ पानी का अनंत फैलाव हैं| नज़रे उठ...
